मुगलकालीन शिक्षा की विशेषताएं | मुगलकालीन शिक्षा के गुण एवं दोष | मकतब क्या हैं

बीटीसी एवं सुपरटेट की परीक्षा में शामिल शिक्षण कौशल के विषय वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा में सम्मिलित चैप्टर मुगलकालीन शिक्षा की विशेषताएं | मुगलकालीन शिक्षा के गुण एवं दोष | मकतब क्या हैं आज हमारी वेबसाइट hindiamrit.com का टॉपिक हैं।

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मुगलकालीन शिक्षा की विशेषताएं | मुगलकालीन शिक्षा के गुण एवं दोष | मकतब क्या हैं

मुगलकालीन शिक्षा की विशेषताएं | मुगलकालीन शिक्षा के गुण एवं दोष | मकतब क्या हैं
मुगलकालीन शिक्षा की विशेषताएं | मुगलकालीन शिक्षा के गुण एवं दोष | मकतब क्या हैं

मकतब क्या हैं | मुगलकालीन शिक्षा की विशेषताएं | मुगलकालीन शिक्षा के गुण एवं दोष

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मध्यकालीन या मुगलकालीन शिक्षा
Mughal or Medieval Period Education

मोहम्मद गौरी को भारत का प्रथम मुस्लिम शासक माना जाता है। मोहम्मद गौरी से लेकर मुगल राज्य की समाप्ति तक अर्थात् 12वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक भारत पर मुस्लिम शासकों का अधिकार रहा। 1192 में तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को हराकर मोहम्मद गौरी ने भारत में मुस्लिम शासन की स्थापना की।

मुस्लिम शासक अपने साथ एक नवीन संस्कृति, धर्म तथा आदर्श लाये तथा अपने शासन को सुदृढ़ करने के लिये उन्होंने स्वयं को मुस्लिम धर्म. तथा इस्लामी ज्ञान एवं संस्कृति का प्रचार करने के लिये समर्पित कर दिया। गुलाम, खिलजी, तुगलक, सैय्यद तथा लोदी वंश के बाद मुगल शासकों ने यहाँ पर अनेक शिक्षा संस्थाएँ खोली। मुस्लिम आक्रमणों तथा कालान्तर में मुस्लिम राज्य की स्थापना के फलस्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप के जनजीवन में अनेक दूरगामी परिवर्तन हुए। शिक्षा व्यवस्था भी परिवर्तन के इस प्रभाव से अछूती नहीं थी।

वैदिक श्लोकों तथा बुद्ध साहित्य के साथ-साथ कुरान की आयतों का भी पाठ होने लगा। यद्यपि मुस्लिम शासन के दौरान शिक्षा व्यवस्था हेतु न तो कोई औपचारिक एवं नियमित तथा न ही कोई व्यवस्थित शिक्षा योजना थी, परन्तु अधिकांश मुस्लिम शासकों ने इस्लामी शिक्षा के प्रति पर्याप्त रुचि दिखायी। प्राय: सभी मुस्लिम शासक शिक्षित थे तथा सभी ने विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया। शिक्षा को राज्य का उत्तरदायित्व न स्वीकारने के बावजूद भी लगभग सभी मुस्लिम शासकों ने अनेक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की तथा शिक्षा को प्रश्रय दिया, किन्तु यह कहना भी सत्य होगा कि इस काल में जनसाधारण की शिक्षा उपेक्षित थी।

देश में एक नयी शिक्षा व्यवस्था अर्थात् इस्लामी शिक्षा की धारा प्रवाहित होने लगी थी। इसके अतिरिक्त मुस्लिम शासकों ने हिन्दू शिक्षा केन्द्रों को खुलकर लूटा, पुस्तकालयों को जलाया तथा हिन्दू विद्वानों को निरुत्साहित एवं दण्डित किया तथा मार डाला। इसके फलस्वरूप मध्यकालीन भारत में प्राचीन संस्कृत शिक्षा लगभग मृतप्राय हो गयी।

मुगलकालीन या मध्यकालीन शिक्षा के उद्देश्य / Aims of Mughal Period Education in hindi

मुस्लिमकाल में भारतवर्ष में एक पूर्णतया नवीन संस्कृति का प्रचलन किया गया। इसलिये इस काल की शिक्षा के उद्देश्य वेदकालीन एवं बौद्धकालीन शिक्षा के उद्देश्यों से पूर्णतया भिन्न् थे। मुस्लिम शिक्षा के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे-

1.इस्लाम धर्म का प्रसार

मुस्लिम काल में शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य भारतीयों को इस्लाम धर्म अपनाने के लिये प्रोत्साहित करना था। स्पष्ट है कि इस्लाम धर्म के प्रचार एवं प्रसार में शिक्षा का सहारा लिया गया था।

