रेडियोएक्टिव किरणों  के प्रकार एवं गुण / अल्फा बीटा और गामा कणों का उत्सर्जन

दोस्तों विज्ञान की श्रृंखला में आज हमारी वेबसाइट hindiamrit.com का टॉपिक रेडियोएक्टिव किरणों  के प्रकार एवं गुण / अल्फा बीटा और गामा कणों का उत्सर्जन है। हम आशा करते हैं कि इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आपकी इस टॉपिक से जुड़ी सभी समस्याएं खत्म हो जाएगी ।

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रेडियोएक्टिव किरणों  के प्रकार एवं गुण / अल्फा बीटा और गामा कणों का उत्सर्जन

रेडियोएक्टिव किरणों  के प्रकार एवं गुण / अल्फा बीटा और गामा कणों का उत्सर्जन
रेडियोएक्टिव किरणों  के प्रकार एवं गुण / अल्फा बीटा और गामा कणों का उत्सर्जन

रेडियोएक्टिव किरणों  के प्रकार एवं गुण / अल्फा बीटा और गामा कणों का उत्सर्जन

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रेडियोएक्टिवता या रेडियोसक्रियता क्या है

रेडियोसक्रियता की खोज सन् 1896 में फ्रैंच वैज्ञानिक हेनरी बेकुरल (Henry Becquerel) ने की थी। यद्यपि रेडियोसक्रियता शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम मैरी क्यूरी (Marie Curie) ने किया था। बेकुरल ने देखा कि यूरेनियम लवण के पास रखी काले कागज में लिपटी हुई फोटोग्राफिक (Photographic) प्लेट काली पड़ जाती है। इस प्रयोग से बेकुरल ने यह निष्कर्ष निकाला, कि यूरेनियम अथवा इसके लवणों में से एक प्रकार की अदृश्य किरणें स्वतः ही निकलती रहती हैं, जो कागज को बेधने की क्षमता रखती हैं तथा फोटोग्राफिक प्लेट को काला कर देती हैं। इन किरणों को बेकुरल किरणें या रेडियोधर्मी किरणें कहा गया तथा ऐसे पदार्थों को रेडियोसक्रिय या रेडियोऐक्टिव पदार्थ कहा गया। अतः वे पदार्थ जो प्रकृति में स्वतः विघटित होते रहते हैं तथा जिनसे रेडियोधर्मी किरणें निकलती रहती हैं, रेडियोसक्रिय पदार्थ कहलाते हैं। तथा इनका यह गुण रेडियोऐक्टिवता या रेडियोसक्रियता कहलाता है। परमाणु क्रमांक 83 से आगे के सभी तत्व जैसे यूरेनियम, रेडियम, पोलोनियम, ऐक्टिनियम आदि रेडियोऐक्टिव होते हैं। रेडियोसक्रिय विघटन एक नाभिकीय प्रक्रिया है, अत: यह बाह्य कारकों जैसे ताप, दाब आदि में परिवर्तन के द्वारा प्रभावित नहीं होती है।

नोट – मैरी क्यूरी तथा उनके पति पियरे क्यूरी ने सन् 1898 में यूरेनियम से 30 लाख गुनी रेडियोसक्रियता वाले तत्व रेडियम की खोज, यूरेनियम के खनिज पिचब्लैण्ड से की। इसके लिए सन् 1903 में इन्हें नोबल पुरस्कार दिया गया। एक टन पिचब्लैण्ड में लगभग 0.15 ग्राम रेडियम होता है। मैरी क्यूरी ने स्वयं पिचब्लैण्ड से एक रेडियोसक्रिय तत्व पोलोनियम भी खोजा था।

रेडियोधर्मी किरणों के प्रकार एवं उनके गुण / Types of Radioactive Rays and their Properties

