कोशिका की खोज,सिद्धांत,प्रकार एवं संरचना / structure of a cell in hindi

दोस्तों विज्ञान की श्रृंखला में आज हमारी वेबसाइट hindiamrit.com का टॉपिक कोशिका की खोज,सिद्धांत,प्रकार एवं संरचना / structure of a cell in hindi है। हम आशा करते हैं कि इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आपकी इस टॉपिक से जुड़ी सभी समस्याएं खत्म हो जाएगी ।

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कोशिका की खोज,सिद्धांत,प्रकार एवं संरचना / structure of a cell in hindi

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प्रत्येक बहुकोशिकीय जीव (Multicellular organisms) का शरीर छोटी-छोटी स्वतन्त्र रूप से जीवित रह पाने वाली इकाइयों अर्थात् कोशिकाओं से बना होता है। कोशिका में वे सभी भौतिक, रासायनिक एवं आनुवंशिक सूचनाएँ (Genetic informations) संग्रहित होती हैं, जो उसे स्वतन्त्र रूप से जीवित रहने के योग्य बनाती है अर्थात् हमारे शरीर में कोशिका एकमात्र ऐसी सूक्ष्मतम संरचना है, जोकि बहुकोशिकीय अथवा एककोशिकीय जीवों में स्वतन्त्र रूप से रह सकती है।

कोशिका : जीवन की आधारभूत इकाई | Cell Basic Unit of Life

सेल या कोशिका में जनन, श्वसन, पाचन, उत्सर्जन, आदि सभी क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं अर्थात् जीवन की समस्त जैविक क्रियाएँ कोशिका में ही सम्पन्न होती हैं, इसलिए हम कहते हैं, कि “कोशिका ही जीवन की प्राथमिक संरचना है”। किसी जीव के शरीर के संगठन का क्रम निम्नलिखित है –
कोशिका → ऊतक→  अंग → अंग तन्त्र→  जीव
अतः हम कह सकते हैं, कि कोशिका जीवों की क्रियात्मक (Functional) व संरचनात्मक (Structural) इकाई है।

कोशिका की खोज का इतिहास The History of Cell Discovery

सूक्ष्मदर्शी (Microscope) की खोज से पूर्व कोशिका को देखना असम्भव था। सन् 1665 में रॉबर्ट हुक (Robert Hooke) ने सरल सूक्ष्मदर्शी द्वारा कॉर्क के टुकड़े में मधुमक्खी के छत्ते जैसी संरचना देखी, जोकि मृत कोशिकाएँ थीं और किसी जेल (Prison) की कोठरियों से सम्बन्ध करते हुए इन्हें सेलुला (Cellula) कहा। बाद में यही नाम बदलकर कोशिका (Cell) हो गया। सन् 1674 में एन्टोनी वॉन ल्यूवेनहॉक (Antonie van Leeuwenhoek) ने जीवित कोशिकाएँ; जैसे- शुक्राणु, विषाणु, जीवाणु, प्रोटोजोआ, आदि संरचनाएँ स्वयं द्वारा निर्मित किए गए सूक्ष्मदर्शी से देखी थी। इससे पूर्व ग्रीक दार्शनिक अरस्तू (Aristotle) ने भी कहा था कि जीवन की उत्पत्ति एक सूक्ष्म इकाई से होती है। अतः कोशिका प्रत्येक जीव की सूक्ष्मतम् व स्वतन्त्र इकाई है।

कोशिका सिद्धान्त Cell Theory

जर्मन वनस्पतिज्ञ मैथियस श्लाइडेन (Matthias Schleiden) ने 1838 व थिओडर श्वान (Theodore Schwann) ने 1839 में कोशिका सिद्धान्त दिया। इसके अनुसार,
(i) सभी जीवों का शरीर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बना है। अतः यह जीवों की संरचनात्मक इकाई है।
(ii) कोशिका में जैविक क्रियाएँ; जैसे- श्वसन, पाचन, उत्सर्जन, आदि स्वतन्त्र रूप से होती हैं। अतः यह जीवों की क्रियात्मक इकाई भी है। सन् 1855 में रडोल्फ विरचोव (Rudolf Virchow) के नए कथन को उपरोक्त सिद्धान्त के साथ मिलाकर नव कोशिकावाद बना। यह नया कथन था “पूर्ववर्ती कोशिकाएँ (मातृ कोशिका) विभाजन द्वारा नई कोशिकाओं (सन्तति कोशिका) को उत्पन्न करती हैं।”

