सामाजिक अध्ययन शिक्षण के उपागम (NCF 2005 के अनुसार) | CTET SOCIAL STUDIES PEDAGOGY

दोस्तों अगर आप CTET परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो CTET में 50% प्रश्न तो सम्मिलित विषय के शिक्षणशास्त्र से ही पूछे जाते हैं। आज हमारी वेबसाइट hindiamrit.com आपके लिए सामाजिक विज्ञान विषय के शिक्षणशास्त्र से सम्बंधित प्रमुख टॉपिक की श्रृंखला लेकर आई है। हमारा आज का टॉपिक सामाजिक अध्ययन शिक्षण के उपागम (NCF 2005 के अनुसार) | CTET SOCIAL STUDIES PEDAGOGY है।

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सामाजिक अध्ययन शिक्षण के उपागम (NCF 2005 के अनुसार) | CTET SOCIAL STUDIES PEDAGOGY

सामाजिक अध्ययन शिक्षण के उपागम (NCF 2005 के अनुसार) | CTET SOCIAL STUDIES PEDAGOGY
सामाजिक अध्ययन शिक्षण के उपागम (NCF 2005 के अनुसार) | CTET SOCIAL STUDIES PEDAGOGY

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विद्यार्थियों द्वारा परस्पर अन्तःक्रिया के वातावरण में ज्ञान तथा कौशल अर्जित करने में मदद देने के लिए सामाजिक विकास के शिक्षण को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। प्रायः देखा गया है कि पाठ्यचर्या में चर्चा किए गए मुद्दों और बच्चे के प्रत्यक्ष ज्ञान में अन्तर बढ़ता जा रहा यह महत्वपूर्ण है कि सीखने की प्रक्रिया बच्चों और शिक्षकों में जांच-पड़ताल की प्रवृत्ति और रचनात्मकता को प्रोत्साहित करे। हालांकि सामाजिक विज्ञान का प्रभावी शिक्षण स्कूल के पुस्तकालय के समक्ष संचालन और उन शिक्षकों से अवश्य ही जुड़ा हुआ है, जो पुस्तकालय द्वारा चुनौतीपूर्ण परियोजनाओं और क्रिया-कलापों के निर्माण के लिए उपलब्ध कराए गए संसाधनों के प्रयोग में प्रशिक्षित है। इन परियोजनाओं के क्रियान्वयन से रटंग पद्धति से समझ कर सीखने की ओर बदलाव तभी हो कता है, जब अन्य सामानों के द्वारा शिक्षक बच्चे की समझ का मूल्यांकन करे न कि मात्र परियोजना को पूर्ण करने पर ध्यान दें।

सामाजिक अध्ययन पाठ्यक्रम के उपागम

(1) सह-सम्बन्ध उपागम [Correlation Approach]
(2) समन्वय उपागम [Integration Approach]
(3) केन्द्रित उपागम [Concertric Approach]
(4) चक्राकार उपागम [Spiral Approach)
(5) इकाई उपागम [Unit Approach]
(6) काल-क्रम उपागम [Chronological Approach]

सामाजिक विज्ञान या सामाजिक अध्ययन का पाठ्यक्रम एक बहु सामाजिक विषयों का संगठित रूप माना गया है। अतः पाठ्यक्रम के उस संगठित क्षेत्र से सम्बन्धित विभिन्न उपागमों द्वारा सामाजिक अध्ययन की पाठ्य-सामग्री को प्रस्तुत किया जाता है। इनका वर्णन इस प्रकार है-

