पारितंत्र की परिभाषा,प्रकार एवं घटक / पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह

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पारितंत्र की परिभाषा,प्रकार एवं घटक / पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह

पारितंत्र की परिभाषा,प्रकार एवं घटक / पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह

पारितंत्र की परिभाषा,प्रकार एवं घटक / पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह

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यह सर्वविदित है, कि प्रत्येक जीव का संरचनात्मक एवं कार्यात्मक स्वरूप उसके आनुवंशिक लक्षणों पर निर्भर करता है, परन्तु साथ ही यह स्वरूप अपने पर्यावरण से भी अनेक प्रकार से प्रभावित होता है। वास्तविक रूप में पर्यावरण परोक्ष व अपरोक्ष रूप से प्रत्येक जीव के शरीर के संरचनात्मक एवं कार्यात्मक संगठन के लिए एक दिशा निर्देशक की तरह कार्य करता है। इसी कारण से किसी भी जीव के लिए अपने पर्यावरण से समन्वयन स्थापित करना अत्यन्त आवश्यक है अन्यथा उसके जीवित रहने में काफी कठिनाई आती हैं। यह अध्याय जीवों के चारों तरफ के वातावरण एवं उनके आपसी समन्वयन (Coordination) पर केन्द्रित है।

पर्यावरण का अर्थ / पर्यावरण किसे कहते हैं

‘पर्यावरण’ शब्द दो शब्दों, ‘परि’ + ‘आवरण’ से मिलकर बना है। ‘परि’ से तात्पर्य चारों ओर से है तथा ‘आवरण’ से तात्पर्य उन तत्वों से है, जो हमसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित है तथा एक आवरण जैसा रूप रखते हैं अर्थात् पर्यावरण का अर्थ हमारे चारों ओर उपस्थित उस वातावरण से है, जो हमसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित है। अत: पर्यावरण को हम निम्न प्रकार से परिभाषित कर सकते हैं “हमारे चारों ओर उपस्थित वातावरण, जिसमें सजीव, निर्जीव, जैविक एवं अजैविक घटकों तथा इनके मध्य के अन्तर्सम्बन्ध सम्मिलित हैं, पर्यावरण कहलाता है।”

Components of Environment / पर्यावरण के घटक

पर्यावरण को वातावरण के वृहद स्तर पर हम दो भागों में विभाजित कर सकते हैं अर्थात् भौतिक एवं जैविक वातावरण। भौतिक वातावरण में पर्यावरण के भौतिक कारक; जैसे-जल, वायु, ताप, वर्षा, वायुमण्डलीय दाब, आदि आते हैं। इन कारकों का अध्ययन मुख्यतया भूगोल में करते हैं। जैविक वातावरण, जिसके अन्तर्गत विभिन्न पादप एवं जन्तु अर्थात् जीवधारी आते हैं, का अध्ययन हम जीवमण्डल के अन्तर्गत करते हैं।

जीवमण्डल Biosphere

जल, स्थल एवं वायु का वह भाग, जिसमें जीवधारी पाए जाते हैं, जीवमण्डल कहलाता है।

जीवमण्डल के भाग Parts of Biosphere

जीवमण्डल के निम्नलिखित तीन भाग होते हैं
(i) स्थलमण्डल (Lithosphere) (ii) जलमण्डल (Hydrosphere) (iii) वायुमण्डल (Atmosphere)

(i) स्थलमंडल

इस भाग में ठोस पदार्थ; जैसे- मृदा, चट्टानें, खनिज एवं अन्य पदार्थ सम्मिलित हैं। इस मण्डल की ऊपरी परतें (जो मृदा का निर्माण करती हैं), जीवन के पोषण के लिए हमेशा उपयुक्त होती हैं। इस मण्डल के ठोस पदार्थों में मुख्य रूप से कार्बोनेट्स, ऑक्साइड्स, सिलीकेट्स, सल्फेट, आदि के रूप में अनेक सरल तथा जटिल कार्बनिक एवं अकार्बनिक यौगिक सम्मिलित हैं। इसमें अनेक प्रकार के जीव-जन्तु, पादप एवं सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं। ये स्थलीय जीव कहलाते हैं।

(ii) जलमंडल

इस भाग में स्थिर या अस्थिर जल एवं लवणीय या अलवणीय जल पाया जाता है। जीवन का प्रारम्भ इसी मण्डल में हुआ था। अतः कुछ शर्तों के साथ यह मण्डल जीवन के लिए अति उपयुक्त है। इस मण्डल में जल एवं इसमें घुले हुए कार्बनिक अकार्बनिक यौगिक (गैसों सहित) सम्मिलित हैं। इसमें अनेक प्रकार के जलीय जीव-जन्तु, पादप एवं सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं। ये जलीय जीव कहलाते हैं।

