कोशिका के अंग / Organelles of a cell in hindi

दोस्तों विज्ञान की श्रृंखला में आज हमारी वेबसाइट hindiamrit.com का टॉपिक कोशिका के अंग / Organelles of a cell in hindi है। हम आशा करते हैं कि इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आपकी इस टॉपिक से जुड़ी सभी समस्याएं खत्म हो जाएगी ।

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कोशिका के अंग / Organelles of a cell in hindi

कोशिका के अंग / Organelles of a cell in hindi

कोशिका के अंग / Organelles of a cell in hindi

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कोशिकांग या कोशिका के अंग Cell Organelles

(कोशिकाओं में उपस्थित कोशकांगों को निम्न दो मुख्य वर्गों में विभक्त कर सकते हैं)
(i) द्विकलीय कोशिकांग (Double Membrane Organelle) अर्थात् वे कोशिकांग, जिनका आवरण दो कलाओं द्वारा बना होता है; जैसे-अन्तःप्रद्रव्यी जालिका, माइटोकॉण्ड्रिया, लवक, आदि।
(ii) एककलीय कोशिकांग (Single Membrane Organelle) एस कोशिकांग, जिनमें आवरण एक ही कला का बना है या जिनमें आवरण पूर्णतया अनुपस्थित है; जैसे-लयनकाय, राइबोसोम, आदि।) यहाँ अध्ययन की सरलता के लिए हम जटिल संरचनाओं का अध्ययन पहले करेंगे और फिर सरल संरचनाओं का। अतः कोशिकांगों के अध्ययन की शुरुआत हम कोशिका के केन्द्र बिन्दु अर्थात् केन्द्रक से करेंगे।

(1) केन्द्रक Nucleus

यह कोशिका का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग है। सन् 1831 में रॉबर्ट ब्राउन (Robert Brown) ने इसकी खोज की थी। प्रायः एक कोशिका में एक ही केन्द्रक पाया जाता है किन्तु शैवाल क्लैडोफोरा में एक से ज्यादा केन्द्रक भी पाए जाते हैं। यह कोशिका की सभी क्रियाविधियों पर नियन्त्रण रखता है। अतः यह कोशिका का नियन्त्रण केन्द्र है। इसीलिए इसे कोशिका का नियन्त्रण कक्ष (Control chamber) भी कहते हैं।

