डार्विनवाद और नवडार्विनवाद में अंतर || difference between Darwinism and Neo Darwinism

दोस्तों आज hindiamrit आपके लिए प्रमुख अंतरों की श्रृंखला में डार्विनवाद और नवडार्विनवाद में अंतर लेकर आया है।

दोस्तों जब बात जीवों की उत्पत्ति की हो तो लैमार्क और डार्विन का नाम सामने आता है।

तो आज हम आपको नवडार्विनवाद क्या है,डार्विनवाद क्या है,नवडार्विनवाद की विशेषताएं,डार्विनवाद की विशेषताएं,darvinvad aur nvdarvinvad me antar, आदि की जानकारी प्रदान करेंगे।

डार्विनवाद और नवडार्विनवाद में अंतर || difference between Darwinism and Neo Darwinism

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डार्विनवाद क्या है || what is Darwinism || meaning of Darwinism

चार्ल्स डार्विन (180-1882) ने प्राकृतिक अध्ययन द्वारा विकासवाद या जैव विकास की अति सुन्दर तथा सरल विधि से प्रमाण सहित व्याख्या की है।

सन् 1837 में जब वह केवल 28 वर्ष का ही थे, तब उन्होंने बीगल नामक ब्रिटिश लड़ाकू जहाज पर संसार की यात्रा की।

यात्रा के दौरान विभिन्न देशों और टापुओं से उसने नाना प्रकार के पेड़-पौधों व जीव-जन्तुओं को एकत्रित किया।

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इनके अध्ययन पर डार्विन ने देखा कि जीवों में बहुत-सी विभिन्नताएँ तथा समानताएँ पायी जाती हैं।

इन भिन्नताओं में से कुछ वंशागत (heritable) होती हैं तथा इनके कारण जीवों की नयी किस्में बन जाती हैं।

डार्विन ने 1859 में ‘प्राकृतिक वरण द्वारा जाति का विकास’ नामक पुस्तक में बहुत-से तथ्यों की विस्तृत व्याख्या की है।

इस पुस्तक में उसने जैव विकास की क्रिया को सोदाहरण प्रस्तुत किया। तथा समझाया कि किस प्रकार जीव अपने को वातावरण के अनुकूल बनाकर जीवित रहते हैं।

और संतान उत्पन्न करते हैं। इसके विपरीत जो जीव अपने को प्रकृति के अनुकूल नहीं बना पाते, वे कुछ समय बाद नष्ट हो जाते हैं।

अतः प्रकृति में एक प्रकार की छटनी हुआ करती है। डार्वन के इस सिद्धान्त को प्राकृतिक वरणवाद (Theory of Natural Selection) कहते हैं।

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डार्विनवाद की विशेषताएं

(1) जीवों में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता

(2) जीवन संघर्ष

(3) समर्थ का जीवत्व या प्राकृतिक वरण

(4) विभिन्नताएं तथा आनुवंशिकता

(5)वातावरण के प्रति अनुकूलता

(6)नयी जातियों की उत्पत्ति

डार्विनवाद के उदाहरण

(1) जिराफ की गर्दन
(2) शेर,चीता,तेंदुआ


डार्विनवाद की कमियाँ || डार्विनवाद की आलोचना || डार्विनवाद के प्रति आपत्तियां

डार्विनवाद का प्राकृतिक वरणवाद इतना युक्तिसंगत था। कि शुरू में लगभग सभी वैज्ञानिकों ने उसका समर्थन किया किन्तु बाद में वैज्ञानिकों ने इसके प्रति निम्न अपवाद प्रस्तुत किये।

डार्विनवादवाद की कमियां,डार्विनवाद की आलोचना के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं।

(1) डार्विनवाद अवशेषी अंगों की उपस्थिति तथा अंगों के प्रयोग में लाने या न लाने के प्रभाव का उल्लेख नहीं करता।

(2) डार्विन ने दैहिक व जनन कोशिकाओं में पायी जाने वाली विभिन्नताओं में अन्तर नहीं किया।

इनके अनुसार दोनों प्रकार की विभिन्नताएं समान रूप से वंशागत होती हैं।

(3) विभिन्न जातियों के जीवों में कुछ अन्तर बिल्कुल भी अनुकूली महत्व के नहीं होते क्योंकि जीन्स में कुछ परिवर्तन किसी भी कारण अचानक ही उत्पन्न हो जाते हैं।

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डार्विन द्वारा इन परिवर्तनों की उत्पत्ति तथा वंशागति के कारणों पर कोई प्रकाश नहीं डाला गया।

(4) डार्विन का सिद्धान्त समर्थ के जीवत्व की व्याख्या तो करता है किन्तु समर्थ की उत्पत्ति नहीं बताता।

(5) डाविन ने कृत्रिम वरण द्वारा पालतू जानवरों की नस्ल व फसलों वाले पौधों की किस्में सुधारने का वर्णन किया है।

किन्तु वैज्ञानिकों ने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि वातावरण के कारण जीवों में होने वाले कायिक परिवर्तन संतति में वंशागत नहीं होते।