(1) सह-सम्बन्ध उपागम

सामाजिक अध्ययन के अन्तर्गत सामाजिक विषय के रूप में अर्थशास्त्र, नागरिक शास्त्र, भूगोल, इतिहास, समाजशास्त्र आदि को एक-दूसरे से सम्बन्धित करते हुए पाठ्यक्रम को संगठित रूप में प्रस्तुत किया जाता है।सह-सम्बन्ध से तात्पर्य-सह-सम्बन्ध से तात्पर्य विषयों की परस्पर समान आधारों पर सम्बन्ध से माना जाता है। हरबर्ट द्वारा सर्वप्रथम स्कूल के पाठ्य विषयों में सह-सम्बन्ध स्थापित करने के लिए सुझाव दिया गया। हरबर्ट का कथन था कि पाठ्यक्रम में विषयों को इस प्रकार व्यवस्थित करना चाहिए, जिससे एक विषय के शिक्षण में दूसरे विषय का ज्ञान सहायक हो सके। इसका आधार उसका ‘पूर्वानुवर्ती ज्ञान का सिद्धान्त’ था। इस सिद्धान्त के अनुसार पूर्व विचारों से नवीन विचारों को सम्बन्धित कर दिया जाता है। ड्यूवी ने इस प्रकार की सम्बद्धता को सामंजस्यीकरण के नाम से पुकारा है।

(2) समन्वय उपागम

एकीकृत अथवा समन्वित उपागम का तात्पर्य पाठ्य-वस्तु के विभिन्न अंशों का समग्र रूप में एकत्रित करने अथवा निकट लाने की प्रक्रिया है। शिक्षा के इस एकीकृत रूप में इस प्रकार के परिवर्तन किये जायें कि यह व्यक्तियों के नवीनतम सामाजिक जीवन की आवश्यकताओं तथा आकांक्षाओं के अनुरूप हो सके और सामाजिक आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक परिवर्तन में सशक्त माध्यम बन सके। यह एक अमेरिकन प्रत्यय है। सर्वप्रथम हमारे देश में कोठारी आयोग (1966) ने इस प्रत्यक्ष की ओर संकेत किया। आयोग ने अपव्यय व अवरोध की समस्या को दूर करने के लिए इस उपागम का प्रयोग करने पर बल दिया।

इसमें निम्नलिखित बातों पर जोर दिया गया :-
a. शिक्षा में ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित है। अतः बच्चों को स्वयं अनुभव के आधार पर सीखने के लिए स्वतन्त्र रूप से प्रेरित करना चाहिए।
b. ज्ञान की प्राप्ति में केवल विषयों की ही शिक्षा न देकर व्यावहारिक पक्ष पर बल देना।
c. छात्र की रुचि तथा अनुभव के आधार पर सीखने के लिए प्रोत्साहित करना।

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(3) केन्द्रित उपागम

इस उपागम में सामाजिक विज्ञान को केन्द्रीकृत करके विभिन्न विषयों, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र,नागरिक शास्त्र तथा समाजशास्त्र का एक केन्द्र तथा उसके विभिन्न विज्ञान पाठ्यक्रम की रचना की जाती है ताकि सभी विषयों का ज्ञान सार्थक एवं प्रभावशाली रूप में छात्रों को प्रदान किया जा सके।

केन्द्रित उपागम की विशेषतायें

(a) यह उपागम पाठ्य-वस्तु के क्रमबद्ध रूप पर बल देता है।
(b) छात्र को पाठ्य सामग्री का अध्ययन सरल से कठिन की ओर प्रदान किया जाता है। इससे वह प्रत्येक बिन्दु को साथ-साथ सीखता है।
(c) यह उपागम पूर्णतः मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है, क्योंकि इसमें छात्रों की रुचि एवं अभिरुचियों पर विशेष बल दिया जाता है।
(d) केन्द्रित उपागम द्वारा पाठ्य-वस्तु को प्रभावशाली, सार्थक, उपयुक्त एवं सादृश्य के रूप में प्रस्तुत करने पर बल दिया जाता है।