केन्द्रक की संरचना Structure of Nucleus

केन्द्रक प्रायः गोलाकार होता है और संरचनात्मक रूप से इसे प्रायः चार प्रमुख भागों में बाँटते हैं
(i) केन्द्रक कला (Nuclear Membrane) केन्द्रक के चारों ओर दोहरी कला का आवरण होता है जिनके मध्य परिकेन्द्रीय अवकाश (Perinuclear space) होता है। प्रत्येक कला 75 A मोटी होती है तथा परिकेन्द्रीय अवकाश 100-300 A तक होता है। इसमें लगभग 400 के सूक्ष्म छिद्र पाए जाते हैं, जिन्हें केन्द्रीय छिद्र (Central pore) कहते हैं। कुछ स्थानों पर ये कलाएँ अन्तः प्रद्रव्यी जालिका से जुड़ी रहती हैं, जिन पर राइबोसोम्स पाए जाते हैं। इन कलाओं का मुख्य कार्य कोशिकाद्रव्य व केन्द्रकद्रव्य को पृथक् करना है। केन्द्रीय छिद्र द्वारा इन द्रव्यों के मध्य विभिन्न पदार्थों का आवागमन होता है।
(ii) केन्द्रकद्रव्य (Nucleoplasm) केन्द्रक के अन्दर भरे पारदर्शी, अर्द्धतरल,प्रोटीन युक्त व विशिष्ट माध्यम को ही केन्द्रकद्रव्य या केन्द्रक रस (Nucleoplasm or karyoplasm or karyolymph) कहते हैं। यह सॉल अवस्था में होता है, किन्तु आवश्यकतानुसार जैल में परिवर्तित हो जाता है। इसमें केन्द्रिका व गुणसूत्र निलम्बित अवस्था में पाए जाते हैं।
(iii) केन्द्रिका (Nucleolus) इसकी खोज फोन्टाना (Fontana) ने की थी व ‘न्यूक्लियोलस’ नाम बोमन (Bomen) ने दिया। इसे कैरियोसोम (Karyosome) अथवा एन्डोसोम (Endosome) भी कहते हैं। यह गोल या अण्डाकार होती है तथा अन्तरावस्था (Interphase) में स्पष्ट दिखती बन जाती हैं। है। विभाजन के समय प्रोफेज अवस्था में लुप्त होकर अन्त्यावस्था में पुन: प्रायः एक केन्द्रक में एक ही केन्द्रिका होती है। इसमें राइबोसोम के निर्माण में उपयोग होने वाले सभी अवयवों से सम्बन्धित सामग्री होती है अर्थात् प्रमुख स्रोत होता है। केन्द्रक का यह भाग कोशिका में पाए जाने वाले राइबोसोम के निर्माण का है।
(iv) गुणसूत्रीय जालक (Chromatin Reticulum) केन्द्रकद्रव्य में लम्बी धागेनुमा संरचनाओं का जाल पाया जाता है, जिसे गुणसूत्रीय जाल अथवा जालक कहते हैं। कोशिका विभाजन के समय यही संघनित होकर गुणसूत्र बन जाते हैं। इन पर जीन के रूप में DNA पाया जाता है। कुछ स्थानों पर गुणसूत्रीय जालक अधिक सघन मजबूत व गूंथे होते हैं, जिसे विषम गुणसूत्रीय जालक (Heterochromatin) कहते हैं तथा कुछ स्थानों पर यह कम सघन वं दीला गूंथा होता है, जिसे सुगुणसूत्रीय जालक (Euchromatin) कहते हैं।

केन्द्रक के कार्य Functions of Nucleus

(i) आनुवंशिक गुणों को नियन्त्रित करता है।
(ii) उपापचयी व अन्य जैविक क्रियाओं का नियन्त्रण करता है।
(iii) कोशिका विभाजन को नियन्त्रित करता है।
(iv) DNA की पुनरावृत्ति (Replication) व अनुलेखन (Transcription) में सहायक है।
(v) प्रोटीन निर्माण सम्बन्धी सभी कूट सूचनाएँ संग्रहित रखता है।
उपरोक्त से यह स्पष्ट है, कि अन्तरावस्था में पाए जाने वाला गुणसूत्रीय जालक केन्द्रक का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग है, जोकि कोशिका विभाजन के समय गुणसूत्र में परिवर्तित हो जाता है।

(2) माइटोकॉण्ड्रिया Mitochondria

‘माइटोकॉण्ड्रिया’ ग्रीक भाषा के दो शब्दों अर्थात् माइटो- ‘धागा या सूत्र’ व कॉण्ड्रिया- ‘कणिका’ से बना है अर्थात् यह कणिकामय धागेनुमा संरचना है। इसलिए इसे ‘सूत्रकणिका’ भी कहते हैं।
सन् 1880 में कोलीकर (Kolliker) ने सर्वप्रथम कीटों की पेशियों में से इसे खोजा। फ्लेमिंग (Fleming) ने ‘फाइला’ व अल्टमान (Altman) ने इसे ‘बायोप्लास्ट’ कहा। बेन्डा (Benda) ने इसे माइटोकॉण्ड्रिया कहा तथा एफ मवेस (F Maves) ने 1904 में सर्वप्रथम इसे पादपों (निम्फिया) में खोजा। माइटोकॉण्ड्रिया में 65-70% प्रोटीन, 0.5% RNA, 25% फॉस्फोलिपिड व कुछ मात्रा में DNA होता है। पूर्वकेन्द्रकीय कोशिका व वयस्क स्तनी की RBCs में यह अनुपस्थित होता है। इसका औसत व्यास 0.05-0.14 व लम्बाई 5-8 के मध्य होती है। प्रायः कोशिका में इनकी संख्या 50-5000 तक होती है। इसे कोशिका का शक्तिगृह या बिजलीघर (Power house) कहते हैं, क्योंकि श्वसन की क्रिया द्वारा ऊर्जा (ATP) का उत्पादन यहीं होता है।