सन् 1902 में रदरफोर्ड ने रेडियोधर्मी किरणों का विस्तार से अध्ययन किया। उन्होंने सीसे के एक छोटे टुकड़े को लेकर उसमें एक छोटा छिद्र बनाकर उसमें रेडियोधर्मी पदार्थ को रखा तथा उस रेडियोधर्मी पदार्थ से उत्सर्जित विकिरणों को स्थिर विद्युत क्षेत्र में प्रवाहित किया। उन्होंने देखा कि कुछ किरणें ऋणावेशित तथा कुछ धनावेशित प्लेट की ओर विक्षेपित हो गयी जबकि कुछ सीधे ही निकल गयी। इस प्रयोग द्वारा उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि रेडियोधर्मी पदार्थ तीन प्रकार की किरणें उत्सर्जित करते हैं। इनको उन्होंने क्रमश: अल्फा बीटा तथा गामा-किरणें कहा। ऋणावेशित तथा धनावेशित प्लेटों की ओर मुड़ने वाली किरणें क्रमश: अल्फा तथा बीटा किरणें कहलाईं तथा उदासीन किरणें गामा-किरणें कहलाईं, क्योंकि किरणें बिना मुड़े सीधी ही निकल गई थीं।

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एल्फा किरणों के गुण ( α-Rays )

ऋणावेशित प्लेट की ओर मुड़ने वाली किरणें – किरणें कहलाती हैं।
इन किरणों के निम्नलिखित गुण हैं।

(i) विद्युत क्षेत्र में ऋणावेशित प्लेट की ओर इनका विक्षेप दर्शाता है कि इनके कण धनावेशित होते हैं।
(ii) ये किरणें चुम्बकीय क्षेत्र में भी विक्षेपित होती हैं। इन किरणों के प्रत्येक कण पर दो इलेक्ट्रॉनों के आवेश के बराबर आवेश होता है तथा द्रव्यमान हाइड्रोजन परमाणु या प्रोटॉन के द्रव्यमान का चार गुना होता है अर्थात् प्रत्येक कण दो प्रोटॉन तथा दो न्यूट्रॉन द्वारा निर्मित होता है। अतः अल्फा -कण वास्तव में हीलियम नाभिक होते हैं।
(iii) इन किरणों की बेधन क्षमता बहुत कम होती है। ये किरणें केवल 0.002 सेमी मोटाई की ऐलुमिनियम की चादर को बेध सकती हैं।
(iv) इन किरणों में गैसों को आयनीकृत करने की क्षमता बहुत अधिक होती है।
(v) ये किरणें कुछ पदार्थ जैसे हीरे, जिंक सल्फाइड आदि पर पड़कर
प्रतिदीप्ति उत्पन्न करती हैं।
(vi) इनका वेग प्रकाश के वेग का 1/10 अर्थात् 3×10^7 मी/से होता है।
(vii) ये किरणें फोटोग्राफिक प्लेट को प्रभावित करती हैं।

बीटा किरणों के गुण ( B-Rays )

धनावेशित प्लेट की ओर मुड़ने वाली किरणें, B-किरणें कहलाती हैं।
इन किरणों के गुण निम्नलिखित हैं –
(i) कैथोड किरणों के समान ये किरणें इलेक्ट्रॉनों से बनी होती हैं। अत: इनका द्रव्यमान नगण्य होता है।
(ii) ये किरणें चुम्बकीय तथा विद्युतीय क्षेत्र में विक्षेपित हो जाती हैं। विक्षेपण की दिशा -किरणों के विपरीत होती है।
(v) इनमें गैसों को आयनित करने की क्षमता α किरणों से कम (1/ 100 गुनी ) होती है।
(iii) ये किरणें न्यूट्रॉन के टूटने से बनती हैं। बीटा-कण के रूप में इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं तथा प्रोटॉन शेष रह जाता है।
(iv) इनकी बेधन क्षमता – किरणों से अधिक होती है, ये 0.2 सेमी मोटी ऐलुमिनियम की चादर को बेध सकती हैं।
(vi) इनका वेग प्रकाश के वेग के लगभग बराबर अर्थात् 3×10^8 मी/से होता है।
(vii) ये किरणें फोटोग्राफिक प्लेट को प्रभावित करती हैं।
(viii) ये जिंक सल्फाइड पर प्रतिदीप्ति उत्पन्न करती हैं।