(4) चक्राकार उपागम

चक्राकार उपागम में पाठ्य-वस्तु की प्रत्येक इकाई एक चक्राकार रूप से सम्बन्धित होती है। यह एक दूसरे से परस्पर एवं समन्वित कार्यों पर आधारित होती है। इन सामाजिक क्रियाओं का चक्र पूर्णरूप से क्रमबद्ध होता है जिसके द्वारा प्रत्येक इकाई एवं अधीन दो रूपों में कार्य करती है। इसे ही चक्राकार उपागम के नाम से पुकारा जाता है। सामाजिक अध्ययन पाठ्यक्रम का मुख्य आधार सामाजिक चरित्र एवं सामाजिक आदर्शों व मूल्यों का विकास करना होता है। साथ ही समाजवादी मानवीय, सम्बन्धों, सिद्धान्तों तथा सामाजिक जीवन हेतु चेतनशीलता एवं जागरूकता उत्पन्न करना है। इसी सामाजिक भावना द्वारा महत्वों, मूल्यों तथा मनोभावों को उत्पन्न करने में चक्राकार उपागम उत्प्रेरक के रूप में कार्य करती है।

चक्राकार उपागम की विशेषतायें

> ज्ञान की प्रत्येक कड़ी एक-दूसरे से परस्पर सम्बन्धित होती है। इससे शिक्षण में व्यावहारिकता तथा सार्थकता पर बल दान किया जाता है।
> प्रत्येक शिक्षण की इकाई चक्राकार रूप में कार्य करती है। इससे उनका महत्व अधिक बढ़ जाता है।
> यह उपागम सामाजिक अध्ययन पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग माना जाता है। > इसके द्वारा छात्र सरलता एवं सुगमता से प्रत्येक वस्तु को समझता है।
> इस उपागम में शिक्षण को प्रभावशाली तथा सार्थक बनाने में विशेष बल दिया जाता है।

(5) इकाई उपागम

इकाई ‘Unit’ शब्द की उत्पत्ति नवीन है परन्तु इसमें निहित धारणा नवीन नहीं है शिक्षा के क्षेत्र में सामान्य रूप से इसका प्रयोग 1920 ई. से हुआ। इसे पहले विषय-वस्तु के क्षेत्र के संगठन का ढांचा माना गया परन्तु बाद में इसको एक शिक्षण विधि के रूप में ग्रहण किया गया। मॉरिसन ने कहा है,”इकाई वातावरण, संगठन विज्ञान, कला या आचरण का एक व्यापक एवं महत्वपूर्ण अंग होती है, जिसे सीखने के फलस्वरूप व्यक्तित्व में सामन्जस्य आ जाता है।” राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद-“इकाई एक निर्देशात्मक मुक्ति है जो छात्रों को समवेत रूप में ज्ञान प्रदान करती है।”

मॉरिसन द्वारा प्रतिपादित- “इकाई उपागम के पद”

1. अन्वेषण-इस पद पर शिक्षक इस बात का पता लगाता है कि नवीन इकाई के सम्बन्ध में छात्रों को जितना पूर्व ज्ञान है।
2. प्रस्तुतीकरण-इस पद पर शिक्षक इकाई की विषय-वस्तु को छात्रों को समक्ष बातचीत या व्याख्यान द्वारा प्रस्तुत करता है तथा प्रश्नों द्वारा यह जानने का प्रयास करता है कि छात्र इकाई की विषय-वस्तु को समझ गये हैं या नहीं।
3. आत्मीकरण-इस पद पर छात्रों को इकाई की विषय-वस्तु को पुस्तकालय अध्ययन द्वारा, गहन चिन्तन एवं अध्ययन द्वारा आत्मसात् करने का अवसर प्रदान किया जाता है।
4. संगठन-इस पद पर इकाई की विषय-वस्तु को व्यवस्थित रूप से मिलकर ज्ञान को संगठित करते हैं और यदि वे ऐसा करने में सफल हो जाते हैं तो शिक्षक समझ लेता है कि वे इकाई की विषय-वस्तु को समझ गए हैं।
5. अभिव्यक्ति-अन्त में अभिव्यक्ति अथवा वाचन चरण आता है जिसकी दो विधियां हैं.
1. आदर्श विधि
2. वास्तविक विधि