2. इस्लामी संस्कृति का प्रसार

मुस्लिम कालीन शिक्षा का दूसरा महत्त्वपूर्ण उद्देश्य इस्लाम धर्म के रीति-रिवाजों, परम्पराओं, सिद्धान्तों तथा कानूनों को भारतीयों में फैलाना था। भारतवर्ष में मुस्लिम शासन के समय अनेक हिन्दुओं ने विभिन्न कारणों के वशीभूत होकर इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। इन नवदीक्षित मुसलमानों को शिक्षा के द्वारा मुस्लिम संस्कृति से परिचित कराना अत्यन्त आवश्यक था।

3. मुसलमानों में ज्ञान का प्रसार

ज्ञान की प्राप्ति शिक्षा के द्वारा ही सम्भव हो सकती है। इसलिये मुस्लिम शिक्षा का एक उद्देश्य मुसलमानों में ज्ञान का प्रसार करना था।

4. मुस्लिम शासन को सुदृढ़ करना

मुस्लिम शासकों ने शिक्षा को अपनी राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि का साधन भी माना। लगभग सभी मुस्लिम शासकों ने शिक्षा के द्वारा अपने शासन को अधिकाधिक दृढ़बनाने का प्रयास किया क्योंकि मुसलमानशासकों ने शासन-व्यवस्था में मुस्लिम संस्कृति को अधिक स्थान दिया। इसलिये शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिये मुस्लिम संस्कृति में निपुण व्यक्तियों की आवश्यकता भी थी। इसके अतिरिक्त वह ऐसे नागरिक तैयार करना चाहते थे, जो मुस्लिम शासन का विरोध न कर सकें।

5. सांसारिक ऐश्वर्य की प्राप्ति

मुसलमान सांसारिक वैभव तथा ऐश्वर्य को अधिक महत्त्व देते थे। मुस्लिम संस्कृति मेंपरलोक पर विश्वास नहीं किया जाता। अते: शिक्षा को आध्यात्मिक विकास का साधन न मानकर भावी जीवन की तैयारी माना जाता है। सम्भवत: इसी कारण से मुस्लिम काल में शिक्षा का एक उद्देश्य विद्यार्थियों को इस प्रकार से तैयार करना था कि वे अपने
भावी जीवन को सफल बना सकें तथा सांसारिक उन्नति कर सकें।

6. चरित्र का निर्माण

मुस्लिम शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करना था। मोहम्मद साहब ने चरित्र के निर्माण पर अतिशय बल दिया था। उनका कहना था कि इस्लाम के सिद्धान्तों के अनुसार उत्तम चरित्र का निर्माण करके ही व्यक्ति जीवन में सफलता हस्तगत कर सकता है। अ:: मकतबों और मदरसों में छात्रों में अच्छी आदतों और उत्तम चरित्र का निर्माण करने के लिये शिक्षकों द्वारा निरन्तर प्रयास किया जाता था।

7.धार्मिकता का समावेश

धर्म की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिये मुसलमानों में धार्मिकता की भावना को समाविष्ट करना अनिवार्य था। यही कारण था कि मकतबों और मदरसों को साधारणतया मस्जिदों से सम्बद्ध कर दिया गया, जहाँ प्रतिदिन सामूहिक नमाज एक सामान्य बात थी।मकतबों और मदरसों में शिक्षा ग्रहण करनेवाले छात्रों में इस धार्मिक वातावरण द्वारा धार्मिकता का समावेश किया जाता था। साथ ही उनको जीवन में धर्म के महत्त्व एवं गौरव से परिचित कराया जाता था।

मध्यकालीन शिक्षा की विशेषताएँ
Characteristics of Mughal Period Education

मध्यकालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है-

1.बिस्मिल्लाह रस्म

मुसलमानों की शिक्षा ‘बिस्मिल्लाह’ रस्म के बाद प्रारम्भ होती थी। जब बालक 4 वर्ष, 4 माह, 4 दिन की आयु का होता था तब उसे किसी मुल्ला अथवा मौलवी के सामने ले जाया जाता था। बालक सम्बन्धियों के सामने कुरान की कुछ आयतों का पाठ करके अथवा ‘बिस्मिल्लाह’ का उच्चारण कर अपनी शिक्षा प्रारम्भ करता था। धनी तथा सम्पन्न व्यक्ति मौलवी साहब को अपने घर पर ही बुलाकर बालकों की बिस्मिल्लाह रस्म अदा करा देते थे।

