व्याख्यान प्रविधि / विधि | lectures devices / method in hindi

व्याख्यान प्रविधि / विधि | lectures devices / method in hindi – दोस्तों सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा में शिक्षण कौशल 10 अंक का पूछा जाता है। शिक्षण कौशल के अंतर्गत ही एक विषय शामिल है जिसका नाम शिक्षण अधिगम के सिद्धांत है। यह विषय बीटीसी बीएड में भी शामिल है। आज हम इसी विषय के समस्त टॉपिक को पढ़ेगे।  बीटीसी, बीएड,यूपीटेट, सुपरटेट की परीक्षाओं में इस टॉपिक से जरूर प्रश्न आता है।

अतः इसकी महत्ता को देखते हुए hindiamrit.com आपके लिए व्याख्यान प्रविधि / विधि | lectures devices / method in hindi लेकर आया है।

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lectures devices / method in hindi | व्याख्यान प्रविधि / विधि

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व्याख्यान प्रविधि (Lecture Techniques)

निर्देशन की सबसे पुरानी युक्ति व्याख्यान ही है । जिस काल में पुस्तकें उपलब्ध नहीं थीं तथा हस्तलिखित सामग्री भी उपलब्ध नहीं थी तब व्याख्यान से ही शिक्षण कार्य होता है ।

आज व्याख्यान का रूप कॉलेजों में काफी विस्तृत रूप से दिखाई देता है । उच्च कक्षाओं में सारे विद्यार्थी सिर्फ विषय के सीमित ज्ञान से ही सन्तुष्ट नहीं होते, व्याख्यान देना ही उनके लिए पर्याप्त नहीं व्याख्यान के साथ आवश्यक है कि उनकी जिज्ञासा के लिए प्रश्न किये जाएँ तथा श्रव्य-दृश्य सामग्रियों का प्रयोग किया जाए । व्याख्यान से अभिप्राय होता है।

शिक्षक द्वारा किसी विषय की ‘बाल की खाल’ निकाल देना अर्थात् विषय-वस्तु की गहराई तक उसका विश्लेषण करके छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करना । यह परिचर्चा का विस्तृत अंश है । यह माना जाता है कि जो अध्यापक जितना अच्छा व्याख्यान दे सकता है उसकी कक्षा उतनी ही भरी रहती है। व्याख्यान शिक्षक की मौखिक अभिव्यक्ति होती है ।

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इसमें शिक्षक विषय पर अधिकार रखता हुआ क्रमबद्ध अपने ज्ञान के छात्रों क समक्ष प्रस्तुत करता है। आधुनिक शिक्षाशास्त्री व्याख्यान युक्ति को परम्परागत, एकमार्गीय, वैज्ञानिकता से दूर विधि मानते हैं ।

इसमें शिक्षक की भूमिका को ही सर्वोपरि व प्रभावयुक्त माना जाता । अतः यह कहा जा सकता है कि व्याख्यान उच्चतम रूप से औपचारिक भाव से, उच्चतम अनौपचारिक भाव तक पहुँचने की प्रक्रिया है।

व्याख्यान के प्रकार

व्याख्या के प्रकार व्याख्यान दो प्रकार का होता है-


(1) औपचारिक (Formal)
(2) अनौपचारिक (Informal)

एच. क्लार्क और इरविंग एस. स्टार्स के अनुसार व्याख्यान विधि में औपचारिक से अनौपचारिक व्याख्यान तक पहुँच जाता है इसमें कुछ अन्य तथ्यों का भी प्रयोग होता है।

व्याख्यान में दृष्टान्तों का प्रयोग उसे रोचक बनाता है। प्रदर्शन युक्त सामग्री के प्रवेश से यह सिर्फ मौखिक विधि ही न रहकर दृश्य विधि हो जाती है । बीच-बीच में पाठ्य-सामग्री को स्पष्ट करने के लिए उद्धरणों को प्रस्तुत किया जाता है ।

शिक्षक विभिन्न तरीकों के माध्यम से फिर संशोधित रूप में व्याख्यान को पुनः छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करता है । अनौपचारिक रूप में विषय पर चर्चा ही इसकी अन्तिम परिणित होती है । अनौपचारिक संक्षिप्त व्याख्या के माध्यम से शिक्षक व्याख्यान की संक्षिप्त रूपरेखा छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करता है । इस प्रकार विभिन्न माध्यमों का सहारा लेते हुए शिक्षक कक्षा में व्याख्यान विधि से छात्रों को ज्ञान देता है।

व्याख्यान प्रविधि के लाभ (Advantages of lecture techniques )

1. विषय का मौखिक चित्रण तथा प्रस्तुतीकरण उचित रूप में होता है। और विषय के क्षेत्र की सामान्य रूपरेखा भी प्राप्त की जा सकती है।

2. प्रभावात्मक तरीके से संक्षिप्त समय में ही बहुत से तथ्य प्रस्तुत किये जा सकते हैं।

3. जब व्याख्यानों को कई खण्डों में क्रमबद्धता के साथ प्रस्तुत किया जाता है। तो विषय में तथ्यों की रुचि अच्छी तरह से प्रेरित की जा सकती है।

4. इसमें क्योंकि रुचि के कारण ध्यान केन्द्रित किया जाता है अतः ध्यान काफी समय तक सुरक्षित और स्थायी बनाया जा सकता है।

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5. किताबों के द्वारा की गयी प्रस्तुति से कहे हुए शब्द अधिक प्रभावशाली होते हैं। किताबों की कमी को पूरा करता है।

