समय समय पर हमें छोटी कक्षाओं में या बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में निबंध लिखने को दिए जाते हैं। निबंध हमारे जीवन के विचारों एवं क्रियाकलापों से जुड़े होते है। आज hindiamrit.com आपको निबंध की श्रृंखला में national integration essay in hindi | राष्ट्रीय एकता पर निबंध प्रस्तुत करता है।
Contents
national integration essay in hindi | राष्ट्रीय एकता पर निबंध
इस निबंध के अन्य शीर्षक / नाम
(1) राष्ट्रीय एकता एवं सुरक्षा पर निबंध
(2) राष्ट्रीय एकता और अखंडता निबंध
(3) राष्ट्रीयता एवं सुरक्षा पर निबंध
(4) वर्तमान परिवेश में राष्ट्रीय एकता का स्वरूप पर निबंध
national integration essay in hindi | राष्ट्रीय एकता पर निबंध
पहले जान लेते है national integration essay in hindi,राष्ट्रीय एकता पर निबंध,rashtriy ekta par nibandh की रूपरेखा ।
निबंध की रूपरेखा-
1. प्रस्तावना
2. राष्ट्रीयता
3. भावात्मक एकता
4. राष्ट्रीयता की आवश्यकता
5. राष्ट्रीयता के अभाव के कारण
(क) प्रांतीयता (ख)भाषा-विवाद (ग)संकीर्ण मनोवृत्ति
6.वर्तमान स्थिति
7. उपसंहार

national integration essay in hindi | राष्ट्रीय एकता पर निबंध
प्रस्तावना
भारत एक विशाल देश है – उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक, पूर्व में नागालैंड से लेकर पश्चिम में गुजरात तक भारत माता का विशाल भव्य रूप सर्वदर्शनीय एवं पूजनीय है।
भारत में अनेक प्रदेश हैं। यहांँ के निवासियों में अत्यधिक विविधता तथा अनेकरूपता है।
तथापि इस विभिन्नता एवं अनेकरुपता में भी एक ऐसी एकता विद्यमान है जो हम सब को एक-दूसरे से मिलाए हुए है।
एक ऐसा महत्वपूर्ण सूत्र है जो विविध मणियों को जोड़कर एक सुंदर बहुरंगी माला का रूप दे देता है।
यह सूत्र ही हमारी भावनात्मक एकता है। यह भावनात्मक एकता ही संपूर्ण राष्ट्र में एक राष्ट्रीयता को जन्म देती है।
राष्ट्रीयता
राष्ट्रीयता की भावना ही वह ज्वलंत भावना है जो किसी देश के नागरिकों में देश-प्रेम और आत्म-गौरव की भावना पैदा करती है।
इस पुनीत भावना के जाग्रत होने पर ही किसी राष्ट्र के नागरिक राष्ट्र के लिए हंँसते-हंँसते अपने प्राणों का बलिदान कर देते हैं।
यह वह भावना है जो संपूर्ण देश के नागरिकों में एकता की इस भावना को जन्म देती है कि राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक मेरा भाई मेरा भाई है, उसकी सहायता व सहयोग करना मेरा परम कर्तव्य है।
राष्ट्रीयता की भावना ही नागरिकों के हृदय में मातृभूमि का श्रद्धामय मातृरूप अंकित करती है।
राष्ट्र की धरती हमारी माता है उसका अन्न-जल खाकर हम पलते हैं, उसकी गोद में पलकर हम पुष्ट होते हैं और उसकी वायु में श्वास लेकर ही हम प्राणवान होते हैं।
उस मातृभूमि का कण-कण हमारे प्राणों से प्यारा है। उसके कण-कण की रक्षा करना हमारा परम धर्म है।
मातृभूमि के इस समग्र और अखंड रूप की रक्षा करने की भावना का मूल स्रोत राष्ट्रीयता की भावना ही है।
राष्ट्रीयता के इस पवित्र भावना के अभाव में किसी देश का उत्थान और समृद्धि तो दूर की बात है, उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है।
भावनात्मक एकता
हमारी राष्ट्रीयता का मूल आधार हमारी भावनात्मक एकता है। हमारे इस विशाल देश में भाषा, वेशभूषा रहन-सहन, खान-पान संबंधी अनेक विषमताएँ हैं।
धर्मों और जातियों में अनेकता है तथापि हम सब एक हैं। इस एकता और अखंडता का आधार भावनात्मक और सांस्कृतिक एकता है।
हमारी संस्कृत अविभाज्य है। विभिन्न धर्मों के होते हुए भी हमारी भावना एक है।
बाहरी जीवन, वेशभूषा आज में भेद होते हुए भी हमारा जीवन-दर्शन एक है। हम मानव मात्र में एकता के दर्शन करते हैं।
यही हमारा जीवन-दर्शन है। भारतीय संस्कृति में पलने वाला हर नागरिक प्रतिदिन पूजा के समय कामना करता है-
“सर्वे भवंतु सुखिनः , सर्वे संतु निरामया: ।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दु: खभाग् भवेत्।।”
प्राणी मात्र को सुखी बनाना ही भारतीयों का मुख्य उद्देश्य है। हमारा यह उद्देश्य ही राष्ट्रीयता से ऊपर उठाकर हमें अंतरराष्ट्रीयता की ओर ले जाता है।
राष्ट्रीयता की आवश्यकता