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(iii) वायुमंडल

यह जलमण्डल एव स्थलमण्डल में आस-पास का गैसों का आवरण है। यहाँ भी जीवन सम्भव है। यह मण्डल स्थल एवं जल में उपस्थित सभी जीवों के लिए गैसीय विनिमय में अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें विभिन्न गैसें सम्मिलित हैं, जिसमें मुख्य रूप से नाइट्रोजन (78%), ऑक्सीजन (21%), कार्बन डाइऑक्साइड (0.03%), जल वाष्प, आदि हैं। स्थलीय जीवों के शरीर का अधिकांश भाग इसी के सम्पर्क में रहता है।

जीवमण्डल में जीवों के संगठन तथा व्यवस्था के विभिन्न स्तर

समस्त जीवमण्डल के जीवधारियों को अध्ययन की सुगमता के लिए संगठन एवं व्यवस्था को निम्न स्तरों में व्यवस्थित किया जाता है।

(i) परमाणवीय एवं अण्विक स्तर (Atomic and Molecular Level) – सजीवों का शरीर अनेक प्रकार के कार्बनिक पदार्थों, जो स्वयं परमाणुओं, अणुओं, आदि से बने हैं, के द्वारा निर्मित होता है। इन सभी पदार्थों का विशेष संगठित रूप जीवद्रव्य के रूप में प्रदर्शित होता है।
(ii) कोशिका स्तर (Cellular Level) – कोशिका जीवन की वह इकाई है, जो संरचनात्मक कार्यात्मक तथा आनुवंशिक रूप से स्वतन्त्र होती है।  जीवों के शारीरिक संगठन का प्रथम स्तर है।
(iii) ऊतक स्तर (Tissue Level) ऐसी कोशिकाओं का समूह, जिनकी उत्पत्ति, संरचना एवं कार्य में समानता होती हैं, ऊतक कहलाते हैं। यह स्तर सजीवों के शारीरिक संगठन में द्वितीय स्तर है।
(iv) अंग स्तर (Organ Level) – विभिन्न ऊतकों का समूह, जो मिलकर एक ही विशिष्ट कार्य का सम्पादन करता है, अंग की श्रेणी में आता है।
(v) अंग तन्त्र स्तर (Organ System Level) – विभिन्न अंगों का समूह, जो सम्पूर्ण जीव में एक विशिष्ट कार्य करता है, अंग तन्त्र कहलाता है। जटिल जीवों में यह स्तर प्रथम दृष्यमान स्तर की तरह माना जाता है। वैसे यह सजीवों के शारीरिक संगठन का तृतीय स्तर है।
(vi) जीव (Organisms) – एक स्वतन्त्र प्राणी, जो अनेक प्रकार के अंग तन्त्रों के साथ कार्य करने के फलस्वरुप बना है। यह जीवमडल में व्यवस्था का प्रथम स्वतन्त्र स्तर होता है।
(vii) समष्टि (Population) – समान आकार-प्रकार (आनुवंशिक, आकृति, आदि) एवं आपस में जनन कर सकने वाले जीव एक ही जाति से सम्बन्धित होते हैं। एक जाति के जीवों की संख्या, जो एक निश्चित समय में एक निश्चित स्थान पर रहती है, समष्टि कहलाती है। मृत्यु दर, घनत्व, वृद्ध वक्र, प्रवास, आदि समष्टि के गुण हैं।
(viii) समुदाय (Community) – किसी निश्चित समय में एक स्थान पर रहने वाले जीवों की सभी समष्टियाँ आपस में मिलकर अन्तर्सम्बन्धों द्वारा समुदाय का निर्माण करती हैं।
(ix) पारितन्त्र (Ecosystem) – अनेक समुदायों एवं उनके वातावरणीय कारकों के मध्य होने वाले अन्तर्सम्बन्धों (जिसमें सभी अजैविक और जैविक घटक सम्मिलित हैं) का सम्पूर्ण तन्त्र पारितन्त्र कहलाता है।
(x) जीवोम (Biome) – अनेक पारितन्त्रों के समूह को ही जीवोम कहते हैं। विभिन्न प्रकार के जीवोम पारितन्त्र आपस में मिलकर जीवमण्डल का निर्माण करते हैं। अतः यह जीवमण्डल में व्यवस्था का अन्तिम स्तर होता है।

पारिस्थितिकी एवं पारितन्त्र Ecology and Ecosystem

‘पारिस्थितिकी या इकोलॉजी (Ecology)’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अर्नेस्ट हैकल (Ernest Hacckel; 1866) ने किया था। इनके अनुसार ‘जीवधारियों के कार्बनिक (Organic) तथा अकार्बनिक (Inorganic) कहते हैं। वातावरण और पारस्परिक सम्बन्धों के अध्ययन को पारिस्थितिकी (Ecology) प्रो. आर मिश्रा (Prof. R Mishra) को भारतीय पारिस्थितिकी का जनक (Father of Indian Ecology) कहते हैं।’