2. शिक्षा संस्थाएँ

मुस्लिम शासन के समय शिक्षा मकतब तथा मदरसों में दी जाती थी। सर्वप्रथम प्रारम्भिक शिक्षा के लिये बालक को मकतब भेजा जाता था। यहाँ प्रवेश से पहले ‘बिस्मिल्लाह’ नामक रस्म अदा की जाती थी। ‘मकतब’ शब्द की व्युत्पत्ति अरबी भाषा में ‘कुतुब’ शब्द से हुई है। इसका अर्थ है-लिखना। यहाँ अक्षर ज्ञान, पैगम्बरों के सन्देशों, उच्चारण एवं धार्मिक ग्रन्थ से सम्बन्धित शिक्षा दी जाती थी तथा पत्र व्यवहार, युसुफ जुलेखा गुलिस्ता, बोस्तां, अर्जीनवीसी, सिकन्दरनामा, धार्मिक कविताओं, लैला-मजनू, फारसी व्याकरण तथा बातचीत के ढंग की भी शिक्षा दी जाती थी।

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मकतबों की शिक्षा प्राप्त करने के बाद छात्र मदरसों में प्रवेश लेते थे। यहाँ उच्च शिक्षा की व्यवस्था की जाती थी। मकतबों की तरह यह भी मस्जिदों से सम्बद्ध होते थे। इनमें विद्वान् उस्तादों द्वारा भौतिक एवं धार्मिक शिक्षा दी जाती थी। अकबर के शासनकाल में मदरसों में गणित, कानून, कृषि, अर्थशास्त्र, इतिहास एवं ज्योतिष, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, राजतन्त्र, व्याकरण, यूनानी चिकित्मा, अरबी साहित्य तथा गृहशास्त्र आदि विषय पढ़ाये जाते थे। सभी मदरसों में सभी विषय नहीं पढ़ाये जाते थे। प्रत्येक मदरसा कुछ विशेष विषयों के लिये प्रसिद्ध था। कुछ मदरसों के साथ छात्रावास भी संलग्न थे।

3. शिक्षण विधि

मुस्लिमकालीन शिक्षा मुख्यतः मौखिक थी तथा पाठ्यवस्तु को कण्ठस्थ करने पर बल दिया जाता था। शिक्षक भाषण विधि प्रयोग करते थे। वे न केवल छात्रों की व्यक्तिगत कठिनाइयाँ दूर करते थे वरन् उन्हें स्वाध्याय हेतु भी प्रेरित करते थे। मानीटर प्रणाली उस काल में भी प्रचलति रही। इसमें उच्च कक्षाओं के छात्र निम्न कक्षाओं के छात्रों को पढ़ाते थे। मदरसों में ग्रन्थों को देखने तथा उनकी विवेचना करने की व्यवस्था थी। शिक्षा फारसी भाषा के माध्यम से दी जाती थी तथा शास्त्रार्थ एवं वाद-विवाद भी होते थे।

4. गुरु-शिष्य सम्बन्ध

मुस्लिमकाल में भी प्राचीनकाल के समान अध्यापक तथा छात्रों के सम्बन्ध बड़े घनिष्ठ होते थे। शिक्षकों को समाज में सम्मानीय स्थान दिया जाता था। यद्यपि शिक्षकों को अत्यन्त अल्प वेतन मिलता था फिर भी उन्हें सभी स्थानों पर बड़ा आदर मिलता था। अध्यापक छात्रों में श्रद्धा पाकर पूजनीय बन जातापातमा छात्र गुरुके आदेशों का पालन करके अनुशासित, विनम्र तथा सहनशील बन जाते थे। मदरसों के साथ छात्रावास होने से अध्यापक छात्रों के व्यक्तिगत सम्पर्क में रहते थे। इस सम्पर्क के कारण छात्र अपने उत्तरदायित्वों का पालन बड़े मनोयोग से करते थे तथा शिक्षक अपनी योग्यता एवं आदर्श व्यवहार से छात्रों पर अमिट छाप छोड़ता था। परन्तु मुस्लिम काल के अन्तिम वर्षों में अध्यापक-छात्र सम्बन्धों की घनिष्ठता तथा गुरुभक्ति के आदर्श लुप्त होने लगे थे तथा छात्र अनुशासनहीनता दृष्टिगोचर होने लगी थी। औरंगजेब ने भरे दरबार में अपने अध्यापक शाहसालेह का अपमान किया था।

5. परीक्षा प्रणाली

मुस्लिम शासकों के समय में भी किसी प्रकार की व्यवस्थित
परीक्षा प्रणाली विकसित नहीं हुई थी। शिक्षक अपने दृष्टिकोण के आधार पर छात्रों को एक कक्षा से दूसरी कक्षा में प्रोन्नत करते थे। शिक्षा की समाप्ति पर भी किसी प्रकार का प्रमाण-पत्र नहीं दिया जाता था परन्तु अपने विषय में अद्वितीय प्रतिभा दिखाने वाले छात्रों को काबिल, आलिम, फाजिल आदि उपाधियाँ दी जाती थीं। साहित्य के छात्रों को काबिल’, धार्मिक शिक्षा के छात्रों को आलिम तथा तर्क एवं दर्शन के छात्रों को फाजिल’ की उपाधि दी जाती थी।