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माइटोकॉण्ड्रिया की संरचना Structure of Mitochondria

माइटोकॉण्ड्रिया एक दोहरी इकाई कला से बनी संरचना है, जो 60Å तक मोटी होती है। इसकी बाहरी कला सपाट होती है तथा दोनों कलाओं के मध्य 80-100 A तक का रिक्त स्थान होता है, जिसे अन्तर कलावकाश (Intermembrane space) कहते हैं। इस अन्तर कलावकाश में तरल भरा रहता है। माइटोकॉण्ड्रिया के केन्द्र में आधार द्रव्य भरा होता है। इसकी आन्तरिक कला कई वलनों द्वारा उभारों व गर्तों का निर्माण करती है, जिन्हें क्रिस्टी (Cristae) कहते हैं। क्रिस्टी के अन्दर के अवकाश को आन्तरक्रिस्टी (Intracristae space) कहते हैं। आधार द्रव्य में कणिकाएँ, तन्तुक, प्रोटीन, वसा, वृत्ताकार नग्न DNA एवं 70 S राइबोसोम, आदि पाए जाते हैं। माइटोकॉण्ड्रिया में यही श्वसन सम्बन्धित अभिक्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। क्रिस्टी में भीतर की ओर अनेक घुण्डीनुमा संरचनाएँ पाई जाती हैं, जिन्हें CF-कण या प्रारम्भिक कण या ऑक्सीसोम कहते हैं। इनका व्यास 70-100 एंगेष्ट्राम होता है। पारसन्स (Parsans) नामक वैज्ञानिक ने इन्हें इलेक्ट्रॉन अभिगमन कण (Electron Transportation Particle-ETP) कहा। F-कण एक-दूसरे से 100 A की दूरी पर पाए जाते हैं व एक माइटोकॉण्ड्रिया में इनकी संख्या 10^4-10^5 तक हो सकती है। F-कण के तीन निम्न भाग होते हैं।
(i) शीर्ष (Head); व्यास 75-100 A होता है।
(ii) वृन्त (Stalk); लम्बाई 50 A होती है।
(iii) आधार (Base); व्यास 75-100 A होता है।
नग्न DNA, राइबोसोम (708), एन्जाइम, आदि के
कारण इसमें स्वतः जनन का गुण पाया जाता है। अतः यह एक अर्द्धस्वायत्त (Semiautonomous) अंग है।

नोट – माइटोकॉण्ड्रिया को जेनस-ग्रीन बी नामक अभिरंजक द्वारा अभिरंजित करके देखते हैं। माइटोकॉण्ड्रिया ताप के प्रति संवेदी होते हैं। यह 48.5°C पर अचानक पिघल जाते हैं।

माइटोकॉण्ड्रिया के कार्य Functions of Mitochondria

(i) कार्बोहाइड्रेट के ऑक्सीकरण द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करना।
C6H1206 + 602-
एन्जाइम→ 6CO2 + 6H2O + ऊर्जा
(ii) वसा का उपापचय करना।
(iii) शुक्राणु को गति हेतु ऊर्जा प्रदान करना।
(iv) ऑक्सीकृत श्वसन क्रिया द्वारा ADP (एडीनोसीन डाइफॉस्फेट) से ATP (एडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट) का निर्माण करना। यह प्रक्रिया क्रैब चक्र, इलेक्ट्रॉन अभिगमन तन्त्र व फॉस्फोरिलेटिंग तन्त्र द्वारा पूर्ण होती है।
(v) कैल्शियम का संचय व स्त्रावण करना।

(3) लवक Plastid

हेकल (Haeckel) ने लवकों की खोज की। ये प्रोप्लास्टिड्स से बनते हैं। ‘प्लास्टिड’ (Plastid) ग्रीक शब्द है, जिसका अर्थ ढ़ाला या बनाया हुआ है। इस शब्द का प्रयोग 1885 में ए एफ डब्ल्यू शीमर (AFW Schimer) ने किया। कवक, जीवाणु, नील-हरित शैवाल के अलावा सभी पादपों में लवक मिलते हैं।

