पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएं या पियाजे के मानसिक विकास की अवस्थाएं

आज हम आपको बाल मनोविज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण पाठ पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएं या पियाजे के मानसिक विकास की अवस्थाएं की सारी जानकारी देंगे।

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पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएं या पियाजे की मानसिक विकास की अवस्थाएं (Steps of piaget’s coginitive development )

पियाजे के अनुसार संज्ञानात्मक विकास या विकास की कुल 4 अवस्थाएँ हैं,जिनके नाम निम्नलिखित हैं-

(1) संवेदी पेशीय अवस्था / इन्द्रिय जनित गामक अवस्था / संवेदी गत्यात्मक अवस्था / संवेगीगात्मक अवस्था(Sensori-mofor stage) – (0-2 वर्ष)

(2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational stage) –(2-7 वर्ष)

(3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था/ स्थूल संक्रियात्मक अवस्था (concrete – operational stage)-(7-11 वर्ष)

(4) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था / औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था/ औपचारिक क्रियात्मक अवस्था ( Formal -operatinal stage) –(11-15 वर्ष)

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पियाजे के अनुसार संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएं || पियाजे के मानसिक विकास की अवस्थाएं

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(1) संवेदी पेशीय अवस्था / इन्द्रिय जनित गामक अवस्था / संवेदी गत्यात्मक अवस्था / संवेगीगात्मक अवस्था(Sensori-mofor stage) – (0-2 वर्ष)

यह अवस्था बालक के जन्म से लेकर 2 वर्ष की अवधि तक रहती है।

इस अवस्था में बालक इन्द्रियों और संवेदनाओं के द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है।

इसमें जीवन के प्रथम वर्ष में बालक किसी वस्तु को अवधारणा विकसित करता है।

इसके बाद बालक अपने पहुँच से परे लुप्त हुई वस्तओं का पुनरुद्धार करने का प्रयत्न करता है।

वस्तुओं का आकार अपने मस्तिष्क में ग्रहण करने के पश्चात् वह अभ्यास के अवसरों का उपयोग करता है।

जन्म के समय बालक संवेदनाओं के द्वारा प्राप्त करता है।

इस आयु में बालक शारीरिक रूप से वस्तुओं को पकड़कर इधर-उधर रखता है, उन्हें उठाता है, हिलाता-डुलाता है तथा वस्तुओं को मुँह में डालकर ज्ञान प्राप्त करता है।

पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की इस अवस्था को हम निम्न प्रकार से समझ सकते है।

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(1) प्रथम उप-अवस्था 0-1 माह (Stage I)

इस अवस्था की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) जन्मजात स्वत: प्रेरित क्रियाएँ
(2) आत्मकेन्द्रियता
(3) बुद्धि की आदिम अवस्था (बुद्धि का विकास बालक तथा वातावरण के बीच होने वाली अन्त:क्रिया पर) ।

(2) द्वितीयउप-अवस्था: 1-4 माह (Stage II)

इस अवस्था की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

(1) कारण एवं उसके प्रभाव का आभास।

(2) क्रियाओं की पुनरावृत्ति।

(3) वस्तुओं को पकड़ना एवं छोड़ना।

(4) विभिन्न अनुक्रियाओं एवं वातावरण के साथ समन्वय; जैसे-सुनने एवं बोलने के प्रयत्न के बीच।

(5) नवीन व्यवस्थापन के फलस्वरूप खेल की प्रक्रिया

(6) आत्मकेन्द्रियता की ही स्थिति।

(3) तृतीय उप अवस्था:4-8 माह (Stage III)

इस अवस्था में द्वितीयक वृत्तीय क्रियाएँ (Sccondary circular reactions) प्रकट होती हैं।

इन्हें वृत्तीय क्रियाएँ इसलिये कहा जाता है। क्योंकि बालक अपनी क्रियाओं को बार-बार दोहराता है।

इस अवस्था की वृत्तीय क्रियाएँ पर्यावरणीय घटनाओं को बनाये रखने के उद्देश्य से की जाती हैं, जो कि संयोग से उसके पास आती हैं।

उदाहरण के लिये,

जब शिशु संयोगवश झुनझुने को हिलाता है एवं आवाज सुनता है। तो उसी आवाज को पुन: सुनने के लिये वह झुनझुने को बार-बार हिलायेगा।

इस प्रकार वह हिलाना सीख जाता है। वह वस्तुओं को परिचालित करना भी सीखता है।

इस क्रिया के लिये दो पद्धतियों के समन्वय की आवश्यकता होती है-(अ) पकड़ना (ब)सुनना

(4) चतुर्थ उप-अवस्था : 8-12 माह (Stage IV)