कोशिका के प्रकार Types of Cell

प्रत्येक कोशिका वह सरलतम संरचना है, जिसमें एक झिल्ली जैसे आवरण के भीतर तरल आधार द्रव्य एवं कुछ विशेष संरचनाएँ होती हैं। इस आवरण को कोशिका या जीवद्रव्य कला (Plasma membrane), तरल आधार द्रव्य को जीवद्रव्य (Protoplasm) एवं विशेष संरचनाओं को कोशिकांग (Cell organelle) कहते हैं। पादप कोशिका में कोशिका कला के बाहर एक वृहद कोशिका भित्ति (Cell wall) भी उपस्थित होती है।

इन कोशिकांगों में केन्द्रक, लवक, माइटोकॉण्ड्रिया, अन्तःप्रद्रव्यी जालिका,गॉल्जीकाय, लयनकाय, रिक्तिका, राइबोसोम, आदि प्रमुख हैं। इन सभी कोशिकांगों में केन्द्रक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होता है एवं कोशिका की सभी प्रक्रियाओं का नियन्त्रण करता है।

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केन्द्रक के आधार पर कोशिका दो प्रकार की होती है।

1. पूर्वकेन्द्रकीय कोशिका ( Prokaryotic Cell )

यह सरलतम संरचना कुछ सरल एककोशिकीय जीवों (Unicellular organisms) में पाई जाती है। इसमें अल्पविकसित केन्द्रक पाया जाता है अर्थात् केन्द्रक में एक निश्चित् संरचना का अभाव होता है तथा उसके प्रमुख अवयव (केन्द्रक कला, गुणसूत्र, केन्द्रिका, आदि) अनुपस्थित होते हैं। वास्तविकता में केन्द्रक के स्थान पर इनमें नग्न DNA पाया जाता है। केन्द्रक की इस प्रकार की संरचना को आरम्भी केन्द्रक (Incipient nucleus) या न्यूक्लियोइड (Nucleoid) या जीनोफोर (Genophore) कहते हैं। इनमें 70 S प्रकार का राइबोसोम पाया जाता है तथा माइटोकॉण्ड्रिया, हरितलवक, लयनकाय, हिस्टोन प्रोटीन, आदि विकसित संरचनाओं का अभाव होता है; उदाहरण- जीवाणु, नीली- हरी शैवाल, विषाणु, जीवाणुभोजी, आदि।

2. सुकेन्द्रकीय कोशिका ( Eukaryotic Cell )

यह जटिल व विकसित कोशिका है, जिसमें सुविकसित केन्द्रक अपने सभी अवयवों के साथ पाया जाता है। यह सभी जन्तु व पादप कोशिकाओं में पाई जाती है। इसमें 80 S प्रकार का राइबोसोम, हिस्टोन प्रोटीन एवं सभी द्विकला युक्त कोशिकांग पाए जाते हैं। सुकेन्द्रकीय कोशिकाओं की संरचना जन्तुओं और पादपों में भिन्न-भिन्न होती है; उदाहरण-पादपों में कोशिका कला के बाहर एक दृढ़ कोशिका भित्ति (Cell wall) पाई जाती है, जो सेलुलोस नामक पदार्थ की बनी होती है।
अतः हम कह सकते हैं, कि सुकेन्द्रकीय कोशिकाएँ पुनः जन्तु और पादप कोशिका में विभक्त की जा सकती है।

कोशिका का आकार, माप व संख्या
Shape, Size and Number of Cells

कोशिका अतिसूक्ष्म संरचना है, जिसे नग्न आँखों से देखना असम्भव है। प्रायः इसका व्यास 0.5-20p तक हो सकता है। कोशिका का आकार मुख्यतया कोशिका के कार्य करने की क्षमता से सम्बन्धित होता है इसीलिए कोशिका का आकार एवं माप भिन्न-भिन्न होता है। प्रायः कोशिका गोलाकार होती है किन्तु यह बहुभुजीय, आयताकार, बेलनाकार, नलिकाकार, स्तम्भीय, घनाकार, बहुभुजीय, तश्दरीनुमा, ताराकार, द्विउत्तल, परवलयाकार, भालाकार, आदि हो सकती है।

एक जीव के शरीर में कोशिकाओं की संख्या एक (एककोशिकीय जीव) से ब्लेकर अरबों तक (बहुकोशिकीय जीव) हो सकती है; उदाहरण-
(i) हृद पेशी की कोशिका ताराकार होती है।
(ii) मानव शुक्राणु की कोशिका भालाकार होती है।
(iii) स्तनी की RBCs द्विउत्तल होती हैं।