रंग के आधार पर लवक तीन प्रकार के होते हैं
(i) हरितलवक (Chloroplast) यह हरे रंग का लवक हैं। इनकी खोज शिम्पर (Schimper) ने की थी। ये पादपों के हरे रंग का कारण होते हैं तथा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा भोजन (कार्बनिक पदार्थ) व ऑक्सीजन बनाते हैं। इसी लवक के कारण हरे पादप स्वपोषी (उत्पादक) है व धरती पर जीवन सम्भव है; उदाहरण-हरे पादप, यूलोथ्रिक्स, क्लैमाइडोमोनास, आदि।
(ii) वर्णी लवक (Chromoplasts) यह पादप के ऊपरी व रंगीन भागों में पाए जाते हैं। उदाहरण-फल, फूल, पत्ती, आदि।
(iii) अवर्णी लवक (Leucoplasts) यह रंगहीन लवक प्रायः खाद्य संचय में काम आते हैं। यह पूर्ण अंधकार में उपस्थित पादप भागों में पाए जाते हैं। उदाहरण-जड़, भूमिगत तना, आदि।

हरितलवक की संरचना Structure of Chloroplast

हरितलवक एक दोहरी झिल्ली से घिरी संरचना है। यह प्रत्येक जीव में अलग माप व आकार का हो सकता है; जैसे-यूलोथ्रिक्स (Ulothrix) में कॉलर या मेखला के आकार का, क्लैमाइडोमोनास (Chlamydomonas) में प्याले के आकार का, जिग्नेमा (Zygnema) की एक कोशिका में संख्या में एक से ज्यादा तथा सितारे के आकार के, स्पाइरोगायरा (Spirogyra) में पट्टी (Ribbon) के आकार के व सर्पिलाकार (Spiral), वुचेरिया (Vaucheria) में एक प्लेट के आकार के, ऊडोगोनियम (Oedogonium), क्लैडोफोरा (Chladophora) में जालिकावत्, आदि आकार के होते हैं। उच्च श्रेणी के पादपों में यह तश्तरीनुमा, अण्डाकार, गोलाकार, आदि हो सकता है। प्रायः एक कोशिका में यह 20-40 एवं द्विउत्तल आकार के होते हैं। इनका व्यास 4-8माइक्रोन व मोटाई 2माइक्रोन होती है। हरितलवक में रंगहीन व दानेदार माध्यम पाया जाता है। इसमें 40-50 प्लेटों जैसी संरचनाएँ होती हैं, जो एक-दूसरे से पट्टियों के द्वारा जुड़ी होती हैं, इन्हें पटलिकाएँ (Lamellae) कहते हैं। प्लेटों की तरह की संरचना को ग्रेना (Grana) व माध्यम को स्ट्रोमा (Stroma) या पीठिका कहते हैं। एक ग्रेनम में प्रोटीन की कुछ परतें होती है, जिनके मध्य वसा व वर्णक की परतें होती हैं। वर्णकों में पर्णहरिम (a व b प्रमुख हैं), कैरोटिन, जैन्थोफिल प्रमुख हैं। इसके अलावा साइटोक्रोम भी पाया जाता है। एक हरितलवक में 40-60 ग्रेना होते हैं। एक ग्रेना में 2-100 तक तश्तरीनुमा प्लेटें हो सकती हैं। मैंके (Menke) ने इन्हें थाइलेकॉइड कहा। इसमें एक चौड़ा स्थान होता है, जिसे लोक्यूलस कहते हैं। प्रत्येक ग्रेनम दूसरे ग्रेनम से फ्रेट चैनल के द्वारा जुड़े होते हैं। हरितलवक में स्वयं का DNA व RNA होता है। अतः यह अर्द्धस्वायत्तकारी अंग है, जो स्वतःजनन करने में भी सक्षम है।

