शिक्षण अधिगम सामग्री के प्रकार | श्रव्य सामग्री, दृश्य सामग्री,श्रव्य-दृश्य सामग्री | types of TLM in hindi

शिक्षण अधिगम सामग्री के प्रकार | श्रव्य सामग्री, दृश्य सामग्री,श्रव्य-दृश्य सामग्री | types of TLM in hindi  – दोस्तों सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा में शिक्षण कौशल 10 अंक का पूछा जाता है। शिक्षण कौशल के अंतर्गत ही एक विषय शामिल है जिसका नाम शिक्षण अधिगम के सिद्धांत है। यह विषय बीटीसी बीएड में भी शामिल है। आज हम इसी विषय के समस्त टॉपिक को पढ़ेगे।  बीटीसी, बीएड,यूपीटेट, सुपरटेट की परीक्षाओं में इस टॉपिक से जरूर प्रश्न आता है।

अतः इसकी महत्ता को देखते हुए hindiamrit.com आपके लिए शिक्षण अधिगम सामग्री के प्रकार | श्रव्य सामग्री, दृश्य सामग्री,श्रव्य-दृश्य सामग्री | types of TLM in hindi  लेकर आया है।

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शिक्षण अधिगम सामग्री के प्रकार  | types of TLM in hindi

इन्द्रियों के प्रयोग के आधार पर शिक्षण सामग्री को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) श्रव्य साधन (Audio Aids),
(2) दृश्य साधन (Visual Aids),
(3) श्रव्य-दृश्य साधन (Audio-Visual Aids)

शिक्षण सामग्री के वर्गीकरण को अग्रलिखित रेखाचित्र द्वारा दर्शाया जा सकता है

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(1) श्रव्य-दृश्य साधन (Audio-Visual Aids)

श्रव्य-दृश्य सामग्री कैसी होनी चाहिए ? (Qualities of A. V. Aids ?)

(1) जो शिक्षण के उद्देश्य की प्राप्ति में सहायक हो ।
(2) सुन्दर एवं आकर्षक हो।
(3) कक्षा में सभी छात्र सरलता से देख सकें (न बहुत छोटी न बहुत बड़ी)।
(4) उपयोगी होनी चाहिए।
(5) छात्रों की उत्सुकता जाग्रत करने वाली हो ।
(6) एक में केवल एक विचार प्रदर्शित हो।

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श्रव्य-दृश्य सामग्री का कहाँ प्रयोग करें ? (Where to Use A.V. Aids?)

(1) जब वस्तु इतनी बड़ी हो कि कक्षा में न ला सकें, जैसे—हाथी।
(2) जब वस्तु इतनी छोटी हो कि कक्षा में आसानी से न देख सकें, जैसे-एटम ।
(3) जो वस्तु सरलता से उपलब्ध न हो, जैसे-पुराने सिक्के ।
(4) जब वस्तु तीव्रगामी हो; जैसे-जहाज ।
(5) जब वस्तु का निरन्तर विकास देखना हो, जैसे-मच्छर कैसे पैदा होते हैं?
(6) जब वस्तु की गति न दीखे, जैसे-विद्युत ।
(7) जब आन्तरिक क्रियाएँ बतानी हों, जैसे-मानव की पाचन क्रिया ।
(8) जब दूर की वस्तु का ज्ञान देना हो, जैसे विभिन्न देशों के कपड़े, परम्पराएँ आदि।

श्रव्य-दृश्य सामगी को कब और कैसे प्रयोग किया जाए ?

श्रव्य-दृश्य सामग्री का कब और कहाँ प्रयोग किया जाए इससे सम्बन्धित परामर्श नीचे प्रस्तुत

(1) श्रव्य-दृश्य सामग्री को प्रस्तावना’ में छात्रों की पाठ में रुचि जाग्रत करने में, ‘प्रस्तुतीकरण’ में सूक्ष्म तथ्यों, कठिन व जटिल कारकों, सिद्धान्तों तथा भावों को स्पष्ट करने में ‘पुनरावृत्ति’ में एवं पाठ के मूल्यांकन करने में प्रयोग करना चाहिए ।

(2) श्रव्य-दृश्य सामग्री का प्रयोग कक्षा में तभी करना चाहिए जब शिक्षक उसकी नितान्त आवश्यकता महसूस कर।