राष्ट्र की एकता, अखंडता एवं सार्वभौम सत्ता बनाए रखने के लिए राष्ट्रीयता की भावना का उदय होना परमावश्यक है।
यही वह भावना है जिसके कारण राष्ट्र के नागरिक अपने राष्ट्र के सम्मान, गौरव और हितों का चिंतन करते हैं।
हमारे देश में विगत वर्षों से राष्ट्रीयता की भावना कुछ दबने लगी है। अनेक दल उठ खड़े हुए हैं और लोगों का नैतिक पतन हुआ है।
सब स्वार्थ के वशीभूत होकर राष्ट्र के हित को भूलकर अपनी-अपनी सोचने लगे हैं। “अपना भर, और की फिक्र मत कर” – की भावना पनपने लगी है।
प्रादेशिकता, जातीयता तथा भाई-भतीजावाद इतना बढ़ गया है कि देश का भविष्य अंधकारमय दिखाई पड़ने लगा है।
संकट के इस समय में हमें विवेक से काम लेना चाहिए। हमारे नेताओं और सरकार को चाहिए कि वे स्वार्थ का त्याग करें, कुर्सी का मोह छोड़ें, अपने राजनैतिक लाभ के लिए देश को संकट में ना डालें।
सरकार और मंत्रियों को चाहिए कि वह स्वार्थ से ऊपर उठ कर राष्ट्र के कल्याण की बात सोचें। यदि ऐसा न हुआ तो देश कहांँ जाएगा, कहना कठिन है।
राष्ट्रीयता के अभाव के कारण
किसी राष्ट्र में राष्ट्रीयता का अभाव तभी होता है जब वहांँ के निवासियों के हृदय से भावनात्मक एकता नष्ट हो जाती है।
संकीर्ण भावनाएंँ पारस्परिक भेद की दीवारें खड़ी कर देती हैं और विभिन्न वर्गों के लोग अपने स्वार्थों में फंस जाते हैं।
सभी लोग अपना भला चाहने लगते हैं और दूसरों का हित करने लगते हैं। हमारे देश में या वर्गवाद कई रूपों में पनप रहा है।
(क) प्रांतीयता
कभी-कभी प्रांतीयता की संकीर्ण भावना इतनी प्रबल हो जाती है कि वह राष्ट्रीयता को दबा देती है।
लोग यह भूल जाते हैं कि राष्ट्र रुपी देवता के शरीर का यदि एक अंग हृष्ट-पुष्ट हो जाए और अन्य अंग दुर्बल हो जाएंँ तो दुर्बल अंगों की दुर्बलता का प्रभाव हृष्ट-पुष्ट अंग पर भी पड़ेगा।
(ख) भाषा-विवाद
भाषा संबंधी विवादों ने राष्ट्रीयता को बहुत आघात पहुंचाया है। इसमें भाषावार प्रांतों की मांग उठती है।
कुछ ही वर्ष पहले दक्षिण भारत में हिंदी के विरोध में ऐसे भयानक उपद्रव हुए जिससे उत्तर भारत के लोगों की भावनाओं को बहुत ठेस पहुंची।
(ग) संकीर्ण मनोवृत्ति
जाति,धर्म और संप्रदाय के नाम पर जब लोगों की विचारधारा संकीर्ण हो जाती है तब राष्ट्रीयता की भावना मंद पड़ जाती हैं।
लोगों के सामने एक महान राष्ट्र का हित न रहकर एक सीमित वर्ग का संकुचित हित-चिंतन मात्र ही रह जाता है।
वर्तमान स्थिति
उपर्युक्त कारणों से हमारे देश में राष्ट्रीयता की भावनात्मक एकता का बहुत हृास हुआ है।
स्वतंत्रता की प्राप्ति के पश्चात तो कुछ ऐसी हवा चली कि राष्ट्र की एकता को काफी धक्का लगा।
उसी का परिणाम है कि आज ‘हिंदुस्तान हमारा है’ के स्थान पर ‘पंजाब हमारा है’ , ‘मद्रास हमारा है’ के नारे लगने लगे हैं।
धर्म, भाषा, जाति तथा वर्ग विशेष के नाम पर देश टुकड़ों में बंँटने लगा है। ये टुकड़े आपस में ऐसे टकराने लगे हैं कि एक दूसरे को चूर-चूर करने को तैयार हो रहे हैं। राष्ट्र पतन के कगार तक पहुंँच गया लगता है।
लोग गांधी,नेहरू और पटेल जैसे नेताओं द्वारा दिखाए गए आदर्शों को भूलकर स्वार्थ में अंधे हो रहे हैं।
उपसंहार
आवश्यकता इस बात की है कि हम राष्ट्रीयता को समझें। हमें केवल अपना नहीं, राष्ट्र का हित सोचना होगा।
राष्ट्र के हित में ही हमारा हित है,राष्ट्रीय सुरक्षा में ही हमारी सुरक्षा है और राष्ट्र के उत्थान एवं विकास में ही हमारा उत्थान और विकास है।
राष्ट्र का विकास चाहने वाले सभी नागरिकों का कर्तव्य है कि वे संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठकर, केवल अपने परिवार या जाति की संकीर्ण भावना को छोड़कर आपसी फूट, कलह और झगड़ों में अपनी शक्ति का अपव्यय न कर राष्ट्र कल्याण के चिंतन में लगे और अपने पास-पड़ोस के लोगों में राष्ट्रीयता की भावना को जगाने का प्रयास करें।
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Final words
दोस्तों हमें आशा है की आपको यह निबंध अत्यधिक पसन्द आया होगा। हमें कमेंट करके जरूर बताइयेगा आपको national integration essay in hindi,राष्ट्रीय एकता पर निबंध कैसा लगा ।
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