शिक्षण एवं प्रशिक्षण में अन्तर | अनुदेशन एवं शिक्षण में अन्तर | शैक्षिक एवं शिक्षण उद्देश्य में अन्तर

शिक्षण एवं प्रशिक्षण में अन्तर | अनुदेशन एवं शिक्षण में अन्तर | शैक्षिक एवं शिक्षण उद्देश्य में अन्तर  – दोस्तों सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा में शिक्षण कौशल 10 अंक का पूछा जाता है। शिक्षण कौशल के अंतर्गत ही एक विषय शामिल है जिसका नाम शिक्षण अधिगम के सिद्धांत है। यह विषय बीटीसी बीएड में भी शामिल है। आज हम इसी विषय के समस्त टॉपिक को पढ़ेगे।  बीटीसी, बीएड,यूपीटेट, सुपरटेट की परीक्षाओं में इस टॉपिक से जरूर प्रश्न आता है। जिसमें आज हम एक टॉपिक शिक्षण एवं प्रशिक्षण में अन्तर | अनुदेशन एवं शिक्षण में अन्तर | शैक्षिक एवं शिक्षण उद्देश्य में अन्तर  पढ़ेगे ।

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शिक्षण एवं प्रशिक्षण में अन्तर | अनुदेशन एवं शिक्षण में अन्तर | शैक्षिक एवं शिक्षण उद्देश्य में अन्तर

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शैक्षिक एवं शिक्षण उद्देश्य में अन्तर | अनुदेशन एवं शिक्षण में अन्तर | शिक्षण एवं प्रशिक्षण में अन्तर

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शैक्षिक एवं शिक्षण उद्देश्य में अन्तर (Difference Between Educational and Teaching Objectives)

शैक्षिक उद्देश्य (Educational Objectives)

Educational objectives या शैक्षिक उद्देश्य से तात्पर्य छात्रों में होने वाले उस परिवर्तन से है जो शैक्षिक क्रियाओं द्वारा नियोजित किया जाता है।ये उद्देश्य दार्शनिक प्रकृति के होते हैं। ये पाठ्यक्रम की रचना और अनुदेशन के लिए निर्देश प्रदान करते हैं और मूल्यांकन की प्रविधियों के विशिष्टीकरण में भी सहायक सिद्ध होते हैं।

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बैन्जामिन सेमुअल ब्लूम (B. S. Bloom) के अनुसार-“शैक्षिक उद्देश्य की सहायता से केवल पाठ्यक्रम की ही रचना और अनुदेशन के लिए निर्देशन ही नहीं दिया जाता अपितु ये मूल्यांकन की तकनीकियों के विशिष्टीरकण में भी सहायक है।”


शिक्षण उद्देश्य (Teaching Objectives)

ये संकुचित, विशिष्ट तथा स्पष्ट होते हैं। ये शैक्षिक उद्देश्य प्राप्त करने के लिए माध्यम हैं । इनका सीधा सम्बन्ध कक्षा- शिक्षण से है और ये सीखने की प्रक्रिया को सरल बनाते हुए उसमें गति एवं लय पैदा करते हैं। ये शिक्षण को दिशा प्रदान करते हैं तथा शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होते हैं। ये प्रत्यक्ष और व्यावहारिक होते हैं । शिक्षण-उद्देश्य छात्रों के व्यवहार में भी परिवर्तन लाते हैं। ये परिवर्तन शिक्षण उद्देश्यों प्राप्ति से सम्बन्धित होते हैं। ये उद्देश्य, अधिगम उद्देश्यों से जुड़े रहते हैं।

शिक्षण एवं प्रशिक्षण में अन्तर (Difference Between Training and Teaching)

क्र० सं०शिक्षण ( teaching)प्रशिक्षण ( training)
1 शिक्षण एक व्यापक संप्रत्यय हैंशिक्षण एक विधि मात्र है।
2शिक्षण का उद्देश्य ज्ञानात्मक भावात्मक एवं क्रियात्मक तीनों पक्षो से संबंधित है।प्रशिक्षण का संबंध केवल क्रियात्मक पक्ष से होता है
3शिक्षण का क्षेत्र व्यापक है।प्रशिक्षण का क्षेत्र क्रियात्मक पहलू से है।
4शिक्षण में बुद्धि और क्रिया दोनों से संबंध रहता है और यह विचारपरख है।प्रशिक्षण क्रियापरक है।
5अच्छे शिक्षण के परिणाम प्रभावशाली शिक्षण हैं।प्रशिक्षण की पहचान कार्य को अधिक कुशलता से करना है।
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अनुदेशन एवं शिक्षण में अन्तर (Difference Between Teaching and Instruction)

अनुदेशन की परिभाषा

“Instruction या अनुदेशन शिक्षण की एक ऐसी विधि है जिसमें सिखाने वाला सीखने वाले को तथ्यों को ज्ञान सीधे कराता है और सीखने वाले उसे बिना तर्क के स्वीकार करते हैं ।

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इसमें सिखाने वाला अधिक क्रियाशील रहता है और सीखने वाले कम क्रियाशील होते हैं।” “अनुदेशन वह प्रक्रिया है जो शिक्षार्थी को इससे उद्देश्यों की ओर प्रभावित करती अनुदेशन में अन्तःप्रक्रिया न होने के कारण हुए शिक्षण नहीं किया जा सकता है लेकिन शिक्षण में अनुदेशन भी सम्मिलित होता है।”


अनुदेशन की विशेषताएँ


(1) अनुदेशन एक विधि मात्र है।
(2) अनुदेशन का सम्बन्ध ज्ञानात्मक उद्देश्य से है।
(3) अनुदेशन तथ्यों के ज्ञान पर विशेष बल प्रदान करता है।
(4) अनुदेशन हमारा बुद्धि परख होता है ।
(5) अच्छे अनुदेशन से अच्छी और अधिक सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं।

शिक्षण का शिक्षा में योगदान (Contribution of Teaching in Education)

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया वर्तमान में शिक्षण व्यवसाय का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गयी है। इसका योगदान इस प्रकार है-


(1) यह नवीन अधिगम पर बल देती है।
(2) इससे शिक्षा के अनेक प्रारूप विकसित हुए हैं।
(3) शिक्षा को द्विमुखी प्रक्रिया की अन्त:क्रिया के रूप में स्वीकार करती है।
(4) इससे शिक्षार्थियों के गुणों का अधिगम में उपयोग किया जाता है
(5) शिक्षण की दशाओं में इस अधिगमन के द्वारा परिवर्तन हुआ है।
(6) इसके द्वारा अनेक नवीन प्रत्ययों का विकास हुआ है।
(7) इसके द्वारा अनेक शैक्षिक आविष्कार हुए हैं।
(8) इससे अधिगम की अनेक शैलियाँ विकसित हुई हैं।
(9) इससे अध्रिप्रेरणा की आन्तरिक रचना, योग्यता, क्षमता तथा उद्दीपन में परिवर्तन हुआ है।
(10) शैक्षिक लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से निर्धारित किये जाने लगा है।
(11) सार्थक अधिगम पर बल दिया जाने लगा है।
(12) शिक्षा सन्दर्भ सामाजिक हो गया है।
(13) शिक्षण दर्शन एवं सिद्धान्तों का निर्माण होने लगा है।
(14) मानव की ज्ञान तथा बौद्धिक योग्यता और क्षमता का विकास किये जाने लगा है।

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