6. दण्ड तथा पुरस्कार

इस काल में छात्र अत्यधिक अनुशासित जीवन व्यतीत करते थे। दैनिक पाठ तैयार न होने, झूठ बोलने, अनैतिक आचरण करने अथवा अनुशासन भंग करने पर शिक्षक शारीरिक दण्ड देते थे। इस दण्ड के बारे में कोई निश्चित नियम नहीं थे परन्तु शिक्षक बेते, कोड़े, लात, चूसा, थप्पड़ आदि मारने, मुर्गा बनाने, खड़ा करने जैसे दण्ड दिया करते थे। इस काल में चरित्रवान् तथा योग्य छात्रों को शिक्षक, राजा एवं उदार धनी लोग पुरस्कृत भी करते थे। सुयोग्य छात्रों को उच्च शिक्षा पाने के बाद राज्य के विभागों में उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था।

7. स्त्री शिक्षा

मुस्लिम काल में नारी शिक्षा की उपेक्षा थी। इसलिये कुछ परिवारों की बालिकाएँ शिक्षा प्राप्त करने में सफल सिद्ध हो सकी। स्पष्ट है कि मुस्लिम शासन के समय महिलाओं में पर्दा प्रथा का प्रचलन होने के कारण नारी शिक्षा का विकास बहुत कम था। कम आयु की बालिकाएँ तो मकतबों में जाकर प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण कर लेती थीं परन्तु उच्च शिक्षा के लिये घर उन्हें पर ही व्यवस्था करनी होती थी। इसलिये उच्च शिक्षा केवल शाही तथा अमीर घरानों तक ही सीमित थी। मुस्लिम काल में नारी शिक्षा परिवार के व्यक्तिगत उद्यम तथा आर्थिक क्षमता पर निर्भर करती थी।

8. व्यावसायिक शिक्षा

मुस्लिम शासकों ने ललितकला, हस्तकला तथा वास्तुकला जैसी व्यावसायिक शिक्षा को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया। मुस्लिम काल में दस्तकारी, नक्काशी, जरी, मलमल, हाथी दाँत तथा पच्चीकारी आदि कला-कौशल सम्बन्धी कार्य अत्यन्त उच्च कोटि के किये जाते थे। यद्यपि इन कलाओं की शिक्षा देने के लिये कोई औपचारिक संस्थाएँ नहीं थीं परन्तु इन कलाओं में दक्ष कारीगरों के साथ काम करके छात्रगण इन कलाओं का प्रशिक्षण प्राप्त करते थे। मुस्लिम शासकों को अपने शासन की रक्षा के लिये निरन्तर युद्ध लड़ने पड़ते थे। इसलिये इस काल में सैनिक शिक्षा का भी पर्याप्त विकास हुआ। निपुण योद्धाओं के द्वारा घुड़सवारी, तीरन्दाजी, युद्ध-संचालन एवं अस्त्र-शस्त्रों का प्रशिक्षण दिया जाता था।

9.छात्रावासों की व्यवस्था

मध्ययुगीन मकतबों में पड़ोसी क्षेत्रों से बालक अध्ययन करने आते थे। इस कारण मस्जिदों से संलग्न, मकतबों में छात्रावास नहीं थे। मदरसों में पढ़ने के लिये छात्र दूर-दूर से आते थे। इसलिये अधिकांश मदरसों के साथ छात्रावास की व्यवस्था रहती थी। यहाँ 200-400 छात्रों के रहने एवं खाने की निःशुल्क व्यवस्था की जाती थी। छात्रावास में जीवन सुविधाजनक था तथा भोजन में मुर्गा, मिठाई, फल आदि मिलते थे। कुछ मदरसों में छात्रों को कलम, कागज, तेल, कालीन भी निःशुल्क दिया जाता था। राज्य की ओर से मदरसों को बड़ी-बड़ी जागीरें मिलती थीं। इससे अच्छी आय होती थी।

इस आय से ही मदरसों एवं छात्रावासों का खर्च चलता था। वेद कालीन आश्रमों तथा बौद्धकालीन मठों की तुलना में मुस्लिमकालीन छात्रावासों का जीवन अधिक सुखदायक एवं सुविधा सम्पन्न होता था। प्राचीनकाल के आश्रम एवं मठ प्रायः निर्जन स्थानों पर स्थित होते थे परन्तु मुस्लिम काल के छात्रावास आबादी के बीच स्थित होते थे तथा संरक्षकों के द्वारा छात्रों की सुविधा के सभी साधनों को यथासम्भव उपलब्ध कराया जाता था।

