शैक्षिक अनुसंधान या शोध का अर्थ एवं परिभाषा | शैक्षिक अनुसंधान के प्रकार एवं आवश्यकता

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शैक्षिक अनुसंधान या शोध का अर्थ एवं परिभाषा | शैक्षिक अनुसंधान के प्रकार एवं आवश्यकता

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(Educational research) शैक्षिक अनुसंधान या शोध का अर्थ एवं परिभाषा | शैक्षिक अनुसंधान के प्रकार एवं आवश्यकता

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शोध या अनुसन्धान का अर्थ

मूलतः अनुसन्धान शब्द को अंग्रेजी भाषा में ‘रिसर्च’ (Research) कहा जाता है। ‘Re-search’ शब्द हिन्दी बार-बार होता है तथा ‘सर्च’ (Search) का अर्थ खोज करना अथवा खोजना होता है। निश्चय ही यह अंग्रेजी का शब्द अनुसन्धान की प्रक्रिया को दर्शाता है जिसके द्वारा अनुसन्धानकर्ता किसी विषय को बार-बार खोजता है, जिसके माध्यम से वह उसके विषय में विभिन्न समंकों (Data) को एकत्र करता है तथा उनके विश्लेषण के आधार पर उसके सम्बन्ध में आपका निष्कर्ष निकालता है अर्थात् उपलब्ध समंकों की तह में पहुँचकर कुछ निष्कर्ष निकालना, नये सिद्धान्तों की खोज करना तथा उनसे प्राप्त समंकोंका विश्लेषण करना ही अनुसन्धान के अन्तर्गत आता है। अनुसन्धान में किसी समस्या का वैज्ञानिक अन्वेषण भी सम्मिलित होता है। अन्वेषण की क्रिया इस तथ्य की परिचायक है कि समस्या को अति निकटता से ही देखा जाये। उसकी पृच्छा (Inquiry) की जाये तथा उसका ज्ञान (Knowledge) प्राप्त किया जाये।

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अच्छे शोध या अनुसन्धान की विशेषताएँ

शोध या अनुसन्धान की अनेक मूलभूत विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं, जिसमे प्रमुख विशेषताओं का वर्णन निम्नलिखित रूप है-(1) अनुसन्धान का उद्देश्य किसी समस्या के समाधान की खोज करना ही होता है। (2) मूलतः अनुसन्धान की प्रक्रिया से नवीन ज्ञान की प्राप्ति ही होती है। (3) अनुसन्धान का मुख्य आधार निरीक्षणीय अनुभव अथवा वर्णन होता है। (4) अनुसन्धान के अन्तर्गत प्राथमिक स्रोतों तथा विद्यमान प्रदत्त को नये उद्देश्य के लिए एकत्र करना होता है। (5) अनुसन्धान के माध्यम से किसी सैद्धान्तिक अथवा व्यावहारिक समस्या का समाधान करने का प्रयास किया जाता है। (6) अनुसन्धान निश्चय ही चिन्तन की एक व्यवस्थित तथा आधुनिक विधि है। (7) अनुसन्धान के द्वारा ज्ञान के प्रकाश तथा प्रसार के लिए सुव्यवस्थित प्रयास किये जाते हैं।

अनुसन्धान का महत्त्व

अनुसन्धान निश्चय ही महत्वपूर्ण तथा बहुउद्देश्यीय विधि है। इसके प्रमुख महत्वों का वर्णन निम्नलिखित है-

(1) भूतकालीन की किसी घटना को समझने के लिए इसकी आवश्यकता अपरिहार्य है। इस पद्धति के अभाव में किसी समस्या के भूतकाल में जाना असम्भव ही हैतथा किसी समस्या की गहरायी अथवा भूतकाल को समझे बिना उसका समाधान भी असम्भव है। (2) अनुसन्धान घटनाओं का एक क्रमबद्ध चित्रण प्रस्तुत करता है, जिसके आ गार पर भविष्य की किसी घटना के विषय में परिकल्पनाओं का निर्माण सुगम हो जाता है। (3) इतिहास अथवा भूतकाल की प्रमुख त्रुटियों को समझने तथा उनसे सबक सीखने में यह विधि उपयोगी सिद्ध होती है। (4) यह विभिन्न विज्ञानों के लिए वैज्ञानिक तथा प्रमाणिक आधार का निर्माण करता है। (5) शिक्षा के क्षेत्र में यह अनुसन्धान पद्धति विशेष उपयोगी है क्योंकि इसी के आधार पर प्राचीन शिक्षा पद्धति का निरीक्षण किया जाता है तथा उसमें सर्वकालीन तथा सर्वग्राही तत्वों की खोज की जाती है।