(4) अन्तः प्रद्रव्यी जालिका Endoplasmic Reticulum

इसकी खोज एल्बर्ट क्लॉड, कीथ पोर्टर व फुल्लम (Albert Claude, Kith Porter and Fullam) ने की। यह कोशिकाद्रव्य में फैला नलिकाओं एवं थैलेनुमा संरचनाओं का एक जटिल जाल है, जो केन्द्रक कला से कोशिका झिल्ली तक फैली रहती है। पोर्टर (Porter) ने इसे यह नाम दिया। यह पूर्वकेन्द्रकीय कोशिका व स्तनियों की RBC में अनुपस्थित होती है।

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अन्तःप्रद्रव्यी जालिका की संरचना

ये संरचनाएँ वसा एवं प्रोटीन की दोहरी कला से बनी होती हैं एवं आकृति के आधार पर निम्न तीन प्रकार की होती है।
(i) सिस्टर्नी (Cisternae) यह थैलीनुमा 40-50 ma लम्बी व चपटी, शाखाविहीन नलिकाएँ होती हैं, जो केन्द्रक के चारों ओर समान्तर रूप में व्यवस्थित होती हैं। इन पर राइबोसोम्स पाए जाते हैं।
(ii) पुटिका (Vesicles) यह अण्डाकार थैलियाँ होती हैं, जो 30-500mu व्यास तक की हो सकती हैं।
(iii) नलिकाएँ (Tubules) ये केन्द्रक के पास व्यवस्थित होकर सिस्टर्नी व पुटिकाओं को जोड़कर जालक का निर्माण करती हैं।
उपरोक्त संरचनाओं के ऊपर राइबोसोम्स की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर अन्तः प्रद्रव्यी जालिका निम्न दो प्रकार की होती हैं –
(i) खुरदरी या कणिकामय अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Rough Endoplasmic Reticulum – RER) राइबोसोम की उपस्थिति के कारण यह खुरदरी या कणिकामय दिखती है। यह प्रोटीन-संश्लेषण में भाग लेने वाली कोशिकाओं अर्थात् यकृत कोशिका, गोब्लेट कोशिका, अग्न्याशयी कोशिका, आदि में ज्यादा पाई जाती हैं।
(ii) चिकनी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Smooth Endoplasmic Reticulum-SER) राइबोसोम की अनुपस्थिति के कारण यह चिकनी होती है। यह मुख्यतया वसा व ग्लाइकोजन के संश्लेषण में काम आने वाली कोशिकाओं अर्थात् वृक्क, पेशी, आदि में ज्यादा पाई जाती हैं।

अन्तःप्रद्रव्यी जालिका के कार्य Functions of ER

(i) यह कोशिका के अन्तःकंकाल की भाँति कार्य करती हुई कोशिका के आकार को बनाए रखती है।
(iii) यह कोशिका को प्रत्यास्थ व लचीली बनाती है।
(iii) यह कला जीवात् जनन (Membrane biogenesis) केन्द्रक कला के पुनर्निर्माण में मदद करती है।
(iv) खुरदरी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका प्रोटीन-संश्लेषण हेतु स्थल प्रदान करती है।
(v) चिकनी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका ग्लाइकोजन एवं वसा का संग्रह करती है।
(vi) कोशिकाद्रव्य तथा केन्द्रक के मध्य पदार्थों (मुख्यतया प्रोटीन) के परिवहन (Transport) के लिए नलिका के रूप में कार्य करती है।
(vii) कोशिका की जैव-रासायनिक क्रियाओं के लिए कोशिकाद्रव्यी ढाँचे का कार्य भी करती है।
(viii) कशेरुकी के यकृत में चिकनी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका विष तथा दवा को निराविषीकरण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
(ix) कोशिका विभाजन के समय कोशिका प्लेट एवं केन्द्रक झिल्ली के निर्माण में भाग लेती हैं।