10. वित्त व्यवस्था

मुस्लिमकाल की शिक्षा में अपने पूर्ववर्ती युग की तरह ही राजकीय सहायता का मिलना अथवा कुसमय पर मिलना जैसी स्थिति थी। इसीलिये आर्थिक अभाव के कारण अनेक शिक्षण संस्थाएँ बन्द हो गयी र्थी अर्थात् धर्मस्व, संकोचशील राजकीय सहायता, निजीदान, उपहार तथा कभी-कभी प्राप्त होने वाला शुल्क आदि से शिक्षा-संस्थाओं की
वित्तीय व्यवस्था संचालित होती थी। अध्यापक के वेतन, छात्रों के पोषण, भवनों की देखभाल तथा हस्तलिपियों की रचना एवं क्रय पर व्यय किया जाता था। मुस्लिम काल में हस्तलिखित पुस्तकों का व्यय अधिक बढ़ गया था।

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मुस्लिम आक्रमणकारियों एवं शासकों के द्वारा प्राचीन हिन्दू शिक्षा की धाराओं को प्रवाहित करने से रोकने के लिये अधिकांश शिक्षा केन्द्रों को नष्ट कर दिया गया था परन्तु हिन्दुओं का सामाजिक संगठन कुछ इस प्रकार का था कि मुस्लिम शासक अनेकानेक प्रयासों के बावजूद भी भारतीय संस्कृति को पूर्णतया नष्ट नहीं कर पाये। शासकों के प्रति रोष के बावजूद भी प्राचीन हिन्दू शिक्षा अपने विशेष सामाजिक संगठन, धनी नागरिकों की आर्थिक सहायता, गुरुओं के त्याग तथा जनसाधारण के लगाव के कारण न  केवल जीवित रही बल्कि इस काल में अमर साहित्य को भी जन्म दिया गया।

11.साहित्य एवं इतिहास

मुस्लिम युग में साहित्य और इतिहास का पर्याप्त विकास हुआ। अनेक मुस्लिम शासक, विद्या के प्रेमी और विद्वानों के संरक्षक थे। संरक्षण प्राप्त विद्वानों का आर्थिक चिन्ता से मुक्त होना और इसके फलस्वरूप उनके द्वारा साहित्य-सृजन के प्रति ध्यान दिया जाना स्वाभाविक था। यही कारण था कि मुस्लिम युग में नीति, दर्शन आदि विषयों पर साहित्य का सृजन हुआ और रामायण, महाभारत आदि हिन्दू ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद किया गया। भारत में क्रमबद्ध इतिहास का लेखन सर्वप्रथम मुस्लिम काल में ही आरम्भ हुआ। इस काल से पूर्व हमें ऐतिहासिक घटनाओं का क्रमिक वर्णन बहुत कम मिलता है। इन इतिहासकारों में जियाउद्दीन बर्नी का ‘तारीखे फिरोजशाही’, अबुल फजल का अकबर नामा’ और बदायूँनी का ‘मुन्तखब-उत-तवारीख’ इतिहास के बेजोड़ ग्रन्थ हैं।

12. पाठ्यक्रम

शिक्षा का पाठ्यक्रम विभिन्न स्थानों पर विभिन्न था। साधारणत: छात्रों को पढ़ने, लिखने और साधारण अंकगणित की शिक्षा दी जाती थी। उनको सबसे पहले वर्णमाला के अक्षरों का ज्ञान कराया जाता था और उसके पश्चात् कुरान की कुछ आयतें कण्ठस्थ करायी जाती थीं। जब छात्र को पढ़ने और लिखने का पर्याप्त ज्ञान हो जाता था तब उसे व्याकरण और फारसी भाषा की शिक्षा दी जाती थी। व्यावहारिक शिक्षा के अन्तर्गत बातचीत करने के ढंग, सुन्दर लेख, पत्र-लेखन एवं अर्जीनवीसी का प्रमुख स्थान था। नैतिक और चारित्रिक विकास के लिये शेख साही की प्रमुख पुस्तकें, ‘बोस्तां’ एवं ‘गुलिस्ताँ’ पढ़ायी जाती थीं और पैगम्बरों की कथाएँ एवं मुस्लिम फकीरों की कहानियाँ सुनायी जाती थीं। शहजादों और सम्पन्न परिवारों के छात्रों के लिये पाठ्यक्रम उनकी आवश्यकताओं के अनुसार विशेष प्रकार का होता था।

13. शिक्षण विधि

शिक्षा-विधि मौखिक और प्रत्यक्ष थी। छात्र को शुद्ध उच्चारण का ज्ञान हो जाने के बाद कलमा और कुरान की कुछ आयर्ते कण्ठस्थ करनी पड़ती थीं । कक्षा के सभी छात्र उच्च स्वर में एक साथ बोलकर पहाड़े रटते थे। मौलवी साहब नया पाठ तभी पढ़ाते थे, जब छात्रों को पिछला पाठ कण्ठस्थ हो जाता था। छात्र द्वारा लिखने के लिये लकड़ी की तख्ती का प्रयोग किया जाता था। जब उसे लिखने का अभ्यास हो जाता था तब वह पतले कलम से कागज पर लिखता था।