कोशिका के माप से सम्बन्धित कुछ रोचक तथ्य निम्न हैं
(i) सुकेन्द्रकीय कोशिकाओं में माइकोप्लाज्मा गैलीसैप्टिकम
(PPLO-Pleuro Pneumonia Like Organisms) प्रकार की
कोशिका न्यूनतम माप 0.1-0.3p की होती है।
(ii) पूर्वकेन्द्रकीय कोशिकाओं में डायलिस्टर न्यूमोसिटिस जीवाणु की
कोशिका 0.15-0.30p (न्यूनतम माप) की होती है।
(ii) सुकेन्द्रकीय कोशिकाओं में शुतुर्मुर्ग (Ostrich) का अण्डा सबसे बड़ी कोशिका है, जिसका व्यास 15 सेमी होता है।
(iv) जीवों में तन्त्रिका कोशिका की लम्बाई 1-1.5 मीटर तक हो सकती है, जो अधिकतम है। यह शरीर की सबसे लम्बी कोशिका है।
(v) फ्लैक्स, हैम्प, रीआ, आदि पादपों की तन्तु कोशिकाएँ 55-60 सेमी तक लम्बी हो सकती हैं।

कोशिका की सामान्य संरचना
General Structure of Cell

सरल सूक्ष्मदर्शी से देखने पर किसी कोशिका में मुख्यतया निम्न तीन भाग दिखाई देते हैं; जैसे-बाह्य आवरण, जीवद्रव्य एवं कोशिकांग ऐसा माना जाता है, कि अधिकतर कोशिकांग बाह्य आवरण की कोशिका कला के विभिन्न प्रकार से हुए संयोजनों के उत्पाद हैं।

1. बाह्य आवरण (External Covering)

जैसा कि आरेख में स्पष्ट है सभी सुकेन्द्रकीय कोशिकाओं में कोशिका या जीवद्रव्य कला (Plasma membrane) के रूप में एक बाह्य आवरण होता है। 17वीं एवं 18वीं शताब्दी में इस आवरण के लिए मात्र जीवद्रव्य कला शब्द का हा प्रयोग होता था, परन्तु सन् 1856 में नागेली व सीक्रेमर (Negeli and Seakramer) ने सर्वप्रथम जीवद्रव्य कला को कोशिका कला कहा।

(i) जीवद्रव्य या कोशिका कला Plasma or Cell Membrane

सभी कोशिकाओं में जीवद्रव्य के चारों ओर एक पतली झिल्ली पाई जाती है, जिसे कोशिका कला कहते हैं। यह अत्यन्त पतली, लचीली, अर्द्धपारगम्य झिल्ली (Semipermeable membrane) होती है तथा चयनात्मक पारगम्यता का गुण भी दर्शाती है। इसका निर्माण प्रोटीन व वसा की परतों से होता है। इसमें 60-80% प्रोटीन,20-40% वसा व 5% कार्बोहाइड्रेट्स उपस्थित होता है। प्रायः यह 75 A मोटी होती है, किन्तु स्तनी की RBCs में यह 215 A तथा आँत की उपकला कोशिकाओं में यह 105 A तक मोटी होती है। यह पदार्थों के कोशिका में आने व बाहर जाने को नियन्त्रित करती है। इसमें पुनरुद्भवन की अपार क्षमता होती है। प्रत्येक कोशिका कला में 7-10 A व्यास के छिद्र होते हैं, जिससे कोशिका में पदार्थों का आदान-प्रदान होता है। अतः कोशिका कला एक्टोप्लास्ट भी कहलाती है।

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कोशिका कला की संरचना Structure of Cell Membrane

कोशिका कला की संरचना को बताने हेतु अनेक प्रतिरूप प्रस्तावित किए गए उनमें से निम्न दो प्रमुख प्रतिरूप अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं
(a) रॉबर्टसन का इकाई कला प्रतिरूप (Unit Membrane Model of Robertson) – इस प्रतिरूप को सर्वप्रथम डैनिली व डेवसन (Danielli and Davson) ने इसे बताया एवं बाद में रॉबर्टसन (Robertson) (1959) ने इसे इकाई कला मत द्वारा प्रदर्शित किया। इस प्रतिरूप के अनुसार कोशिका कला में वसा अणुओं की दो परत होती हैं तथा प्रोटीन इनके अध्रुवीय सिरों पर स्थित होते हैं। इस एकल कला की मोटाई 75 A होती है। इस प्रतिरूप के अनुसार, वसा एवं प्रोटीन पर्तों के व्यवस्थापन को निम्न चित्र से समझ सकते हैं