(5) गॉल्जीकाय Golgi Body

उच्च पादपों व जन्तुओं में अन्तःप्रद्रव्यी जालिका से जुड़ी हुई महीन, कणहीन व चिकनी नलिका का गुच्छा पाया जाता है, जिसे गॉल्जीकाय या गॉल्जी संकुल या लिपोकॉण्ड्रिया या डिक्टियोसोम (पादपों में) कहते हैं। यह वसा व प्रोटीन की बनी दोहरी कला की संरचनाएँ होती है। इसकी खोज सन् 1898 में कैमिलो गॉल्जी (Camillo Golgi) ने की थी। यह पूर्वकेन्द्रकीय कोशिकाओं,
परिपक्व चालनी नलिका व RBC में अनुपस्थित होता है। जन्तु कोशिका में यह प्राय: एक ही होता है किन्तु पादप कोशिका में अनेक हो सकते हैं।

गॉल्जीकाय की संरचना Structure of Golgi Body

इसमें भी तीन प्रकार की संरचनाएँ होती हैं।
(i) सिस्टर्नी (Cisternae) एक के ऊपर एक व्यवस्थित 4-10 खोखली बेलनाकार नलिकाएँ ही सिस्टनीं कहलाती हैं। यह 20 A व्यास की होती है।
(ii) पुटिकाएँ (Vesicles) सिस्टर्नी के किनारों से टूटकर बनी गोलाकार थैलेनुमा संरचना ही पुटिकाएँ कहलाती हैं।
(iii) रिक्तिकाएँ (Vacuoles) यह भी सिस्टनों से बनी, किन्तु चौड़ी थैलेनुमा संरचनाएँ होती हैं। गॉल्जीकाय की उत्तल सतह समपक्ष (cis) या निर्माणकारी सतह (Forming face), जबकि अवतल सतह विपक्ष (trans) या परिपक्वन सतह (Maturing face) कहलाती है। इसके आधारद्रव्य में लिपिड (वसा), एन्जाइम, विटामिन, आदि भरे होते हैं।

गॉल्जीकाय के कार्य Functions of Golgi Body

(i) स्त्रावी कोशिकाओं में विकरों का स्रावण करना।
(ii) शुक्राणु के अग्रपिण्डक (Acrosome) का निर्माण करना।
(iii) हॉर्मोन्स, गोंद, रेजिन, आदि का स्रावण करना।
(iv) कोशिका भित्ति के पुनर्निर्माण में (कला जीवात् जनन द्वारा ) ।
(v) लौह, ताँबा, स्वर्ण, आदि का अवशोषण करना।
(vi) प्राथमिक लाइसोसोम व स्रावी आशय बनाना।
(vii) कोशिका विभाजन के समय कोशिकापट् (Cell plate) का निर्माण करना।

(6) रिक्तिका Vacuole

पादपों में ही पाई जाने वाली यह संरचना एकल कला से बनी होती है, जिसे टोनोप्लास्ट व इसमें भरे द्रव को कोशिका रस (Cell sap) कहते हैं। यह एक बड़ी लगभग गोलाकार संरचना है, जो पादप कोशिका का बड़ा भाग घेरती है। यह विभिन्न खाद्य पदार्थों एवं जल का संग्रहण करती है। अतः यह कोशिका का प्राकृतिक भण्डार गृह (Natural store house) है। इसे रसधानी भी कहते हैं तथा कार्यानुसार कोशिका का कचरापात्र भी कह सकते हैं, क्योंकि इसमें अपशिष्ट पदार्थों का संचय होता है। इसमें कई प्रकार के अम्ल, कार्बोहाइड्रेट, अमीनो अम्ल, प्रोटीन, आदि पदार्थ भरे होते हैं। सम्भवतया इसका उदय कोशिका वृद्धि के दौरान बाह्यवरण व आन्तरिक पदार्थों एवं संरचनाओं में असन्तुलन के कारण होता है। कोशिका की वृद्धि के साथ-साथ यह कोशिका में ज्यादा स्थान भी घेरती जाती है। यह जीवद्रव्यकुंचन, परासरण जैसी भौतिक प्रक्रियाओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

रिक्तिका के कार्य Functions of Vacuole

(i) कोशिका को स्फीति बनाए रखना।
(ii) वसा, कॉर्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, जल, आदि का संग्रहण करना।
(iii) वर्णकों को संग्रहित करना।
(iv) संकुचन द्वारा परासरण, उत्सर्जन, आदि को नियन्त्रित करना
(v) अपशिष्ट व अनावश्यक पदार्थों को संग्रहित करना।