मुगलकाल में उच्च शिक्षा
Higher Education in Mughal Period


मुगलकालीन उच्च शिक्षा का स्वरूप निम्नलिखित प्रकार था-

1. शिक्षा संस्था

मदरसों में छात्र की उच्च शिक्षा की व्यवस्था थी। यह राज्य द्वारा सहायता प्राप्त करते थे। मदरसा वह स्थान होता था, जहाँ पर भाषण दिया जाता था। अर्थात् मदरसा उच्च शिक्षा का केन्द्र था। मदरसों के साथ छात्रावास की व्यवस्था भी थी। मदरसे व्यक्तिगत तथा राजकीय दोनों ही प्रकार के थे। आगरा, दिल्ली, लाहौर, मुल्तान, अजमेर, थी।
लखनऊ,स्यालकोट और मुर्शिदाबाद के मदरसों ने शिक्षा के क्षेत्र में विशेष ख्याति अर्जित की ।

2. पाठ्यक्रम

उच्च शिक्षा का पाठ्यक्रम विस्तृत होने के कारण निम्नलिखित दो भागों में विभाजित था-

(क) धार्मिक शिक्षा-

धार्मिक शिक्षा के अन्तर्गत छात्र को कुरान की आयतें कण्ठस्थ करनी पड़ती थी और उनका सूक्ष्म एवं आलोचनात्मक अध्ययन करना पड़ता था। इसके अतिरिक्त उसे सूफी सिद्धान्तों एवं इस्लामी इतिहास, कानूनी सिद्धान्तों और परम्पराओं का अध्ययन करना पड़ता था।

(ख) लौकिक शिक्षा-

लौकिक शिक्षा के अन्तर्गत छात्र को अरबी और फारसी भाषाओं का साहित्य एवं व्याकरण, कृषि, गणित, भूगोल, कानून, ज्योतिष एवं अर्थशास्त्र, नीतिशास्त्र, दर्शनशास्त्र तथा यूगनी चिकित्सा आदि विषयों की शिक्षा दी जाती थी। उपर्युक्त सभी विषयों की शिक्षा भी मदरसों में नहीं दी जाती थी। प्रत्येक मदरसे में साधारणत: दो विषयों की शिक्षा दी जाती थी, जैसे-दिल्ली के मदरसे में कविता और संगीत की, स्यालकोट के मदरसे में गणित और ज्योतिष की एवं रामपुर के मदरसे में ज्योतिष और अर्थशास्त्र की।

3.शिक्षण विधि

मदरसों में शिक्षण विधि मौखिक थी और छात्रों को शिक्षा देने के लिये अध्यापक, भाषण-विधि का प्रयोग करते ५ कक्षा नायकीय पद्धति का प्रचलन था,धर्म,दर्शन, तर्कशास्त्र, राजनीति के शिक्षण में तर्क-विधि का मुख्यस्थान था। संगीत, हस्तकला, चित्रकला, चिकित्साशास्त्र की शिक्षा में व्यावहारिक कार्य की समुचित व्यवस्था थी। छात्रों को स्वाध्याय के लिये प्रोत्साहित किया जाता था और अध्यापकों द्वारा उनकी कठिनाइयों का निवारण किया जाता था।

4. शिक्षा का माध्यम

मुस्लिम शासनकाल में राज्य की भाषा, फारसी थी। इस भाषा का ज्ञान प्राप्त करके ही मनुष्यों को राजपद प्राप्त हो सकते थे। इस कार्य में सहायता देने के लिये फारसी को शिक्षा के माध्यम के पद पर प्रतिष्ठित किया गया था।

5. परीक्षाएँ

आधुनिक युग के समान मुस्लिम युग में छात्रों की परीक्षा की कोई निश्चित प्रणाली नहीं थी। शिक्षक प्रत्येक छात्र के ज्ञान का स्वयं मूल्यांकन करके, उसे उच्च कक्षा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार दे देता था।

6. उपाधियाँ

सामान्य रूप से, शिक्षा समाप्त करने वाले छात्रों को प्रमाण-पत्र अथवा उपाधियाँ नहीं दी जाती थीं। किन्तु जो छात्र अपने अध्ययन के विषय में असाधारण योग्यता का प्रमाण देते थे, उनको उपाधियाँ दी जाती थीं; जैसे-साहित्य के छात्रों को ‘काबिल’, धर्मशास्त्र के छात्रों को ‘आलिम’, दर्शनशास्त्र के छात्रों को फाजिल’ की उपाधि से अलंकृत किया जाता था।