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पारितन्त्र के घटक

पारितन्त्र की संरचना के दो घटक (जैविक और अजैविक) होते हैं। इन घटकों को निम्न आरेख द्वारा समझा जा सकता है –

1. अजैविक घटक Abiotic Components

इसमें सभी निर्जीव पदार्थ सम्मिलित हैं। इन्हें निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है–

(i) भौतिक (Physical)

पारितन्त्र के भौतिक घटक किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले जैविक घटकों की संख्या का नियमन करते हैं। इनमें निम्न कारक सम्मिलित हैं।
(a) प्रकाश सूर्य प्रकाश का सबसे बड़ा स्रोतं है। प्रकाश के कारण ही हरे पादप प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा भोजन बना पाते है।
(b) ताप यह भी सजीवों को प्रभावित करता है। विभिन्न स्थलों पर ताप में भिन्नता के कारण जीवों व पादपों में भी भिन्नता पाई जाती है।
(c) मृदा स्थलीय पादपों व जीवों के जीवन का आधार मृदा है। मृदा में भिन्नता आने पर उस स्थान की जीवों व पादपों की जातियों में भी भिन्नताएँ आ जाती हैं।
(d) जल जलीय जीव तथा अन्य प्राणियों के लिए जल भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है, जो जीवन को प्रभावित करता है।
(e) जलवायु वर्षा, आर्द्रता, ताप, दाब, आदि कारक भी महत्त्वपूर्ण एवं नियन्त्रक भौतिक कारक है। जलवायु एक स्थिर व सबसे महत्त्वपूर्ण घटक है।

(ii) कार्बनिक (Organic)

इसमें सभी कार्बनिक पदार्थ सम्मिलित हैं; उदाहरण- प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, आदि। ये समस्त पदार्थ किसी भी करते हैं। पारितन्त्र के जैविक और अजैविक घटकों के मध्य सम्बन्ध स्थापित

(iii) अकार्बनिक (Inorganic)

इसमें मृदा, जल या वायु में पाए जाने वाले विभिन्न अकार्बनिक तत्व सम्मिलित हैं, जो पारितन्त्र को प्रभावित करते हैं। सर्वप्रथम उत्पादकों (हरे पेड़-पौधों) द्वारा इन अकार्बनिक पदार्थों को पारितन्त्र में ग्रहण किया जाता है; उदाहरण- ऑक्सीजन (O2), कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), नाइट्रोजन (N), पोटैशियम (K), मैग्नीशियम (Mg), लौह (Fe), सल्फर (S), आदि।

2. जैविक घटक Biotic Components

इसके अन्तर्गत सजीवों (Living organisms ) को रखा गया है। पोषण के आधार पर जैविक घटक निम्न तीन प्रकार के होते हैं।
(i) उत्पादक (Producer)

प्रत्येक हरे पेड़, पादप प्लवक, शैवाल, आदि, जिनमें पर्णहरिम पाया जाता है, उत्पादक कहलाते हैं। ये सूर्य के प्रकाश में जल व कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग कर ग्लूकोस जैसे जटिल कार्बनिक अणुओं के रूप में भोजन का निर्माण करते हैं।

                     पर्णहरिम
6CO2 + 12H2O   CgH12O6 + 6H2O + 602
                 सूर्य का प्रकाश

इस अभिक्रिया में ऑक्सीजन (O,) सहउत्पाद के रूप में प्राप्त होती है।

(ii) उपभोक्ता (Consumer)

वे जीव, जो पादपों से अथवा अन्य जीवों से अपना भोजन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त करते हैं, उन्हें उपभोक्ता कहते हैं। ये निम्नलिखित प्रकार के हो सकते हैं।
(a) प्राथमिक उपभोक्ता (Primary Consumer) वे जीव, जो हरे पादपों से प्रत्यक्ष रूप में भोजन प्राप्त करते हैं, प्राथमिक उपभोक्ता कहलाते हैं। यह पूर्णतया शाकाहारी (Herbivores) होते हैं; उदाहरण-हिरन, खरगोश, चीतल, गधा, नील गाय, आदि।
(b) द्वितीयक उपभोक्ता (Secondary Consumer) वे जीव, जो प्राथमिक उपभोक्ताओं से प्रत्यक्ष रूप से भोजन प्राप्त करते हैं अर्थात् शाकाहारी प्राथमिक उपभोक्ताओं को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं, द्वितीयक उपभोक्ता कहलाते हैं। ये माँसाहारी होते हैं; उदाहरण-भेड़िया, साँप, लोमड़ी, मेंढक, आदि।
(c) तृतीयक उपभोक्ता (Tertiary Consumer) वे जीव, जो द्वितीयक उपभोक्ता या अन्य माँसाहारी जीवों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं, तृतीयक उपभोक्ता कहलाते हैं; उदाहरण- शेर, चील, बाघ, शार्क, तेन्दुआ, आदि।
(d) सर्वाहारी जीव (Omnivores) ये जीव अपना भोजन उत्पादकों से या प्राथमिक, द्वितीयक अथवा तृतीयक उपभोक्ताओं के रूप में प्राप्त करते हैं, वे सर्वाहारी अर्थात् कुछ भी ग्रहण करने वाले जीव कहलाते हैं; उदाहरण-मनुष्य, सूअर, कौआ, गिलहरी, आदि।