इस अवस्था में बालक ऐसी जटिल क्रियाओं को कर सकता है, जो उसकी इच्छा को प्रकट करती हैं। चिह्नों के माध्यम से वह पूर्व घटनाओं का आभास कर सकता है।

बालक नयी वस्तुओं के प्रति प्रतिक्रिया करता है तथा संकेतों को समझने का प्रयत्न भी करता है।

खेल इसका मन बहलाने का प्रमुख साधन बन जाता है तथा छिपी वस्तुओं की खोजने का प्रयत्न करता है।

यह उसकी स्मृति विकास को दर्शाता है। इस अवस्था में द्वितीयक वृत्तीय क्रियाओं का समन्वय होता है।

(5) पंचम् उप अवस्था : 12 से 18 माह (Stage V )

यह तृतीय वक्रित प्रतिक्रियाओं (Tertiary circular reaction ) की अवस्था है, ये क्रियाएँ प्रयोगात्मक और सृजनात्मक हो जाती हैं।

इस उप-अवस्था में बालक क्रिया एवं वस्तु के सम्बन्ध की खोजबीन करता है।

शिशु वस्तु से प्रयोग कर इसे देखने, समझने और नवीन वस्तु की खोज करने का प्रयास करता है।

सोपान चार में बालक केवल लक्ष्य के साधनों का निर्माण करते हैं।

इसके विपरीत अवस्था पाँच में बालक प्रयास एवं त्रुटि के प्रयोग द्वारा, सक्रिय रूप से नये साधनों की खोज करते हैं।

पियाजे के अनुसार प्रयोग करने की यह नयी क्षमता वस्तु स्थायित्व की समझ में अधिक प्रगति समझ को आगे बढ़ाती है।

(6) पष्ठम् उप-अवस्था : 18 से 24 माह (Stage VI)

यह मस्तिष्क संयोग द्वारा नये साधनों के खोज की अवस्था है।
इस अवस्था में वास्तविकता के मानसिक प्रतिनिधित्वों के बनाने की योग्यता विकसित होती है।

बच्चा लक्ष्य का प्रत्यक्षीकरण करके उसकी प्राप्ति का प्रयत्न करने लगता है।

बालक प्रयत्न और प्रारम्भिक पहचान के रूप में मुँह खोलने लगता है।

दो वर्ष की अवस्था तक पहुँचते पहुचते बालक अनेक उपस्थित एवं स्मृतिजन्य वस्तुओं एवं अनुभवों का अनुक्रमण करने लगते हैं।

बालक वस्तुओं को ढूँढने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। कार्यकारण को समझने की क्षमता भी पर्याप्त परिपक्वता प्राप्त कर लेती है। वह कारण एवं परिणामों में सम्बन्ध रथापित करने लगता है।

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पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational stage)

(2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational stage) –(2-7 वर्ष)

यह भाषा कौशल विकास की प्रमुख अवस्था है, जिसमें सन्दर्भ शब्दों की समझ पैदा होने लगती है।

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अब बालक वस्तु तथा उसके सन्दर्भ को प्रकट करने वाले शब्दों में अन्तर स्पष्ट करने लगता है।

चिह्न एवं प्रतीक में अन्तर स्पष्ट होने लगते हैं। विचार एवं कार्यों में गति आ जाती है, जिससे बालक अधिक से अधिक सूचनाएँ एकत्र करने लगता है।

धीरे-धीरे उसमें तार्किक गणितीय सम्प्रत्ययों (Logicomathematical operation) का विकास होने लगता है।

क्रियाओं का मानसिक प्रस्तुतीकरण प्रारम्भ हो जाता है, जिसे विचार (Thought) कहा जाता है।

यह अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखना या सूझ द्वारा सीखना (Insight learning) की आदिम अवस्था है, जिसमें
बालक किसी बाह्य व्यवहार (Overt action ) के बिना अपनी समस्याओं को मानसिक रूप से सुलझाने लगता है।

इस अवस्था के कुछ व्यवहार इस प्रकार हैं-
(1) आत्मकेन्द्रियता (Egocentrism)
(2) शृंखलाबद्ध केन्द्रविहीन चिन्तन (Chaine concatenative thinking)
(3) मानवीयकरण (Anthropomorphism)