मुगलकालीन शिक्षा प्रदान करने वाली प्रमुख संस्थाएँ

मुगलकाल में जिन संस्थाओं द्वारा शिखा प्रदान की जाती थी, वे इस प्रकार हैं-


1. मकतब किसे कहते हैं / मकतब क्या हैं

‘मकतब’ शब्द की उत्पत्ति, अरबी के कुतुब’शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है-लिखना’। इस प्रकार ‘मकतब’ वह स्थान है, जहाँ बालकों को पढ़ना और लिखना सिखाया जाता है। मकतब, प्राथमिक शिक्षा के केन्द्र थे और साधारणत: किसी मस्जिद से सम्बद्ध थे। मकतबों में मुसलमान बालकों के साथ हिन्दू बालक भी शिक्षा प्राप्त कर सकते थे। मकतब’ एक शिक्षक वाली संस्था र्थी। इनमें शिक्षण-कार्य प्रातःकाल से मध्यान्ह तक और फिर अपरान्ह में होता था।

2.खानकाहें

‘खानकाहें’, प्रारम्भिक शिक्षा के केन्द्र थे। इनमें केवल मुसलमान बालक ही शिक्षा प्राप्त कर सकते थे। इनका व्यय दान में, प्राप्त होने वाले धन से चलता था।

3. दरगाहें

‘खानकाहों’ की भाँति ‘दरगाह’ भी प्राथमिक शिक्षा के केन्द्र थे। इनकी स्थिति बहुत कुछ खानकाहों के समान थी। इनमें भी केवल मुस्लिम बालक ही शिक्षा प्राप्त कर सकते थे।

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4. कुरान के स्कूल

इन स्कूलों में केवल कुरान की शिक्षा दी जाती थी। ये भी साधारणतः किसी मस्जिद से संलग्न होते थे। इनमें छात्रों को पहले अरबी लिपि का ज्ञान कराया जाता था और फिर कुरान की आयतें कण्ठस्थ करायी जाती थीं। लिखने और गणित की शिक्षा यहाँ नहीं दी जाती थी।

5.फारसी के स्कूल

मुस्लिम शासन काल में फारसी राजभाषा थी। अत: राजपद प्राप्त करने के इच्छुक हिन्दुओं और मुसलमानों के लिये फारसी भाषा का ज्ञान होना अनिवार्य था। इस माँग की पूर्ति के लिये फारसी के स्कूलों की स्थापना की गयी थी। इसमें छात्रों को साही और हाफिज़ के काव्यों एवं मुस्लिम संस्कृति की शिक्षा दी जाती थी।

6. फारसी अथवा कुरान के स्कूल

ये विद्यालय फारसी और कुरान स्कूलों के मिश्रित रूप थे। दूसरे शब्दों में इन स्कूलों में पारसी और कुरान दोनों की शिक्षा दी जाती थी।

7. अरबी के स्कूल

इन स्कूलों का मुख्य उद्देश्य अरबी भाषा और साहित्य के विद्वानों का निर्माण करना था। अत: इनमें शिक्षा का स्तर अत्यन्त उच्च होना स्वाभाविक था।

8. मदरसे

मदरसा’ शब्द की उत्पत्ति, अरबी भाषा के दरस’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है-‘भाषण’। इस प्रकार, ‘मदरसा वह स्थान है, जहाँ शिक्षण के लिये भाषण अथवा व्याख्यान-विधि का प्रयोग किया जाता है। मदरसे, उच्च शिक्षा के केन्द्र थे और सामान्यतया किसी मस्जिद से संलग्न होते थे। इनमें विभिन्न शिक्षकों के द्वारा विभिन्न विषयों की शिक्षा दी जाती थी। शिक्षा का माध्यम फारसी था। मदरसे, सावास शिक्षा केन्द्र थे। यहाँ छात्रों के दैनिक भोजन की सुन्दर व्यवस्था थी। योग्य छात्रों को छात्रवृत्ति भी दी जाती थी। शिक्षकों के लिये मदरसों में निवास और भोजन का प्रबन्ध था। इस प्रकार छात्र और शिक्षक निरन्तर घनिष्ठ सम्पर्क में रहते थे।

मुगलकालीन या मुस्लिम युगीन शिक्षा केन्द्र
Muslim Period Education Centre

मुस्लिम शासकों का राजनीतिक संगठन विकेन्द्रित था। उनके मातहत, मनसबदार, राजा, जींदार एक निश्चित कर देकर अपने क्षेत्र के अधिनायक बनाते थे। ये अधिनायक मस्जिदों का निर्माण कराते और प्रत्येक मस्जिद, मकतब तथा मदरसों में बदल जाती थीं।
मुस्लिम युग में आगरा, दिल्ली, जौनपुर, लाहौर, अजमेर, बीदर, लखनऊ, फिरोजाबाद, जालन्धर, मुल्तान तथा बीजापुर आदि शिक्षा के केन्द्र बन गये।

