मूल्यांकन के पक्ष | व्यापक मूल्यांकन के पक्ष | संज्ञानात्मक, क्रियात्मक, भावात्मक पक्ष

बीटीसी एवं सुपरटेट की परीक्षा में शामिल शिक्षण कौशल के विषय शैक्षिक मूल्यांकन क्रियात्मक शोध एवं नवाचार में सम्मिलित चैप्टर मूल्यांकन के पक्ष | व्यापक मूल्यांकन के पक्ष | संज्ञानात्मक, क्रियात्मक, भावात्मक पक्ष आज हमारी वेबसाइट hindiamrit.com का टॉपिक हैं।

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मूल्यांकन के पक्ष | व्यापक मूल्यांकन के पक्ष | संज्ञानात्मक, क्रियात्मक, भावात्मक पक्ष

मूल्यांकन के पक्ष | व्यापक मूल्यांकन के पक्ष | संज्ञानात्मक, क्रियात्मक, भावात्मक पक्ष
संज्ञानात्मक, क्रियात्मक, भावात्मक पक्ष


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मूल्यांकन के पक्ष | व्यापक मूल्यांकन के पक्ष

(1) संज्ञानात्मक पक्ष
(2) भावात्मक पक्ष
(3) क्रियात्मक पक्ष

(1) मूल्यांकन का संज्ञानात्मक पक्ष | व्यापक मूल्यांकन का संज्ञानात्मक पक्ष

व्यवहार के इस पक्ष का वर्गीकरण डॉक्टर ब्लूम ने 1956 में किया था। इस पक्ष के अंतर्गत वे उद्देश्य आते हैं जिनका संबंध हमारे ज्ञान के पुनः स्मरण, पहचान, बौद्धिक क्षमता एवं कौशलों के विकास से होता है।शिक्षण में ज्ञान, उद्देश्य इस बात पर बल देता है कि बालक को नवीनतम सूचना एवं शक्तियों से परिचित कराया जाए। ज्ञानात्मक पक्ष में मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया क्रियाशील रहती है तथा इस पक्ष को प्रत्येक विषय का एक अनिवार्य अंग समझा जाता है। साथ ही बालक के व्यक्तित्व की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। आधुनिक शिक्षा में इसकी बड़ी महत्ता है। संज्ञानात्मक पक्ष के अन्तर्गत निम्नलिखित तथ्यों का मूल्यांकन किया जाता है-

1. ज्ञान (Knowledge)-इसके अन्तर्गत छात्रों की पहचान सम्बन्धी, प्रत्यास्मरण सम्बन्धी, विशिष्ट तथ्यों के ज्ञान सम्बन्धी, सम्बन्धित विषय की सूचनाओं, सम्बन्धित विषय की शब्दावली,सम्बन्धित विषय की मान्यताओं एवं परम्पराओं आदि ज्ञानात्मक योग्यताओं का मूल्यांकन किया जाता है। यदि मूल्यांकन करने पर छात्र उक्त तथ्यों के सम्बन्ध में ज्ञान रखता है तो हमारी शैक्षिक व्यवस्था एवं पाठ्यक्रम का उद्देश्य प्राप्त हो जाता है।

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2. अवबोध (Understanding)-इसके अन्तर्गत छात्र की व्याख्या सम्बन्धी, विषयगत रूपान्तरण सम्बन्धी एवं स्पष्टीकरण सम्बन्धी क्षमताओं का मूल्यांकन किया जाता है। यदि छात्र इस क्षमता एवंदक्षता को प्राप्त कर लेता है तो शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को सफल माना जाता है। यदि छात्र इन क्षमताओं को प्राप्त नहीं कर सकता तो उसमें आवश्यक सुधार की सम्भावना का अनुभव किया जाता है।

3.अनुप्रयोग (Application)-इसके अन्तर्गत छात्र की सामान्यीकरण क्षमता,निदानात्मक क्षमता तथा ज्ञान का जीवन में प्रयोग करने की क्षमता का मूल्यांकन किया जाता है।

4. विश्लेषण (Analysis)-इस सोपान में छात्र में किसी प्रकरण से सम्बधित तथ्यों का विश्लेषण करने, अन्तर करने, उदाहरण देने तथा निष्कर्ष निकालने की योग्यता का मूल्यांकन किया जाता है। यदि छात्र उक्त योग्यताओं को व्यावहारिक रूप से सीख जाता है तो यह मान लिया जाता है कि शिक्षण अधिगम व्यवस्था प्रभावी रूप में सम्पन्न हो रही है।

5. संश्लेषण (Synthesis)-इसके अन्तर्गत मूल्यांकन का उद्देश्य छात्रों की संश्लेषणात्मक योग्यता का विकास करना है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत छात्रों में नवीन योजना के संगठन की योजना बनाना,समग्र सम्प्रेषण उत्पन्न करना तथा अमूर्त सम्बन्धों की खोज करना आदि योग्यताओं का मूल्यांकन किया जाता है।