इकाई उपागम के लाभ

(A) यह उपागम वातावरण संबंधी इकाइयों का प्रयोग करके छात्रों को वातावरण से सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता प्रदान करती है।
(B) यह उपागम विविध प्रकार की क्रियाओं, अनुभवों तथा समस्याओं का आयोजन करके क्रियाशीलता के सिद्धान्त पर बल देती है।
(C) यह कक्षा कार्य को अधिक साभिप्राययुक्त रोचक तथा सक्रिय बनाती है।
(D) इसके द्वारा छात्रों में स्वाध्ययन की आदत का निर्माण किया जा सकता है।

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(6) कालक्रम उपागम

ऐतिहासिक घटनाओं की समय, स्थान के परिप्रेक्ष्य तथा संदर्भ में समझने को हम ‘काल बोध कहते हैं। “कालक्रम उपागम अनुभूति जीवन व क्रियाओं को समझने की वह क्षमता है, जो उनमें कुछ सम्बन्ध स्थापित करती है,घाटे कहलाती है। कालक्रम का ज्ञान देना सामाजिक अध्ययन शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य माना जाता है। इससे घटनाओं तथा वर्तमान एवं अतीत को समझना सुगम होता है। कालक्रम अनुभूति महान पुरुषों, घटनाओं तथा आन्दोलनों, युद्धों को समझने तथा उनकी प्राचीनता का अनुभव करने में सहायक होता है।

कालक्रम उपागम की विधियां

1. समय-रेखा चार्ट (Time Line) – समय-रेखा कालक्रम अनुभूति के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है। इसमें अमूर्त प्रत्यय को बोधगम्य बनाने के लिए रेखा द्वारा छात्रों को प्रत्यक्षीकरण कराया जाता है।

2. समय-चार्ट (Time Chart ) – सामाजिक अध्ययन शिक्षण में समय चार्ट द्वारा विभिन्न घटनाओं के मध्य समयगत सम्बन्धों को स्पष्ट किया जा सकता है। समय-चार्ट में एक क्षेत्र या व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित घटनाओं को कालक्रम के अनुसार प्रदर्शित किया जाता है।

3. समय-ग्राफ (Time Graph) – समय-ग्राफ का प्रयोग विकास-क्रम तुलनात्मक अध्ययन में अधिक प्रयुक्त होता है। मुगल तथा मराठा साम्राज्य को दो समान-ग्राफ पर तुलनात्मक अध्ययन के लिए प्रदर्शित किया जा सकता है। इसी प्रकार दो समान समय-ग्राफ ब्राह्मण युग तथा बुद्ध युग के शिक्षण के लिए प्रयुक्त किए जा सकते हैं।

(7) अभिक्रमित उपागम

सामान्य रूप से ऐसा अधिगम या अनुदेशन जो किसी अभिक्रमित पाठ्यपुस्तक शिक्षण मशीन या कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर तकनीक से प्रदान किया जाता है, अभिक्रमित अधिगम या अनुदेशन कहलाता है।
सूसन मार्कले-“अभिक्रमित अनुदेशन पुनः प्रस्तुत की जा सकने वाली क्रियाओं की श्रृंखला को संचरित करने की वह विधि है जिसकी सहायता से व्यक्तिगत रूप से विद्यार्थियों के व्यवहार में मापनीय और विश्वसनीय परिवर्तन लाया जा सके।”

अभिक्रमित अधिगम की विशेषताएं –

(i) अभिक्रमित अनुदेशन अथवा अधिगम वैयक्तिक रूप से शिक्षण प्रदान करने की एक तकनीक है जिसके द्वारा अनुदेशन प्रक्रिया का उपयुक्त सतत मूल्यांकन किया जा सकता है।
(ii) यह अनुदेशन अथवा शिक्षण विभिन्न स्त्रोतों जैसे-अभिक्रमित पाठ्यपुस्तक, शिक्षण मशीन, कंप्यूटर आदि के द्वारा दिया जा सकता है।
(iii) इस प्रकार के अनुदेशन में अनुदेशनात्मक सामग्री को पहले तार्किक क्रम में व्यवस्थित किया जाता है और फिर इसे छोटे-छोटे उचित पदों (फ्रेम Frames) में विभक्त किया जाता है।
(iv) अनुदेशनात्मक सामग्री की किसी एक विशेष इकाई से संबंधित विभिन्न पदों (frames) को व्यवस्थित एवं श्रृंखलाबद्ध करने के लिए विद्यार्थियों की प्रविष्टि (Entry) और अंतिम (Terminal) व्यवहार को ध्यान में रखना होता है।
(v) इस अनुदेशन में विद्यार्थी को बराबर सक्रिय रहना पड़ता है, इस प्रकार अधिगमकर्ता को अपनी गति से सीखने का पूरा-पूरा अवसर मिलता है।