पूर्व क्रियात्मक अवस्था (Pre-operational stage) को दो उपभागों में बॉटा गया है-

(1) पूर्व-संकल्पनात्मक काल : 2-4 वर्ष (Pre-conceptual phase) –

दो वर्ष का बालक कार्य कारण स्थान तथा वस्तुओं के आपसी सम्बन्ध को समझने लगता है।

भाषा की दृष्टि से उसके विचार अभी अस्पष्ट होते हैं। अभी वह विचार एवं संकेतों में अन्तर स्पष्ट नहीं कर पाता।

अनुकरण (Imitation) तथा खेल के माध्यम से वह अपने विचारों एवं भावों को प्रकट करता है।

उसकी भाषा पर उसका नियन्त्रण नहीं होता। नयी वस्तुओं को खोजने के प्रति वह उत्सुक रहता है।

स्मृति पर आधारित प्रतिमाओं का निर्माण प्रारम्भ हो जाता है, जिससे उसकी प्रत्यक्ष वस्तुओं एवं स्थूल अनुभूतियों पर निर्भरता कम होने लगती है।

इस अवस्था की मुख्य विशेषताएँ अनुकरण (Imitation) खेल, पूर्व-संकल्पना (Pre-concept) एवं भाषा विकास का प्रारम्भ है।

(2) अत:प्रज्ञ चिन्तन काल : 4-7 वर्ष (Intuitive though)

इस अवस्था में बालक दो प्रकार की बोली या भाषा का प्रयोग करते हैं-

(1) आत्मकेन्द्रित भाषा (Ego-centric speech )

इसमें बालक अपने आप से बोलता है।

(2) सामाजिक भाषा (Socialized speech) –

जिसे बालक दूसरों से बोलता है। इस अवस्था में बालक सामूहिक मोनोलॉग (Collective monologue) प्रदर्शित करते हैं, जिसमें भाषा का प्रयोग किये बिना ही वे एक-दूसरे को प्रेरित करते हैं।

धीरे-धीरे उनमें उचित भाषा प्रयोग की क्षमता विकसित हो जाती है।

बाह्य वातावरण से सामंजस्य एवं आन्तरिक संरचनाओं का आत्मसात् सन्तुलित होने लगता है।

अभी बालक का चिन्तन अपूर्ण ही रहता है, जिससे वह कार्य-कारण तथा उचित-अनुचित का भेद ठीक से नहीं समझ पाता।

यही कारण है कि बालक इस भ्रकार के निर्णय में सूझ एवं अन्तद्दृष्टि का प्रयोग करते हैं, जबकि प्रौढ़ तर्क का सहारा लेतेहैं।

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मूर्त संक्रियात्मक अवस्था/ स्थूल संक्रियात्मक अवस्था (concrete – operational stage)

(3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था/ स्थूल संक्रियात्मक अवस्था (concrete – operational stage)-(7-11 वर्ष)

मूर्त क्रियात्मक अवस्था 7 से 11 वर्ष तक होती है। इसे संज्ञानात्मक विकास का मुख्य परिवर्तन बिन्दु माना जाता है।

जब बालक इस अवस्था में आता है तो उसके विचार प्रौढ़ों के विचारों के अधिक निकट होते हैं।

अवस्था में बालक अनेक तार्किक क्रियाएँ करने में समर्थ हो जाता है। मूर्त क्रियात्मक तर्क अधिक तार्किक, नम्य और संगठित होता है।

इस अवस्था में बालक-बालिकाओं में चिन्तन समस्या समाधान के कौशल का विकास होता है।

मूर्त संक्रियात्मक अवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) विकेन्द्रण (Decentration)

इस अवस्था में बालक किसी वस्तु, घटना या पदार्थ के विभिन्न अवयवों एवं आयामों को एक साथ समझ सकता है, उनके सम्बन्धों को समझे सकता है तथा उनमें एकीकरण कर सकता है।

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(2) अविनाशिता (Conservation)

बालक अब समझ सकते हैं कि किसी वस्तु या पदार्थ के बाह्य रूप, रंग तथा आकार आदि में परिवर्तन होने पर भी उसकी मुख्य विशेषताओं में परिवर्तन नहीं होता।

जैसे-पानी के बर्फ या भाप के रूप में परिवर्तित हो जाने पर भी उसकी मुख्य विशेषताएँ नहीं बदलती तथा उसे पुन: पानी की अवस्था में लाया जा सकता है।

(3) क्रमगत क्षमता (Serialation)

क्रमगत क्षमता का अर्थ किसी आन्तरिक नियम के अधीन वस्तुओं को एक क्रम में रखने की क्षमता है।

इसी क्षमता को पियाजे ने ट्रांजिविटी (Transivity) भी कहा है। 7 वर्ष का बालक इस क्षमता के अनुसार वस्तुओं को क्रम से जमा सकता है।