(6) डाविन का प्राकृतिक वरणवाद संयोजी कड़ियों की उपस्थिति की व्याख्या नहीं करता।

(7) डार्विनवाद रचनाओं की उत्पत्ति एवं अतिवृद्धि की व्याख्या नहीं करता। क्योंकि अनेक अनुपयोगी लक्षण भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनकी संतानों में वंशागत होते हैं।

(अ) आयरलैंड के बारहसिंघे के सींग उसके नष्ट होने का कारण बने फिर भी ये छोटे होने की अपेक्षा पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकसित होते गये।

शत्रुओं से बचने के लिए ये जंगल में भागते समय इन सींगों के कारण झाड़ियों में उलझ कर गिर पड़ते थे। और शत्रुओं द्वारा पकड़ लिये जाते थे।

(ब) स्वीडलोन चीतों में दाँत का अत्यधिक विकास
पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनकी संतानों में होता गया जो उनके लिए अनुपयोगी और हानिकारक सिद्ध हुए।

नवडार्विनवाद क्या है || what is Neo Darwinism || meaning of Neo Darwinism

आधुनिक खोजों के आधार पर डार्विनवाद को नया रूप दिया गया है। इसे नव-डार्विनवाद कहते हैं।

नव-डार्विनवाद के अनुसार जैव विकास की क्रिया में निम्नलिखित पद होते हैं।
1. विभिन्नताएँ
2. उत्परिवर्तन
3. अनुकूलन
4. प्राकृतिक चयन तथा
5. जातियों का पृथक्करण

नव डार्विनवाद की विशेषताएं

(1) विभिन्नताएँ (Variations)

केवल लाभदायक एवं वंशागत विभिन्नताएँ जैव विकास में सहायक होती हैं।

(अ) लैंगिक जनन के अन्तर्गत् नर ब मादा युग्मकों के गुणसूत्रों के एक साथ आने से नये लक्षण बनते हैं। जो जीवों में विभिन्नताओं का कारण हैं।

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(ब) लैंगिक जनन वाले जीवों में युग्मक निर्माण के समय मातृ एवं विनिमय (crossing over) होता है।

(2) उत्परिवर्तन (Mutations)

जीवों में आनुवंशिक पदार्थ अर्थात् DNA में होने वाले परिवर्तनों को उत्परिवर्तन कहते हैं।

यद्यपि ये उत्परिवर्तन जीवों के जीवनकाल में युग्मनज से लेकर प्रौढ़ की मृत्यु से पहले तक किसी भी समय अथवा युग्मकों के बनते समय तक कभी भी हो सकते हैं।

किन्तु केवल युग्मकों अथवा जनन कोशिकाओं में होने वाले उत्परिवर्तन ही वंशागत होते हैं।

(3)अनुकूलन (Adaptations)

बातावरण में होने वाले परिवर्तन जौवों में विभिन्नताएँ उत्पन्न नहीं करते वरन ये सर्वाधिक अनुकूल जीवों को उस वातावरण में रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

जब कोई जीव किसी वातावरण में रहने में समर्थ होता है तो उस जीव को अनुकूलित तथा वह लक्षण जो उस वातावरण में रहने के लिए लाभप्रद होता है उसे अनुकूली लक्षण कहते हैं।

(4)प्राकृतिक वरण (Natural Selection) 

प्राकृतिक चयन किसी जीव में होने वाले परिवर्तनों के समय एक दिशा को निर्धारित करता है।

यह लाभप्रद विभिन्नताओं एवं उत्परिवर्तनों को स्थापित करने एवं उनकी वशागति में सहायक होता है।

(5) जातियों का पृथक्करण (Isolation of Species)

प्राकृतिक अवरोध जैसे मरुस्थल, नदियों, समुद्र एवं पर्वत आदि विभिन्न प्रदेशों में रहने वाले जीवों की आबादियों के अन्तरा-प्रजनन को रोकते हैं।

अत: इसमें भौगोलिक पृथक्करण हो जाता है। घोरे-धीरे प्रत्येक आबादी अपने क्षेत्र की बातावरणीय दशाओं के अनुसार अनुकूल होकर बदलने लगती है।

हजारो-लाखों वर्षो में यह इतनी बदल जाती है। कि इसके व अन्य क्षेत्रों की आबादियों के सदस्यों के बीच परस्पर जनन होना बंद हो जाता है।

लैंगिक पृथक्करण के बाद प्रत्येक आबादी एक नई जाति का रूप ले लेती है।

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Darvinvad aur navdarvinvad me antar
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जीवों में परिवर्तन धीरे धीरे होते हैं।परिवर्तन तीव्र गति से होते है।
प्रत्येक पीढ़ी के जंतुओं में सूक्ष्म विभिन्नताएं उत्पन्न होती है।

प्रकृति केवल उन विभिन्नताओं वाले योग्यतम जीवों को छाँटती है जो बदले हुए वातावरण में रहने योग्य हो।
वायुमंडलीय विकिरण जीवों में एकाएक ही विभिन्नताएं उत्पन्न कर देते है।

ये विभिन्नताएं सूक्ष्म न होकर दीर्घ होती है।
इसके पश्चात अगली पीढ़ियों में अनुकूल लक्षण वाले जीवों का वंश चलता है।इन विभिन्नताओं का प्राकृतिक चयन होता है और अनुकूल लक्षण वाले जीवों का वंश चलता है।

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