बालक का मानसिक विकास mental development of child

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बालक का मानसिक विकास mental development of child

मानसिक विकास, mental development,विभिन्न अवस्थाओं में मानसिक विकास दोस्तों आइये जानते है।बालक में मुख्य रूप से कितने विकास होते हैं?

बालक में कुल 6 प्रकार के विकास होते हैं।

हम शिक्षा मनोविज्ञान में शारीरिक विकास,मानसिक विकास,सामाजिक विकास,भाषा विकास,नैतिक विकास,संवेगात्मक विकास आदि को मुख्य रूप से पढ़ते है।

तो आइये आज जानते है की मानसिक विकास क्या है,शैशवावस्था में मानसिक विकास,बाल्यावस्था में मानसिक विकास,किशोरावस्था में मानसिक विकास कैसे होता है।

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मानसिक विकास का अर्थ || Mental Development

जन्म के समय शिशु असहाय अवस्था में होता है। वह मानसिक क्षमता में भी पूर्ण अविकसित होता है।

आयु की वृद्धि एवं विकास के साथ-साथ बालकों की मानसिक योग्यता में भी बृद्धि होती है।

इस पर वंशानुक्रम और वातावरण दोनों का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।

मानसिक विकास के पक्ष

मानसिक विकास के पक्ष इस प्रकार हैं।

(1) संवेदना (2) कल्पना (3) चिंतन

(4) निर्णय (5) बुद्धि (6) स्मरण

(7) निरीक्षण (8) प्रत्यक्षीकरण (9) ध्यान

(10) तर्क (11) भाषा (12) रुचि (13) सीखना

विभिन्न अवस्थाओं में मानसिक विकास || mental development in different stages

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शैशवावस्था में मानसिक विकास (Mental Development in Infancy )

शैशवावस्था में बालकों में होने वाले परिवर्तनों को विकास एवं अभिवृद्धि पर निर्भर होना पड़ता है।

यह परिवर्तन बहुत ही तीव्र एवं अचानक होते हैं। इसी से वैयक्तिक भिन्नता का आभास होता है।

सोरेन्सन के अनुसार -“जैसे-जैसे शिशु प्रतिदिन, प्रतिमास, प्रतिवर्ष बढ़ता जाता है,वैसे वैसे उसकी मानसिक शक्तियों में परिवर्तन होता जाता है।”

जन्म के साथ शिशु कुछ क्रियाओं का प्रदर्शन स्वतः ही करता है। जैसे-छींकना, हिंचकी लेना, चूसना, हाथ पैर हिलाना,रोना एवं चौकना आदि।

इसके साथ उसका मानसिक विकास ज्ञानेन्द्रियों पर निर्भर करता है।

वह अपने मानसिक विकास को वस्तु का आधार मानकर विकसित करता है।

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इसीलिये बालकों को विभिन्न प्रकार के प्रतिरूप दिये जाते हैं। इनको देखकर वे मस्तिष्क में वस्तु के अनुरूप प्रतिमा बना लेते हैं।

मानसिक विकास के द्वारा ही वे शरीर के अंगों का सही प्रयोग करना प्रारम्भ करते हैं।

प्रथम वर्ष में

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शिशु ध्यान लगाना, सर्वगी का प्रकट करना, शारीरिक अंगों में परिवर्तन लाना, विभिन्न ध्वनियाँ करना, वस्तु को पकड़ना, अपनी पसन्द एवं नापसन्द प्रकट करना, अनुकरण के द्वारा सीखना आदि क्रियाओ का प्रयोग करना प्रारम्भ कर देता है।

प्रथम वर्ष की समाप्ति पर एवं द्वितीय वर्ष के प्रारम्भ में

शिशु दो चार शब्द बोलना प्रारम्भ कर देता है।

द्वितीय वर्ष के अन्त तक

उसको 100 से लेकर 200 शब्द तक बोलने आने लगते है।

तृतीय एवं चतुर्थ वर्ष में

शिशु बोलना एवं लिखना सीखता है। इस समय वह अपने हाथों पर नियत्त्रण करना प्रारम्भ कर देता है।