6. सभी छात्रों के लिए भाषा उपयुक्त होनी चाहिए।

7. व्याख्यान द्वारा विभिन्न विषयों में प्रस्तुत तथ्यों को आसानी से एक ही जगह प्रस्तुत किया जा सकता है । इससे बच्चों पर जो प्रभाव पड़ेगा वह स्थायी होगा । तथा शिक्षक छात्रों के समक्ष विषयों के आपसी सह-सम्बन्ध अच्छी तरह प्रस्तुत कर सकता है।

8. शिक्षक सक्रिय रहता है।

9. एक ही समय में छात्रों के बड़े समूह को शिक्षित किया जा सकता है।

10. विषय का आलोचनात्मक व तार्किक क्रम सदैव बना रहता है।

11. यह शिक्षक तथा छात्र दोनों को विषय के अध्ययन की प्रगति के विषय में सन्तुष्टि प्रदान करती है।

12. यह विधि उच्च कक्षाओं के लिए उपयोगी होती है।

13. यह समय की दृष्टि से भी उपयोगी है। शिक्षक थोड़े समय में अधिक पाठ्यक्रम पढ़ा सकता है।




व्याख्यान प्रविधि के दोष (Disadvantages of lecture techniques )

1. छोटी कक्षाओं की दृष्टि से अमनोवैज्ञानिक विधि ।

2. छात्रों में मानसिक, तार्किक व आलोचनात्मक शक्ति के विकास की कमी रहती है।

3. इस प्रकार से प्रदत्त ज्ञान अस्थायी होता है।

4. विज्ञान के विषयों को इस विधि से पढ़ाना प्रभावकारी नहीं होता क्योंकि इसमें शिक्षक सम्पूर्ण सूचनाएँ भली-भाँति प्रस्तुत नहीं कर पाता।

5. विषय का प्रयोगात्मक पक्ष उपेक्षित रहता है।

6. इसमें छात्र पूर्णतया निष्क्रिय रहते हैं।

7. एक बार तारतम्य टूट जाने पर ज्ञान खण्डित व अधूरा ही रह जाता है।

8. व्याख्यान विधि में सभी ज्ञानेन्द्रियाँ सक्रिय नहीं होती हैं इससे ज्ञान स्थायी भी नहीं हो पाता।

यद्यपि इस पारस्परिक व्याख्यान विधि की इतनी आलोचना है फिर भी यह इतना अधिक प्रचलित है कि इसके पीछे दो महत्त्वपूर्ण कारण हैं—इसका सरल होना तथा बड़ी आकार की कक्षाओं में इसकी प्रधानता । कुछ मनोवैज्ञानिक और अन्य प्रयोगों के अधार पर इसके लाभदायक तथा प्रभावात्मक उपयोग की बात भी रखी गयी है।

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व्याख्यान एक कला है और इसमें कौशल का प्रयोग अभ्यास के द्वारा लाया जा सकता है । अमेरिका की “हेल कमेटी ऑन यूनीवर्सिटी टीचिंग मैथड्स” में विश्वविद्यालय के प्रवक्ताओं ने व्याख्यान विधि को विशेषत: वैज्ञानिक विषयों की दृष्टि से अधिक प्रभावकारी बताया है।

हम व्याख्यान द्वारा क्या प्राप्त कर सकते हैं ?

यह विश्वास किया जाता है कि व्याख्यान विधि तीन प्रमुख लक्ष्यों के लिए प्रयुक्त की जा सकती है-
1. सूचना प्राप्ति के लिए (Acquisition of information)|
2. विचारों की उत्पत्ति (Promotion of thought)।
3. अभिवृत्ति परिवर्तन में (Change in attitude)|


व्याख्यान प्रविधि का प्रयोग करते समय सावधानियां

(1) क्रमबद्धता तथा सारांश विकास

व्याख्यान विधि की विषय-वस्तु को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया जाये और प्रत्येक स्तर पर सारांश को विकसित किया जाये।

इस हेतु निम्न पहलुओं को ध्यान में रखा जाये
1. व्याख्यान का लक्ष्य।
2. व्याख्यान की रूपरेखा।
3. उचित दृष्टान्त तरीके।
4. अभ्यास व रसिकता को प्रशंसात्मक रूप से जोड़ना ।
5. शिक्षक व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धा जाग्रत करना।

(2) प्रस्तुतीकरण (Presentation)

1. गति को मापा जाये तथा महत्त्व दिया जाये ।
2. महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को ऊँची आवाज और प्रभावात्मक तथ्यों द्वारा महत्ता दी जाये तथा पाठ के अन्त में इन्हें दोहराया जाये।
3. प्रस्तुतीकरण का रूप आनन्दित हो किन्तु जरूरत से ज्यादा हँसी-मजाक या एकदम कठोर न हो।
4. उच्चारण शुद्ध हों।
5. मीठी आवाज व्याख्यान को अधिक सफलता प्रदान करती है।
6. छात्रों को नोट्स लेने के लिए प्रेरित किया जाये ।



(3) नोट्स लेने का तरीका

1. छात्र इसमें रूपरेखा विधि (Outline method) को अपना सकते हैं अर्थात् आवश्यक शीर्षक या उपशीर्षक को नोट कर ले।

2. प्रमुख बिन्दु विधि (Salient point method) अर्थात् उचित बिन्दुओं को ही नोट किया जाय ।

3. शब्दशः तरीका (Verbatim method)—जो भी कुछ शिक्षक ने कहा है उस समस्त को नोट करना ।

4. संक्षिप्त तरीका या संकेत लिपि (Shorthand method)-संक्षेप में जैसे वैज्ञानिक की जीवनगाथा या वैज्ञानिक सिद्धान्त की समीक्षा इत्यादि को नोट किया जाय।

(4) व्याख्यान की सफलता के लिए शिक्षक का विस्तृत व गहरा अध्ययन आवश्यक होता है।

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