6. मूल्यांकन (Evaluation)-इस सोपान में छात्रों की मूल्यांकन क्षमता के बारे में विचार किया जाता है। इसके अन्तर्गत छात्रों द्वारा मूल्यांकन निर्धारित करने की प्रक्रिया के बारे में अध्ययन किया जाता है।

(2) मूल्यांकन का भावात्मक पक्ष | व्यापक मूल्यांकन का भावात्मक पक्ष

व्यवहार के इस पक्ष का वर्गीकरण प्रो० ब्लूम, कर्थवाल तथा बी०बी० मसीआ ने 1964 में किया । इस पक्ष के अंतर्गत वे उद्देश्य आते हैं जिनका सम्बंध बालक की रुचियों,संवेगों तथा मनोवृत्तियों से होता है। जब बालक किसी कार्य को रुचि के साथ करता है अथवा परिस्थिति विशेष में प्रिय अथवा अप्रिय अनुभूति करता है तो उसका यह व्यवहारिक परिवर्तन भावात्मक पक्ष के अंतर्गत माना जाता है। भावात्मक पक्ष का विवरण निम्न प्रकार है –

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(1) आग्रहण (2) अनुक्रिया (3) अनुमूल्यन (4) अवधारणा (5) व्यवस्थापन (6) चारित्रिकरण

(3) मूल्यांकन का क्रियात्मक पक्ष | व्यापक मूल्यांकन का क्रियात्मक पक्ष

व्यवहार की इस पक्ष का वर्गीकरण सिम्पसन ने 1963 में किया था।इस पक्ष के अंतर्गत वे उद्देश्य आते हैं जिनका संबंध गतिवाही कौशल तथा ऐसी क्रियाओं से होता है जिनके लिए हमारी मांसपेशी एवं आंगिक गतियों की आवश्यकता होती है। शारीरिक शिक्षा ,व्यवसायिक एवं तकनीकी शिक्षा,हस्तलेखन, टाइपिंग, संगीत उपकरण बजाना, विज्ञान में उपकरण प्रयोग करना,भूगोल में नक्शा खींचना तथा इसी प्रकार के अन्य दूसरे कार्य बालक के व्यवहार के क्रियात्मक पक्ष से जुड़े होते हैं।मनोक्रियात्मक पक्ष को निम्न पाँच भागों में वर्गीकृत किया है-

(1) उत्तेजना या उद्दीपक (Impulsion)-क्रियात्मक पक्ष के इस स्तर में घटनाओं, वस्तुओं तथा कार्य के प्रति उत्तेजना लायी जाती है जिससे बालक किसी क्रिया या निष्पादन का अनुकरण कर सके। इस प्रकार के व्यवहार के लिए रुचि का होना आवश्यक है।

(2) कार्यवाही (Manipulation)-बालक उत्तेजना मिलने पर कोई एक गत्यात्मक क्रिया करता है। यहाँ वह विभिन्न माँसपेशीय गतियों में विभेदन करने के साथ-साथ अपने लिए उपयुक्त क्रियाओं का चुनाव भी करता है।

(3) नियन्त्रण (Control)-इस स्तर पर बालक अपने द्वारा की गयी क्रियाओं को नियन्त्रित करता है। व्यक्ति फिर से किये हुए कार्य को करने में उस कार्य की शुद्धता, अनुपात तथा सही होने का ध्यान रखता है।

(4) सामंजस्य (Co-ordination)-अनेक क्रियाओं पर नियन्त्रण के बाद विभिन्न गतिय क्रियाओं के मध्य सामंजस्य क्रम (Sequence) तथा एकरूपता (Harmony) बनाये रखता है।

(5) स्वाभावीकरण (Naturalization)-यहाँ कार्य की शैली इतनी स्वचालित हो जाती है कि कार्य अचेतन रूप में भी एक विशेष गति तथा ढंग से सम्पादित होने लगता है। उपरोक्त पाँचों उद्देश्यों को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। एक व्यक्ति स्कूटर चलाना सीखना चाहता है। उसमें स्कूटर चलाने की उत्तेजना इतनी ज्यादा है कि कई लोगों के मना करने पर भी वह स्कूटर चलाना सीखना आरम्भ कर देता है। धीरे-धीरे वह गति पर नियन्त्रण करना सीख जाता है फिर उसके बाद स्कूटर चलाने की विभिन्न क्रियाओं में सामंजस्य करना सीखता है। इसके बाद स्कूटर की सभी क्रियायें स्वाभाविक रूप से घटित होने लगती हैं और वह व्यक्ति की आदत बन जाती है। इसी कारण बहुत से मनोवैज्ञानिकों ने मनोक्रियात्मक पक्ष में एक छठा उद्देश्य आदत भी बताया है।

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