शैशवावस्था के अन्तिम दिनों में

नाम बोलना, लिखना, गिनती का प्रयोग करना एवं जटिल वाक्यों को दोहराना आदि का विकास होता है।

निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि इस अवस्था को बालक स्थूल से सूक्ष्म की ओर, अस्पष्टता से स्पष्टता की ओर तथा अनिश्चित से निश्चित की ओर प्रस्तुत रहता है।

क्रो एवं क्रो के अनुसार-“समय अपने इस रूप में कुछ भी महत्त्व नहीं रखता। बच्चे को आज,कल एवं सप्ताह में कोई भी अन्तर स्पष्ट नहीं दिखलायी देता। समय की अवधि के सूचक सभी शब्द उसे मात्र शब्द प्रतीत होते हैं।”

बाल्यावस्था में मानसिक विकास (Mental Development in Childhood)

बाल्यावस्था में मानसिक विकास बड़ी तीव्र गति से होता है।

इस समय बालक की सहज प्रवृतियाँ एवं मूलवृत्तियाँ उसके सीखने में सहयोग प्रदान करती हैं। जिससे उसकी जिज्ञासा शान्त होती है।

उसमें रुचि, चिन्तन, स्मरण, निर्णय एवं समस्या समाधान आदि गुणों का स्वत: हो विकास होता है।

क्रो एवं क्रो ने लिखा है-“जब बालक लगभग 6 वर्ष का हो जाता है। तब उसकी मानसिक शक्तियों और योग्यताओं का पूर्ण विकास हो जाता है।”

बाल्यावस्था के प्रारम्भिक वर्षों में बालक मातृभाषा के स्वर एवं व्यंजन तथा गिनती पर अधिकार प्रकट करता है।

अपने शरीर के अंगों को बताना एवं वस्तुओं में अन्तर स्थापित करना प्रारम्भ कर देता है।

वह छोटी-छोटी घटनाओं का वर्णन एवं जटिल वाक्यों का प्रयोग करता है।

दैनिक प्रयोग की समस्याओं का समाधान भी करना प्रारम्भ कर देता है।

बाल्यावस्था के मध्य वर्षों में बालक की रटन एवं ग्रहण शक्ति में तीव्र वृद्धि होती है।

बालक छोटी-छोटी पंक्तियों को दोहराना, कहानी को सुनाना आदि सीख जाता है।

वह दैनिक व्यवहार को करना सीख जाता है। दिन, तारीख वर्ष एवं सिक्कों का पूर्ण ज्ञान प्रकट करने लगता है।

बालक देखी हुई घटना का स्पष्ट वर्णन करना आरम्भ कर देता है।

वाल्यावस्था के अन्तिम वर्षों में वह छोटी-छोटी कहानियों को सुना सकता है।

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वह सामाजिकता के प्रति जागरूक होने लगता है। इस समय बालक स्व-निरीक्षण एवं परीक्षण में विश्वास करता है।

वह जिज्ञासा, निरीक्षण और तर्क आदि शक्तिरयों का प्रयोग करके मानसिक चेतना को प्रकट करता है।

बालक संसार की विभिन्न वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करता है । वह देखी हुई फिल्म अथवा कहानी का 3/4 भाग तक सुनाने में सफल होता है।

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किशोरावस्था में मानसिक विकास (Mental Development in Adolescence)

बालक की प्रमुख अवस्था किशोरावस्था में मानसिक विकास को निम्न बिंदुओं के माध्यम से समझ सकते हैं।

बुद्धि में स्थिरता ( Subility ininteligence)

किशोरावस्था में बुद्धि का विकास पूर्ण हो जाता है। इसीलिये इस अवस्था को बुद्धि में स्थिरता लाने वाली अवस्था भी कहा जाता है।

टरमन, जोन्स एवं कोनाई और स्पीयरमैन आदि विद्वानों ने बुद्धि का पूर्ण विकास 14 से 16 वर्ष के बीच माना है।

मनोशास्त्रियों के अनुसार, बुद्धि में प्रखरता का विकास ही सम्भव है,क्योंकि बुद्धि तो जन्मजात होती है।

मानसिक शक्तियाँ (Mental powers)