(7) लयनकाय Lysosome

ग्रीक भाषा में ‘लाइसो’ (Lyso) शब्द का अर्थ ‘पाचक’ तथा सोम (some) का अर्थ ‘काय’ है। यह पूर्वकेन्द्रकीय एवं जन्तु कोशिका में ही प्रमुखतया पाया जाता है। सन् 1955 में सी डी डूवे (C de Duve) ने इसकी खोज की, जिसके लिए सन् 1974 में इन्हें नोबेल पुरस्कार मिला।

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लयनकाय की संरचना Structure of Lysosome

यह 0.25.0.5pm के व्यास की लगभग गोलाकार संरचना है, जिसमें 30-35  जल अपघटनी विकर (Enzyme) भरे होते हैं। इन्हें आत्मघाती थैली (Sucidal bag) अथवा आत्महत्या के थैले भी कहते हैं, क्योंकि अगर किसी कारणवश यह फट जाए, तो इसमें से निकले एन्जाइम कोशिकांगों का विघटन कर कोशिका को मृत कर सकते हैं। गॉल्जीकाय या अन्तः प्रद्रव्यी जालिका से प्राथमिक लयनकाय या पाचककाय बनता है, जो खाद्यधानी से जुड़कर द्वितीयक लयनकाय बनाता है। यह अपनी लयन क्रियाविधि द्वारा हानिकारक बाहरी तत्वों, मृत कोशिकांगों तथा खाद्य पदार्थों का अन्तर्ग्रहण कर अपने पाचक एन्जाइमों द्वारा इसका पाचन कर
देता है।

लयनकाय के कार्य Functions of Lysosome

(i) समसूत्री कोशिका विभाजन का उत्प्रेरण करना।
(ii) मृत कोशिकांग, हानिकारक बाहरी तत्व, आदि का पाचन करना।
(iii) प्रोटीन, वसा, ग्लाइकोजन, आदि का पाचन कर कोशिका को ऊर्जा प्रदान करना।
(iv) निषेचन के दौरान अण्डाणु की बाह्य कला का पाचन करना।
(v) पादपों के अंकुरण में सहायता करना।

(8) राइबोसोम Ribosome

इसे सर्वप्रथम रोबिन्सन व ब्राउन (Robinsons and Brown) ने सेम की जड़ की कोशिकाओं व पैलेड (Palade) ने प्राणी कोशिका में देखा। यह 150-250 A व्यास के सूक्ष्म न्यूक्लियोप्रोटीन कण हैं अर्थात् यह कलाविहीन कण मात्र 4% RNA व प्रोटीन के बने होते हैं। रॉबर्ट (Robert) ने इन्हें राइबोसोम, जबकि क्लॉड (Claude) ने माइक्रोसोम कहा। यह कोशिकाद्रव्य में स्वतन्त्र रूप से या कणिकामय अन्तः प्रद्रव्यी जालिका पर पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त माइटोकॉण्ड्रिया व हरितलवक में भी पाए जाते हैं। प्राय: यह कोशिका में 10 तक हो सकते हैं।

राइबोसोम की संरचना Structure of Ribosome

राइबोसोम का निर्माण दो उपइकाइयों से होता है, जिसमें से एक उपइकाई बड़ी व दूसरी छोटी होती है। बड़ी उपइकाई गुम्बदाकार होती है व छोटी उपइकाई टोपीनुमा होती है, जो बड़ी उपइकाई की चपटी सतह पर जुड़ी रहती हैं। इन उपइकाइयों का निर्माण RNA व प्रोटीन के मिलने से होता है। यह दोनों उपइकाइयाँ Mg + आयन के द्वारा जुड़ी रहती है। इन दोनों को संयुक्त रूप से डायमर (द्विलक) कहते हैं। एक mRNA से 4-5 राइबोसोम जुड़कर प्रोटीन बनाते हैं। इस अवस्था में संयुक्त रूप से इन्हें पॉलीराइबोसोम (Polyribosome) कहते हैं।