(b) तरल-मोजैक प्रतिरूप (Fluid Mosaic Model) – यह प्रतिरूप सिंगर (SJ Singer) व निकोलसन (G Nicolson) ने 1972 में दिया। यह सर्वमान्य व बेहतर प्रतिरूप है। इसके अनुसार वसा अणु की सतत् दोहरी परत कोशिका कला के आधारीय ढाँचे का निर्माण करती है तथा उपस्थिति के आधार पर यहाँ दो प्रकार के प्रोटीन अणु पाए जाते हैं।
● समाकल प्रोटीन (Intrinsic Protein) वे प्रोटीन अणु, जो वसा में आंशिक या पूर्णरूप से धँसे रहते हैं।
● परिधीय प्रोटीन (Extrinsic Protein) वे प्रोटीन अणु, जो वसा की परत में ढ़ीले रूप में संग्लित रहते हैं व केवल बाहर की तरफ ही पाए जाते हैं।

इस प्रतिरूप के अनुसार वसा व समाकल प्रोटीन उभय संवेदी अर्थात् जलरागी व जलविरागी सिरे युक्त होते हैं। प्रोटीन के जलरागी सिरे जल की तरफ व जलविरागी वसा की तरफ या वसा में उपस्थित होते हैं। परिधीय प्रोटीन समाकल प्रोटीन की तुलना में आसानी से पृथक् किए जा सकते हैं। समाकल प्रोटीन को इस संरचना से अलग करना अत्यन्त ही दुष्कर कार्य है।  संरचना वसा अर्द्धतरल रूप में व समाकल प्रोटीन मोजैक के रूप में उपस्थित होते हैं। इसी कारण यह कला चयनात्मक पारगम्य व लचीली होती है। यहाँ प्रोटीन के ठोस होने के कारण वैज्ञानिक इसे वसा के समुद्र में प्रोटीन का स्थल भी कहते हैं। इस प्रतिरूप के अनुसार सम्पूर्ण कार्बोहाइड्रेट व कुछ प्रोटीन स्वतन्त्र अवस्था में नहीं रहते वरन् वसा के साथ जुड़कर ग्लाइकोलिपिड व ग्लाइकोप्रोटीन बनाते हैं। यही गुण कोशिका कला की चयनात्मक पारगम्यता की क्षमता का कारण है।

कोशिका कला के कार्य Functions of Cell Membrane
इसके निम्नलिखित कार्य हैं
(a) यह कोशिका को निश्चित आकार प्रदान करती है।
(b) यह कोशिकांगों को सुरक्षा प्रदान करती है।
(c) चयनात्मक पारगम्य होने के कारण यह चयनित या विशिष्ट आयनों या पदार्थों को ही कोशिका के अन्दर या बाहर जाने देती है।
(d) कोशिका में पदार्थों के परिवहन को नियन्त्रित करती है।

(ii) कोशिका भित्ति Cell Wall

पादप कोशिका में कोशिका कला के चारों तरफ दृढ़ व मृत सेलुलोस का बना आवरण होता है, जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं। यह अपेक्षाकृत एक सुरक्षात्मक पर्त है। यह कोशिका को दृढ़ आकार प्रदान करती है। विभज्योतकों में यह अपेक्षाकृत पतली होती है।
प्रायः कोशिका भित्ति में बाहर से भीतर की तरफ निम्नलिखित परतें होती हैं।
(a) मध्य पटलिका (Middle Lamella) यह कोशिका भित्ति की मुख्य पर्त है एवं दो निकटवर्ती कोशिकाओं की भित्ति के मध्य सीमेन्ट की भाँति कार्य करती हैं। यह मुख्य रूप से पेक्टिन (कैल्शियम पेक्टेट व मैग्नीशियमं पेक्टेट) की बनी होती हैं। Ca* व Mg* आयन ही दो कोशिकाओं को जोड़ने में सहायता प्रदान करते हैं।
(b) प्राथमिक कोशिका भित्ति (Primary Cell Wall) यह सेलुलोस (30%), हेमीसेलुलोस के सूक्ष्म तन्तु (53%), प्रोटीन, पेक्टिन (5%) एवं वसा 7% की बनी पतली भित्ति है। यह मध्य पटलिका से जुड़ी रहती है।
(c) द्वितीयक कोशिका भित्ति (Secondary Cell Wall) यह प्राथमिक कोशिका भित्ति में पेक्टिन, लिग्निन, आदि पदार्थों के जमाव होने से बनी मोटी परत है, जो पुनः तीन पत (बाह्य, मध्य व अन्तः पर्त) में विभक्त होती है। यह स्थूल तन्तु (Fibril) की बनी होती है।
(d) तृतीयक कोशिका भित्ति (Tertiary Cell Wall) यह सभी कोशिकाओं में नहीं पाई जाती है। यह द्वितीयक भित्ति के भीतर की ओर निष्क्रिय पदार्थों के जमाव से बनती हैं।