सामाजिक अध्ययन शिक्षण की समस्याएं

(1) सामाजिक अध्ययन में पाठ्यक्रम का लचीला न होना – वर्तमान में सामाजिक अध्ययन से सम्बन्धित प्रमुख समस्या यह है कि इसका पाठ्यक्रम लचीला नहीं है। इस विषय की पाठ्य-पुस्तकों में व्यावहारिक ज्ञान के स्थान पर सूचनाओं से इन्हें परिपूर्ण करने पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

(2)  संसाधनों का अभाव – संसाधन की उपलब्धता की स्थानीय परिस्थितियों और विशिष्ट परिस्थितियों पर आधारित होती है। सामाजिक विज्ञान के शिक्षण के लिए कुछ संसाधनों का होना आवश्यक है, किन्तु अधिकतर विद्यालयों में इनके अभाव के कारण इस विषय में छात्रों की रुचि कम होती जा रही है।

(3) निजी अनुभवों का प्रयोग न होना – सामाजिक अध्ययन के शिक्षण में निजी अनुभवों का प्रयोग आवश्यक है परन्तु विद्यालयी स्तर पर सामाजिक अध्ययन के अध्यापन की यह एक प्रमुख समस्या है।

(4) छात्रों के अभिलक्षण – छात्रों के स्तर, आयु, अनुभव, उद्भासन, ग्रामीण या शहरी वातावरण,सामाजिक-आर्थिक स्थिति, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि आदि में अन्तर होने की वजह से भी सामाजिक अध्ययन के शिक्षण सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसलिए अध्यापकों को चाहिए कि कक्षा के विभिन्न छात्रों की मानसिकता को समझते हुए शिक्षण प्रक्रिया को संपन्न करे।

(5) प्रेरणा में कमी – छात्रों की पाठ्य सामग्री में रुचि पैदा करने के लिए प्रेरणा. एक महत्वपूर्ण कारक है। इस दृष्टि से प्रेरणा के सिद्धान्त का तात्पर्य विद्यार्थियों में ज्ञान प्राप्त करने के लिए रुचि उत्पन्न करना है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि प्रेरणा छात्रों के अधिगम को अधिक स्थायी बनाने में सक्षम होती है।

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(6)  क्रियाशीलता के सिद्धान्त की अपर्याप्तता – यहां क्रियाशीलता का तात्पर्य करने सीखने से है। करके सीखने में अधिक से अधिक इन्द्रियों का प्रयोग होता है। जिसके कारण अधिगम बेहतर होता है। इसे परियोजना पद्धति भी कहा जाता है। सामाजिक अध्ययन शिक्षण की यथासंभव परियोजना पद्धति के अनुकूल करने की आवश्यकता है।

(7) शिक्षण विधियों के चयन की समस्या – छात्रों की रुचि, अभिरुचि तथा क्षमता के अनुसार सही शिक्षण विधियों के चयन की समस्या सामाजिक अध्ययन की एक प्रमुख समस्या है।

(8) उपचारात्मक शिक्षण की समस्या – सामाजिक अध्ययन के शिक्षण ने शिक्षक छात्रों की त्रुटियों के बारे में विस्तार से जानकारी नहीं रखते हैं जिसके कारण शिक्षण सुचारु रूप से नहीं चल पाता है।