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शैक्षिक अनुसन्धान के प्रकार

अनुसन्धान के उद्देश्य से हमें यह ज्ञान प्राप्त होता है कि शैक्षिक अनुसन्धानों का वर्गीकरण हम अनेक प्रकार से कर सकते हैं। अत: शैक्षिक अनुसन्धान का संक्षिप्त वर्गीकण निम्नलिखित हैं-(1) शोध आवाम की दृष्टि से वर्गीकरण, (2) योगदान की दृष्टि से वर्गीकरण।

इन वर्गीकरण का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है-

1. शोध आयाम की दृष्टि से वर्गीकरण

मुख्यत: अनुसन्धान कार्यों में तथ्यों का अध्ययन करने के लिए दो आयामों का प्रयोग किया जाता है, जो कि निम्नलिखित है-


(1) अनुप्रस्थ आयाम (Cross Sectional)

प्राय: यह शब्द वनस्पति विज्ञान से सम्बन्धित है। जब किसी पौधे के तने, पत्ती अथवा मूल (Root) का अध्ययन करना होता है, जब किसी पौधे के उस अंग का कटाव करके अध्ययन कर लिए जाते हैं, तब उसे ‘अनुप्रस्थ आयाम’ की संज्ञा दी जाती है। इस कार्य में समय का अधिक महत्व नहीं होता।

(2) अनुदैर्ध्य आयाम (Longitudinal Approach)

यह शब्द भी वनस्पति विज्ञान से सम्बन्ध रखता है। ऐसी स्थिति में जबकि किसी पेड़ का अध्ययन उसके बीज अवस्था से लेकर फल आने तक की अवस्था तक किया जाता है तो यह अध्ययन अथवा आयाम अनुदैर्ध्य-आयाम कहा जाता है।

2. योगदान की दृष्टि से वर्गीकरण

योगदान की दृष्टि से इसे भी दो भागों में विभाजित किया जाता है, इसका वर्णन अग्रलिखित है-

(क) क्रियात्मक अनुसन्धान (Action Research)-क्रियात्मक अनुसन्धान केद्वारामुख्यतः स्थानीय समस्याओं का अध्ययन किया जाता है, इसके द्वारा शिक्षण की प्रक्रिया में सुधार तथा विकास किया जाता है, इनसे ज्ञान वृद्धि नहीं की जाती। इन कारणों से क्रियात्मक अनुसन्धान को प्रयोगात्मक आयाम अनुसन्धान भी कहते हैं।

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(ख) मौलिक अनुसन्धान (Fundamental Research) -इस प्रकार के अनुसन्धान से ज्ञान में वृद्धि होती है, इसके अतिरिक्त इससे नवीन सिद्धान्तों का प्रतिपादन, नवीन विषयों की खोज तथा नवीन तथ्यों अथवा सत्यता का प्रतिस्थापन किया जाता है।

शैक्षिक अनुसन्धान या शोध की आवश्यकता

विषय, पाठ्यक्रम, अध्यापन की विधि, शिक्षा पद्धति, अनुशासन की विधियाँ, अध्यापक तथा शिक्षण सम्बन्ध, व्यवहार, विद्यार्थियों की मूल्यांकन की विधियाँ आदि अनेक क्षेत्र हैं जहाँ हमें अनुसन्धान की आवश्यकता होती है। संक्षेप में शैक्षिक आवश्यकताओं को निम्नलिखित बिन्दुओं से समझ सकते हैं-

(1) विभिन्न विषयों अथवा दर्शनों के अनुसार शिक्षा प्रदान करने एवं उनकी तुलनात्मक प्रभाविकता ज्ञात करने के लिएशैक्षिक अनुसन्धान आवश्यक है। (2) विद्यार्थी के बहुमुखी विकास को प्रभावित करने वाले कारणों के ज्ञात करने के लिए इसकी आवश्यकता होती है। (3) मूल्यांकन की पद्धति को वस्तुनिष्ठ तथा पारदर्शी बनाने में भी इसकी भूमिका आवश्यक है। (4) अध्यापकों तथा शिक्षार्थियों की विद्यालय के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित करने के लिए शैक्षिक अनुसन्धान की भूमिका अति महत्वपूर्ण सिद्ध होती है। (5) परिवर्तित परिवेश तथा माँग के अनुरूप शिक्षा क्षेत्र में परिवर्तन लाने के लिए शैक्षिक अनुसन्धान की आवश्यकता होती है। (6) शिक्षा की प्रक्रिया के विकास के लिए आन्तरिक सोपानों को खोजने तथा उनमें वृद्धि करने की दृष्टि से शैक्षिक अनुसन्धानों की आवश्यकता होती है। (7) विद्यार्थियों को उनकी सामर्थ्य, बुद्धि, समायोजन, व्यक्तित्व,रुचियाँ, महत्वाकांक्षा का स्तर तथा अभिक्षताओं के अनुरूप ढालने के लिए शैक्षिक अनुसन्धान की आवश्यकता होती है।

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