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नोट – कुछ जीवों की कोशिका मित्ति; जैसे-जीवाणुओं में पेप्टाइडोग्लाकेन्स, कवक में ग्लूकोसेमीन बहुलक तथा शैवाल में ग्लाइकोप्रोटीन व पॉलीसैकेराइड की बनी होती है।

2. जीवद्रव्य Protoplasm

(सभी कोशिकाओं में एक अर्द्धतरल जैलीनुमा द्रव्य भरा रहता है, जिसे जीवद्रव्य कहते हैं। जीवद्रव्य को सर्वप्रथम कॉर्टी (Corti) ने देखा था, परन्तु जीवद्रव्य की खोज का श्रेय डुजार्डिन (Dujardin) को जाता है, जिन्होंने इसके लिए ‘सार्केड (Sarcode)’ शब्द प्रयुक्त किया। बाद में पुरकिन्जे (Purkinje; 1837) ने इसे जीवद्रव्य नाम दिया। ह्यूगो वॉन मॉल (Hugo Von Mohl) ने इसका अध्ययन व वर्णन किया। हक्सले (Huxley) के अनुसार ‘जीवद्रव्य जीवन की भौतिक आधारशिला है (Protoplasm is the physical basis of life)’

जीवद्रव्य की प्रकृति Nature of Protoplasma

(i) भौतिक प्रकृति (Physical Nature) जीवद्रव्य कणिकायुक्त, अर्द्धतरल, लसलसा व अर्द्धपारदर्शी गुणों के कारण जटिल कोलॉइडी तन्त्र बनाता है, जिसके कारण यह सॉल व जैल (Sol and gel) अवस्था में परिवर्तित होता रहता है। इस परिवर्तन में इसके अणुओं की ब्राउनी गति (Brownian movement) प्रदर्शित होती है। इसमें आवेश  भी उपस्थित होता है, जो पदार्थों के संवहन को आसान बनाता है।
(ii) रासायनिक प्रकृति (Chemical Nature) प्राय: (जीवद्रव्य में कार्बन,ऑक्सीजन, हाइड्रोजन तथा नाइट्रोजन मुख्य रूप से सम्मिलित होते हैं।
अकार्बनिक पदार्थों में, धनायन (Ca+2, K”, Mg+2), ऋणायन (NO, SO2, CIT), आदि पाए जाते हैं। ये सभी पदार्थ इसे जैविक तन्त्र बनाते हैं। जीवद्रव्य बाह्य उद्दीपनों के प्रति संवेदी होता है। इसमें कणिका, बूंदे, रिक्तिकाएँ व विभिन्न आकार की संरचनाएँ भी पाई जाती हैं। अत: जीवद्रव्य उपापचय, उत्सर्जन, वृद्धि, परासरण, अनुकूलन, संवहन, गमन जैसी क्रियाओं के सफलतापूर्वक सम्पन्न होने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जीवद्रव्य के भाग Parts of Protoplasm

(1) कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) कोशिका में भरा वह सारा जीवद्रव्य, जिसमें अन्य कोशिकांग उपस्थित होते हैं व कई रासायनिक व भौतिक क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं, कोशिकाद्रव्य कहलाता है।
(ii) केन्द्रकद्रव्य) (Nucleoplasm) केन्द्रक में भरा सारा जीवद्रव्य, जिसमें गुणसूत्र व केन्द्रिका उपस्थित होते हैं, केन्द्रकद्रव्य कहलाता है।

नोट – जीवद्रव्य में उपस्थित निर्जीव पदार्थों को सम्मलित रूप से ड्यूटोप्लाज्म (Deutoplasm) कहते हैं।


                             ◆◆◆ निवेदन ◆◆◆

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