राइबोसोम्स के प्रकार Types of Ribosomes

आकार व अवसादन गुणांक S के आधार पर राइबोसोम दो प्रकार के होते हैं –
(i) 70 S राइबोसोम –  ये पूर्वकेन्द्रकीय कोशिका पाए जाते हैं। इनका आण्विक भार 2.7 × 106 डॉल्टन तथा अवसादन गुणांक 70S होता है। इसकी उपइकाइयाँ 30 S व 50 S होती हैं। यह हरितलवक व माइटोकॉण्ड्रिया में भी पाए जाते हैं।
(ii) 80S राइबोसोम –  सुकेन्द्रकीय कोशिका में पाए जाते हैं। इनका आण्विक भार 4 × 106 डॉल्टन तथा अवसादन गुणांक 80 S होता है। इसकी उपइकाइयाँ 60S एवं 40S है। 80S राइबोसोम को प्रोटीन की फैक्ट्री भी कहते हैं।

नोट – ‘S’ यहाँ अवसादन गुणांक की सिविडबर्ग (Swedberg) इकाई है। यह कोई परिमाण मापने की इकाई नहीं है। विशेष घोल में राइबोसोम को मिलाकर अल्ट्रासेण्ट्रीफ्यूग मशीन में निश्चित गति से घुमाने पर इसकी विभिन्न उपइकाइयाँ अपने अणुभार व अपकेन्द्रीय बल के अनुसार परखनली के तल में बैठ जाते हैं।

राइबोसोम्स के कार्य Functions of Ribosomes

राइबोसोम कोशिका का मुख्य प्रोटीन संश्लेषण यन्त्र है, जिस कारण से इसे कोशिका का इंजन भी कहते हैं।

(9) परॉक्सीसोम Peroxisome

ये कोशिका के सूक्ष्मकाय एकल कलीय अंगक है। इसकी खोज रोदिन (Rhodin) सन् 1954 में चूहे की वृक्क कोशिका में की थी। ब्यूफै व बर्थर (Bufe and Berther) ने इसे परॉक्सीसोम कहा। इसका आकार 0.3-1.5 um होता है। चूहे की यकृत कोशिका में यह 70-100 तक पाए जाते हैं। जन्तु कोशिकाओं में इनका मुख्य कार्य परऑक्साइड सम्बन्धित विकरों द्वारा ऑक्सीकरण है। पादपों में यह C, पादपों में ही पाया जाता है। इसमें कई प्रकार के एन्जाइम्स पाए जाते हैं। पादपों में इन्हें ग्लाइऑक्सीसोम (Glyoxysomes) कहते हैं।

(10) तारककाय Centrosome

इसे टी बॉवेरी (T Boveri) ने सर्वप्रथम सन् 1888 में खोजा। यह प्राय: जन्तु कोशिका में ही पाया जाता है। तारककाय केन्द्रक के पास पाया जाता है तथा यह एक बेलनाकार 1200-1500 A व्यास व 3000-50000 A की संरचना है। इसमें दो तारककेन्द्र पाए जाते हैं, जो एक-दूसरे से 90° पर स्थित होते हैं। कोशिका विभाजन के समय यह ध्रुवों पर आ जाते हैं तथा इनसें एस्ट्रल किरणें व रेशे निकलते हैं, जो तर्कु (Spindle) बनाते हैं। तुर्क गुणसूत्रों जन सहायक हैं। इसे आधारकाय, ब्लीफेरोप्लास्ट या काइनेटोसोम (Basal granule or blepharoplast or kinetosome) भी कहते हैं। तारककेन्द्र में तीन-तीन के समूह में 9 स्थानों पर सूक्ष्मनलिकाएँ होती हैं। इसमें आन्तरिक कोशिकाद्रव्य काचाभ (Hyaline) व बाहरी कोशिकाद्रव्य सेन्ट्रोस्फीयर कहलाता है। तारककाय में ट्यूब्यूलिन नामक प्रोटीन पाया जाता है।


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