इस अवस्था में बालकों एवं बालिकाओं की संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, अवधान, स्मृति, विस्मृति, कल्पना, चिन्तन, तर्क और समस्या समाधान आदि मानसिक शक्तियों का पूर्ण विकास हो जाता है।

वह इनका प्रयोग विभिन्न परिस्थितियों में आसानी से करते हैं।

चिन्तन में स्वाभाविकता (Reality in thinking)

इस आयु में चिन्तन में नवीनता और स्वाभाविकता आना प्रारम्भ हो जाता है।

किशोर सामाजिक रूढ़ियों, परम्पराओं, रीति-रिवाजों एवं अन्ध -विश्वासों आदि का विरोध करता है।

और नये मापदण्डों का प्रयोग करता है। अतः उसके चिन्तन को एक नयी दिशा मिलती है।

कल्पना शक्ति में तीव्रता (Sharpness in imagination power)

किशोरावस्था में कल्पना शक्ति का बाहुल्य रहता है।

किशोर अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये दिवास्वप्न देखते हैं।

उनकी इस कल्पना शक्ति को सही मार्ग-दर्शन देकर कला, संगीत, खेल, साहित्य एवं अन्य रचनात्मक कार्यों में मौलिकता का प्रदर्शन किया जाता है।

अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि कल्पना शक्ति की अधिकता बालिकाओं में बालको से अधिक होती है।

रुचि में विविधता (Differences in interest)

किशोरावस्था में रुचियों का विकास तीव्रता से होता है। स्त्री एवं पुरुष अपनी-अपनी रुचियों का चुनाव भिन्न-भिन्न तरीके से करते हैं।

बालिकाओं में स्त्रियोचित रुचियों का विकास होता है। और बालकों में पुरुषोचित रुचियों का। अत: रुचि विविधता होना स्वाभाविक है।

मानसिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक || Fractors Effecting to the mental Development

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(1) परिवार का वातावरण

मानसिक विकास पर परिवार के वातावरण का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।

यदि बालक के परिवार का वातावरण सुखमय नहीं है अर्थात परिवार में लड़ाई झगड़े होते हैं,तो बालक के मानसिक विकास में बाधा आएगी।

जो बालक लड़ाई झगड़े,कलह तथा दूषित भाषा वाले क्षेत्र के वातावरण में रहते है।उनका मानसिक विकास बाधित होता है।

(2) सही गुणवत्तापूर्ण भोजन / पौष्टिक भोजन

शरीर में होने वाले समस्त विकास भोजन पर ही निर्भर है। पौष्टिक भोजन से मानसिक विकास अधिक होता है।

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यदि बालक सही गुणवत्ता का भोजन ग्रहण करेगा तो उसका मस्तिष्क और शरीर सही से कार्य करेगा। और मानसिक विकास में किसी प्रकार की बाधा नहीं आएगी।

(3) प्रतिदिन की दिनचर्या

मानसिक विकास को प्रतिदिन की दिनचर्या भी प्रभावित करती है।

यदि बालक की प्रतिदिन की दिनचर्या सही नहीं है अर्थात उसके खाने का, सोने का, आराम करने का, सुबह उठने का समय निश्चित नहीं है तो वो अक्सर थका हुआ रहता है वो अपने समय का प्रबंधन नहीं कर पाता है।

और वह दिमागी रूप से चिंता से ग्रस्त रहेगा तो उसका मानसिक विकास प्रभावित होगा।

(4) रोग ग्रस्त या मानसिक आघात

बालक अक्सर बीमार रहता है तो उसका मानसिक विकास बाधित होता है।

यदि बालक को किसी प्रकार का मानसिक आघात लगा है तो उसका मानसिक विकास सामान्य बालक की तुलना में कम होता है।

(5) व्यायाम

मानसिक विकास में वृद्धि के लिए व्यायाम बहुत आवश्यक है। यदि कोई बालक सुबह उठकर व्यायाम करता है तो उसका शरीर स्वस्थ होता है।

स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। अतः व्यायाम से शरीर चुस्त दुरुस्त और मानसिक विकास सही क्रम में होता है।और मानसिक विकास में किसी प्रकार की बाधा नहीं आती।

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