मुगलकालीन या मुस्लिम युगीन शिक्षा के गुण / Merits of Muslim Period Education

मुस्लिम युग की शिक्षा के गुण इस प्रकार हैं-

1.लौकिक तथा धार्मिक शिक्षा

इस युग में लौकिक तथा धार्मिक शिक्षा का समन्वय आरम्भ हुआ। अतः शिक्षा में व्यावसायीकरण की प्रवृत्ति विकसित हुई। राजकीय सेवाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों को रखा जाता था।

2. वस्तुनिष्ठता

शिक्षा में वस्तुनिष्ठता आ गयी थी। शिक्षा केवल ज्ञान के
प्रसार के लिये नहीं थी अपितु इसका उपयोगी होना उसकी एक अनिवार्य शर्त थी। औरंगजेब ने राजकुमारों की शिक्षा को व्यावहारिक बनाने पर विशेष बल दिया।

3. अनिवार्यता

मुस्लिम युग में मुस्लिम बालकों के लिये शिक्षा को अनिवार्य रखा गया। मोहम्मद साहब ने कहा था-“ज्ञान को प्राप्त करना उसे प्राप्त करना है, जो शिक्षा प्राप्त करता है, वह ईश्वर को प्राप्त करता है।”

4. इतिहास लेखन

इतिहास के विकास तथा लेखन कला में इस युग में बहुत ध्यान दिया गया। मुस्लिम युग में इतिहास लेखन की परम्परा का आरम्भ हुआ। साहित्य के विविध अंगों का विकास हुआ।

5.पारस्परिक सम्बन्ध

छात्रों तथा अध्यापकों के मध्य परस्पर सम्बन्ध अच्छे थे, किन्तु औरालिब के समय में अध्यापक का स्थान इतना ऊँचा नहीं रह गया था।

6. शिल्प कलाएँ

मुस्लिम शासकों के शासन काल में अनेक व्यावहारिक शिल्प कलाएँ विकसित हुईं। शिक्षा व्यवस्था में जीवनोपयोगी शिल्पकलाओं को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।

7. राजकीय संरक्षण

मुस्लिम युग में शिक्षा को राजकीय संरक्षण प्राप्त था, शिक्षा ग्रहण करना एक धार्मिक कृत्य समझा जाता था एवं शिक्षा का प्रसार भी एक धार्मिक कार्य था। धार्मिक प्रवृत्ति एवं भौतिक सुख पाने की इच्छा के कारण मुस्लिम युग में शिक्षा एक प्रकार से अनिवार्य बन गयी थी।

मुगलकालीन या मध्यकालीन शिक्षा के दोष / Demerits of Mughal Period Education

मुगलकालीन शिक्षा के दोष इस प्रकार थे-

1. भौतिक पक्ष पर बल

इस युग में शिक्षा के भौतिक पक्ष पर बहुत अधिक बल दिया गया। यद्यपि धार्मिक शिक्षा पाठ्यक्रम का एक अंग थी परन्तु जीवन के भौतिक पक्ष की ओर अधिक ध्यान दिया जाता था।

2. अमनोवैज्ञानिक शिक्षा

शिक्षा अमनोवैज्ञानिक थी। बालकों को पहले पढ़ना और फिर उन्हें लिखना सिखाया जाता था। फलत: बालकों के लिखने एवं पढ़ने का समान विकास नहीं हो पाता था।

3. हिन्दी की उपेक्षा

इस युग में अरबी तथा फारसी भाषा शिक्षण का प्रभाव अधिक था। अकबर ने हिन्दी के लिये प्रयत्न किये किन्तु उसका यह प्रयत्न एवं नीति सफल न हुई और उर्दू का जन्म हुआ।

4.अमीरों के लिये शिक्षा

इस युग में साधन सम्पन्न ही शिक्षा प्राप्त करते थे। जन शिक्षा की  व्यवस्था नहीं थी। शिक्षा नगरों तक सीमित थी। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा नहीं के बराबर थी।

5. नारी शिक्षा की उपेक्षा

युग में नारी शिक्षा की पूर्णत: उपेक्षा की गयी। राजघरान की बालिकाओं की शिक्षा के लिये अलग व्यवस्था थी। इस समय असुरक्षा की भावना भी अधिक थी। इसलिये नारी शिक्षा की प्रगति नहीं के बराबर थी।

6. पढ़ने लिखने पर बल

इस युग में सर्वांगीण विकास पर बल नहीं दिया गया। इस युग में पढ़ने तथा लिखने पर विशेष बल दिया जाता था।

7.विलासिता

इस युग में स्वाध्याय पर बल नहीं दिया जाता था। छात्रों में भी स्वाध्याय के स्थान पर विलासिता पायी जाती थी। व्यर्थ की विडम्बनाओं में छात्र तथा अध्यापक रहते थे।

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