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(iii) अपघटक (Decomposer)

वे सूक्ष्मजीव, जो मृत या सड़े-गले जीवों से कार्बनिक पदार्थों के रूप में भोजन प्राप्त करते हैं, अपघटक या मृतोपजीवी कहलाते हैं; उदाहरण- सूक्ष्मजीव, जीवाणु, कवक, चींटी, दीमक, आदि। इनके अतिरिक्त जैविक घटकों के कुछ सहायक कारक निम्न प्रकार परिभाषित किए जाते हैं

अपमार्जक (Scavanger) वे बड़े जीव, जो मृत देह को खाते अपमार्जक कहलाते हैं; उदाहरण – गिद्ध, चील, आदि।

परभक्षी (Predator) वे जीव, जो दूसरे जीवों को मारकर खाते हैं, परभक्षी कहलाते हैं; उदाहरण- शेर, चीता, भेड़िया, साँप, आदि।

परजीवी (Parasitic) वे जीव, जो दूसरे जीवों के शरीर में या शरीर में रहकर उनसे अपना भोजन प्राप्त करते हैं, परजीवी कहलाते हैं। ये अपने पोषक को हानि पहुँचाते हैं; उदाहरण- फीताकृमि, गोलकृमि, जोंक, अमरबेल, आदि।

पारितन्त्र में ऊर्जा प्रवाह
The Energy Flow in Ecosystem

पारितन्त्र में ऊर्जा प्रवाह को ऊष्मागतिकी के सार्वभौमिक नियमों के द्वारा समझा जा सकता है, जिसके अनुसार
(i) ऊर्जा न तो नष्ट होती है, न ही उसे उत्पन्न किया जा सकता है। अतः सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की कुल ऊर्जा नियत है।
(ii) ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप में रूपान्तरित किया जा सकता है किन्तु इस कार्य में कुछ भाग व्यर्थ हो जाता है। अतः ऊर्जा का 100% रूपान्तरण असम्भव है। इन्हीं नियमों को ध्यान में रखते हुए लिंडमान (Lindeman; 1942) ने ऊर्जा का 10% का नियम दिया। जिसके अनुसार, किसी पारितन्त्र में ऊर्जा का एक जीव या पोषी स्तर से दूसरे जीव या पोषी स्तर में केवल 10% भाग ही स्थानान्तरित होता है तथा शेष 90% भाग जीवों द्वारा अपने स्वयं के विभिन्न क्रिया-कलापों; जैसे-उत्सर्जन, श्वसन, आदि में व्यर्थ हो जाता है। हरे पादप या उत्पादक प्रत्येक ऊर्जा प्रवाह के प्रक्रम में प्रारम्भिक चरण होते हैं। ऊर्जा की आवश्यकता के कारण ही प्रत्येक जीव भोजन ग्रहण करता है। अतः ऊर्जा प्रवाह के इस प्रक्रम में आने वाला प्रत्येक जीव एक पोषक स्तर की तरह माना जाता है। पोषक स्तर में ऊर्जा प्रवाह सदैव एकदिशीय होता है। इसे निम्न प्रकार दर्शाया जा सकता है।

नोट –  जब दो पारितन्त्र आपस में मिलते हैं, तो उनके मध्य में बना संक्रमण क्षेत्र, जहाँ दोनों तरह की वनस्पति व जीव पाए जाते हैं। इकोटोन (Ecotone) कहलाता है; उदाहरण-स्थल और समुद्र के मिलने पर बना दलदली क्षेत्र।

भिन्न-भिन्न वैज्ञानिकों द्वारा पारितन्त्र को भिन्न-भिन्न नामों;
जैसे-बायोसिनोसिस (Biocoenosis), माइक्रोकोस्म (Microcosm),फोर्ब्स (Forbes), आदि से जाना गया किन्तु ‘इकोसिस्टम (Ecosystem) शब्द सर्वाधिक प्रचलन में हैं।

                             ◆◆◆ निवेदन ◆◆◆

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