गामा किरणों के गुण ( Y-Rays )

विद्युत क्षेत्र में विक्षेपित न होकर सीधी चली जाने वाली किरणें, y-किरणें कहलाती हैं। इन किरणों के गुण निम्नलिखित हैं।
(i) ये अत्यन्त लघु (10-18 मी से 10-10 मी) तरंगदैर्ध्य की विद्युत चुम्बकीय तरंगे हैं।
(ii) ये किरणें विद्युत तरंगों के समान दूर भेदी होती हैं। इनकी बेधन क्षमता अल्फा और बीटा-किरणों की अपेक्षा अधिक होती है। ये ऐलुमिनियम की 100 सेमी मोटी चादर को भी बेध सकती हैं।
(iii) ये किरणें विद्युत क्षेत्र या चुम्बकीय क्षेत्र में विक्षेपित नहीं होती हैं।
(iv) इनमें गैसों को आयनित करने की क्षमता अल्फा किरणों की  1/10,000 गुना तथा B-किरणों 1/100की गुना होती है।
(v) इन किरणों का वेग प्रकाश के वेग के बराबर होता है।
(vi) ये किरणें फोटोग्राफिक प्लेट को प्रभावित करती हैं।
(vii) ये किरणें भी जिंक सल्फाइड पर प्रतिदीप्ति उत्पन्न करती हैं।

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रेडियोधर्मी विघटन
Radioactive Disintegration

रेडियोधर्मी तत्वों के नाभिक से रेडियोसक्रिय किरणों के स्वतः उत्सर्जन की प्रक्रिया को रेडियोसक्रिय विघटन या रेडियोधर्मी क्षय (Radioactive decay) कहते हैं। यह प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से स्वतः होने वाली नाभिकीय प्रक्रिया है। यह गुण भारी नाभिक वाले तत्वों में पाया जाता है।

रेडियोसक्रियता की इकाई Unit of Radioactivity

रेडियोसक्रिय पदार्थ की सक्रियता का SI मात्रक बेकुरल तथा अन्य प्रमुख मात्रक क्यूरी व रदरफोर्ड, हैं जिन्हें निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है
(i) क्यूरी ( Curie) – यदि किसी रेडियोसक्रिय पदार्थ में 3.7×10^10 विघटन प्रति सेकण्ड हो, तो उस पदार्थ की सक्रियता 1 क्यूरी कहलाती है। अर्थात्
1 क्यूरी = 3.7×10^10 विघटन/सेकण्ड
1 मिलीक्यूरी (lmCi) = 10^-3 क्यूरी
1 माइक्रोक्यूरी (1 uCi) = 10^-6 ” क्यूरी

(ii) रदरफोर्ड (Rutherford) – यदि किसी रेडियोसक्रिय पदार्थ में 10 विघटन प्रति सेकण्ड हो, तो उस पदार्थ की सक्रियता 1 रदरफोर्ड कहलाती है। अर्थात्
1 रदरफोर्ड = 1 Rd = 10^6 विघटन/से
1 माइक्रो रदरफोर्ड = 10^6 रदरफोर्ड
= 1 विघटन प्रति सेकण्ड
= 1 Bq (बेकुरल)

(iii) बेकुरल (Becquerel) – यह रेडियोसक्रियता का SI मात्रक है तथा रेडियोसक्रिय पदार्थ के 1 विघटन प्रति सेकण्ड को प्रदर्शित करता है।
1 बेकुरल (1 Bq) = 1 विघटन प्रति सेकण्ड