(4) नकारात्मक (Negation)

इस अवस्था में बालक किसी कार्य को उल्टे रूप में भी कर सकता है। वह वस्तुओं को पूर्वावस्था की स्थिति में जमा सकता है।

(5) समरूपता (Identity)

समरूपता का तात्पर्य यह है कि वस्तुओं के रूप या आकार में बालकों को इस तथ्य का ज्ञान होता है कि वस्तुओं के सभी टुकड़ों का योग मूल वस्तुओं के बराबर होता है।

(6) क्षतपूर्तिकरण (Compensation or peciprocity)

इस अवस्था में बालक यह समझ सकते हैं कि किसी एक दिशा या आयाम में किसी भी प्रकार की कमी की पूर्ति दूसरा दिशा या आयाम में अधिकता के द्वारा की जाती है।

(7) मानसिक पुनर्प्रस्तुतीकरण (Mental peprescntation)

इस अवस्था में बालक कार्यां का प्रस्तुतीकरण मानसिक प्रतीकों के द्वारा कर सकते हैं।

उदाहरण के लिये, विद्यालय से घर तक का मार्ग शब्दों द्वारा बताने के साथ-साथ मानचित्र बनाकर भी दर्शा सकते हैं।

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अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था / औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था/ औपचारिक क्रियात्मक अवस्था ( Formal -operatinal stage)

(4) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था / औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था/ औपचारिक क्रियात्मक अवस्था ( Formal -operatinal stage) –(11-15 वर्ष)

यह अवस्था मानसिक विकास की ऊर्ध्वगामी प्रक्रिया (Vertical Decalage) की अवस्था है।

अर्थात्

अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था में समस्याओं के समाधान हेतु उच्च मानसिक स्तर की मानसिक क्षमताएँ विकसित होती हैं, जबकि मूर्त क्रियात्मक अवस्था (Concrete operational stage) में क्षैतिज (Horizontal ) दिशा में मानसिक क्षमताओं का विकास अधिक होता है।

इस अवस्था में किशोर विचारों के माध्यम से स्थूल अनुभवों के अभाव में भी चिन्तन कर सकता है। तथा समस्याओं का मानसिक समाधान ढूँढ सकता है। वह परिकल्पनाएँ बना सकता है तथा उनकी सत्यता स्थापित कर सकता है।

अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) इस अवस्था में किशोर अपने चिन्तन पर भी चिन्तन कर सकता है। वह काल्पनिक या शुद्ध परिकल्पनाएँ बना सकता है।

इस प्रकार परिकल्पनाएँ बनाना एवं उनकी सत्यता स्थापित करना इस अवस्था की एक मुख्य विशेषता है।

(2) बालक में तार्किक क्षमताएँ विकसित हो जाती हैं तथा वह अमूर्त चिन्तन (Abstract thinking) के योग्य हो जाता है।

(3) समस्याओं के समाधान में वह प्रत्यक्ष एवं वर्तमान वास्तविकताओं पर निर्भर नहीं रहता।

(4) उसके प्रयोग में एक व्यवस्था एवं क्रम उपस्थित हो जाता है।

(5) वह अमूर्त अवधारणाओं (Abstract con- cepts) को समझ सकता है एवं आत्मसात् कर सकता है; जैसे-नैतिकता, प्रेम, अस्तत्व एवं इमानदारी आदि।

(6) पियाजे के अनुसार, औपचारिक क्रियात्मक अवस्था ज्ञानात्मक विकास की अन्तिम अवस्था है।

अर्थात् सभी प्रकार की मानसिक क्षमताओं का अधिकतम विकास इस अवस्था में हो जाता है।

इस अवस्था के उपरान्त उपलब्धि में तो विकास हो सकता है किन्तु शानात्मक क्षमताओं में इस अवस्था के बाद विकास नहीं होता।

(7) इस अवस्था के प्रारम्भिक काल में किशोर बालक-बालिकाओं में स्वकेन्द्रीयकरण (Egocentrism) की प्रवृत्ति पायी जाता है।

किशोरावस्था आदर्शवादिता, तर्क, कल्पना तथा दिवास्वप्न आदि विशेषताओं की अवस्था है।

(8) इस अवस्था की एक दूसरी विशेषता समस्या समाधान की क्षमता है।

किशोर सैद्धान्तीकरण (Theorizes) करता है। अपने सिद्धान्तों का उपागमवत् विश्लेषण करता है, पुनर्निरीक्षण करता है तथा सभी व्याख्याओं को उचित स्थान देता है।

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