(8) अनुशासन की समस्या – आज के बदलते परिवेश में बच्चों पर टेलीविजन एवं सामाजिक परिवेश का अत्यधिक प्रभाव देखा जाता है। इन कारणों से कुछ बच्चों में अनुशासनहीनता की समस्या उत्पन्न हो सकती है। शिक्षक को इस प्रकार की समस्या से निपटने हेतु किसी भी प्रकार की परिस्थिति में कठोर व्यवहार नहीं करना चाहिए, बल्कि उनसे सहानुभूतिपूर्ण तरीके से पेश आना चाहिए।

(9)  छात्रों का गृह-कार्य में रुचि न लेना – सामाजिक अध्ययन को अधिकतर छात्र अत्यधिक आसान मानते हैं, इसलिए इस विषय से सम्बन्धित गृह कार्य में उनकी रुचि नहीं होती। शिक्षक भी इसमें नवाचार का प्रयोग नहीं कर पाते।

◆◆ उपयोगी लिंक – NCF 2005 के प्रमुख बिंदु

अभ्यास प्रश्न ( बहुविकल्पीय प्रश्न )

1.यदि शिक्षार्थियों/विद्यार्थियों को विभिन्न स्थितियों में और भिन्न-भिन्न तरीकों से किसी कार्य अथवा अनुसन्धान को करने का अवसर बार-बार मिले तो इससे-
(a) हर परिस्थिति में छात्रों को उनकी मर्जी के अनुसार पढ़ने की छूट मिलती है।
(b) विभिन्न स्थितियों में और विभिन्न तरीकों से मनोरंजन के उचित अवसर मिलते हैं।
(c) समझ और योग्यताओं का विकास होता है।
(d) किसी भी परिस्थिति में कार्य करने की छूट मिलती है।

2. निम्नलिखित दिए गए पदों में से कौन-सा पद सामाजिक अध्ययन शिक्षण की योजना विधि से सम्बन्धित नहीं है?
(a) परिस्थिति प्रदान करना
(b) अनुसंधान
(c) उद्देश्य एवं चयन
(d) क्रियान्वयन

3. आप कक्षा VII की विषय अध्यापिका होने के नाते बच्चों/शिक्षार्थियों को सामाजिक अध्ययन ‘भूगोल शिक्षण के दौरान ‘मृदा के प्रकार की अवधारणा स्पष्ट करने हेतु उन्हें निम्नलिखित में से कौन-सी परियोजना देना सबसे उचित समझेगी?
(a) मृदा के विभिन्न नमूने एकत्र करके उनके सैम्पल इकट्ठे करना
(b) कक्षा कक्ष में मिट्टी में उगे हुए उत्पादों की प्रदर्शनी लगाना
(c) अखबारों और पत्रिकाओं से मिट्टी की विभिन्न तस्वीरें एकत्र करना
(d) मृदा में खेलने के लिए शिक्षार्थियों को प्रोत्साहित करना ताकि वो अनुभव प्राप्त करे।

4. कालक्रम उपागम का दोष है-
(a) रोचकता का अभाव
(b) शिक्षा के सिद्धान्तों का उल्लंघन
(c) पुनरावृत्ति का अभाव
(d) उपरोक्त सभी

5.सामाजिक अध्ययन शिक्षण विधि ‘इकाई योजना’ तैयार करते समय जिन तथ्यों/तथ्य का ध्यान रखना चाहिए-
(a) इकाई के अन्तर्गत विद्यार्थियों को ज्ञानार्जन के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए।
(b) शिक्षण बिन्दु संक्षेप में लिखे जाएं।
(c) उद्देश्य अति आधुनिक नहीं होने चाहिए जिनकी सम्प्राप्ति कठिन हो।
(d) उपरोक्त सभी

6.कालक्रम विधि का अर्थ है-
(a) काल और क्रम
(b) समय ही धन है
(c) समय की निरन्तरता
(d) क्रम के अनुसार समय

उत्तरमाला – 1. (c) 2. (b) 3. (a)  4. (d) 5. (d) 6. (c)



                             ◆◆◆ निवेदन ◆◆◆

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