रेडियोसक्रियता का कारण एवं किरणों की उत्पत्ति

रेडियोसक्रियता एक नाभिकीय परिघटना है, जिसमें अस्थायी नाभिक विघटित होता है। नाभिक का स्थायित्व न्यूट्रॉन तथा प्रोटॉन के अनुपात (n/p) पर निर्भर करता है। जिस नाभिक के लिए (n/p) अनुपात 1 होता है, वे स्थायी होते हैं। जिनके लिए यह अनुपात अधिक (1 : 1.5) होता है, वे नाभिक अस्थायी होते हैं। अस्थायी नाभिक में प्रोटॉनों की अपेक्षा न्यूट्रॉनों की संख्या अत्यधिक होती है।
अल्फा तथा बीटा-कणों के साथ इन अस्थायी परमाणुओं के नाभिक y-किरणें भी उत्सर्जित करते हैं और स्थायित्व प्राप्त करते हैं।

रेडियोधर्मी किरणों की उत्पत्ति
Origin of Radioactive Rays

(i) अल्फा-कण उत्सर्जन (Emission of o-particles)

अल्फा-कण एक धनावेशित कण है। इस पर 2 इकाई धनावेश व 4 इकाई द्रव्यमान होता है। वास्तव में -कण ही हीलियम नाभिक (He) होते हैं। नाभिक में उपस्थित 2 प्रोटॉन तथा 2 न्यूट्रॉन परस्पर संयोग द्वारा -कण (2He4) निर्मित करते हैं।

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अल्फा- कण के उत्सर्जन से निर्मित तत्व के परमाणु क्रमांक में 2 इकाई की कमी व द्रव्यमान संख्या में 4 इकाई की कमी हो जाती है।
उदाहरण –
83Bi213  → 81 Tl 209 + 2He
बिस्मथ            थैलियम       (a कण)

(ii) बीटा-कण उत्सर्जन (Emission of B-particles)

वास्तव में B-कण इलेक्ट्रॉन होते हैं, किन्तु नाभिक में इलेक्ट्रॉन नहीं होते। जिस कारण नाभिक में न्यूट्रॉन के टूटने से 3-कण का निर्माण होता है।

नाभिक से एक बीटा-कण निकलने पर प्राप्त तत्व के परमाणु क्रमांक में एक इकाई की वृद्धि हो जाती है, जबकि द्रव्यमान संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
उदाहरण-
83Bi213  → 84 Po 213 + -1e0
बिस्मथ            पोलोनियम       (B कण)

(iii) गामा-किरण उत्सर्जन (Emission of y-particles)

ये किरणें X-किरणों की भाँति विद्युत चुम्बकीय तरंगें होती हैं, परन्तु इनकी आवृत्ति (Frequency) बहुत अधिक तथा तरंगदैर्ध्य (Wavelength) बहुत कम होती है। यह आवेशहीन एवं शून्य द्रव्यमान वाली होती हैं। इनके उत्सर्जन से परमाणु क्रमांक एवं द्रव्यमान संख्या में परिवर्तन नहीं होता है।
नोट –  किसी रेडियोधर्मी तत्व के क्षय (Decay) के समय उत्सर्जित कणों की संख्या को निम्न सूत्रों द्वारा ज्ञात किया जा सकता है

अल्फा कणों की संख्या – परमाणु भार के कमी / 4

B-कणों की संख्या = 2 x उत्सर्जित अल्फा कणों की संख्या – (परमाणु क्रमांक में कमी)

कृत्रिम रेडियोऐक्टिवता Artificial Radioactivity

हल्के स्थायी नाभिकों पर तीव्रगामी कणों (जैसे- अल्फा ,बीटा आदि) की बौछार द्वारा उन्हें रेडियोधर्मी नाभिक में परिवर्तित करने का प्रक्रम कृत्रिम रेडियोऐक्टिवता कहलाता है। इसकी खोज आइरीन क्यूरी तथा एफ क्यूरी ने 1939 में की थी।
उदाहरण – ऐलुमिनियम नाभिक पर अल्फा कणों की बौछार करने पर यह एक न्यूट्रॉन का उत्सर्जन करके अस्थायी फॉस्फोरस समस्थानिक [15P30] में परिवर्तित हो जाता है, यह अस्थायी नाभिक स्वतः ही विघटित होकर सिलिकॉन नाभिक में परिवर्तित हो जाता है।

                             ◆◆◆ निवेदन ◆◆◆

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