(3) यह सामग्री छात्रों के समक्ष इस ढंग से प्रस्तुत की जानी चाहिए जिससे छात्रों को इनमें प्रदर्शित विषय-वस्तु के अवलोकन तथा चिन्तन करने के लिए पर्याप्त समय तथा अवसर मिल सके।

(4) श्रव्य-दृश्य सामग्री उतनी ही देर छात्रों के समक्ष रखी जाए, जितनी देर उसके अवलोकन की आवश्यकता हो । यह सामग्री आवश्यकता से अधिक समय तक प्रदर्शित करते रहना समय का अपव्यय होता है।

(5) एक ही प्रकार की सामग्री सदैव उयोग करने की उपेक्षा शिक्षक को इसमें विविधता लानी चाहिए । कभी वह श्रव्य सामग्री उपयोग करता है, कभी दृश्य या कभी दोनों का मिश्रण तो कक्षा में रोचकता बढ़ जाती है।

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(6) श्रव्य-दृश्य सामग्री का प्रदर्शन कक्षा में उचित स्थान पर, उचित विधि से किया जाना चाहिए।

(7) शिक्षक को एक साथ एक कालांश में अनावश्यक रूप से आवश्यकता से अधिक सामग्री का प्रयोग नहीं करना चाहिए । श्रव्य दृश्य सामग्री का कक्षा में बाहुल्य महत्वपूर्ण नहीं है, महत्व है तो केवल उनके सही उपयोग का ।

उपर्युक्त निदुओं को ध्यान में रखते हुए कक्षा में शिक्षक द्वारा प्रयुक्त सहायक सामग्री अपना मनोवांछित ध्येय निश्चित रूप से प्राप्त करेगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है। शिक्षक को उन्हें शिक्षण के साध्य के रूप में नहीं वरन् साधन के रूप में ही प्रयोग करना चाहिए।



प्रकृति से प्राप्त शिक्षण सामग्री / प्राकृतिक शिक्षण अधिगम सामग्री / natural TLM

1. पत्तियाँ- विभिन्न प्रकार के पेड़-धों को बनावट व आकार भिन्न-भिन्न
होता है। विभिन्न प्रकार की पत्तिओं को सुगमता से प्राप्त किया जा सकता है। वनस्पति विज्ञान के शिक्षण में पत्तियों को ज्ञान प्रदान करने के लिए इनका प्रयोग अधिगम सामग्री के रूप में किया जा सकता है। छात्रों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से पत्तियों को देखकर उनके
अधिगम स्तर में वृद्धि होगी। छात्रों को विभिन्न प्रकार की पत्तियों को संग्रह के लिए भी प्रेरित किया जा सकता है। इस प्रकार उनकी विज्ञान विषय में रुचि जाग्रत होगी।

2. टहनियाँ- विभिन्न प्रकार की टहनियाँ सरलता से उपलब्ध हो जाती हैं। वनस्पति विज्ञान एवं कृषि विज्ञान में जब पौधों के भागों के बारे में वर्णन किया जाता है तो टहनिओं का वर्णन भी किया जाता है। छात्रों को विभिन्न प्रकार की टहनिओं को दिखाकर उनके अधिगम शिक्षण स्तर को उन्नत किया जा सकता है।

3. जड़ें– पौधों में जड़ें अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। जड़ों के द्वारा ही पौधों का विकास होता है। पौधों की जड़ को कक्षा में छात्रों को दिखाकर जड़ के कार्य एवं स्वरूप को समझाया जा सकता है। शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया में जड़ों को मूर्त रूप से दिखा सकते हैं, इससे छात्रों को विज्ञान के विषय में रूचि जाग्रत होगी। इस प्रकार प्रकृति द्वारा प्रदत्त वस्तुओं का सहायक शिक्षण सामग्री के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

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4. बीज-प्रकृति से प्राप्ते वस्तुओं में बीजों का स्थान अग्रणी है। बीजों के अंकुरण द्वारा ही हमें खाद्यान्न सामग्री प्राप्त होती है। छात्रों को कक्षा में बीजों के आकार-प्रकार, गुण एवं अंकुरण क्रिया का ज्ञान दिया जा सकता है। शिक्षक छात्रों के बतायें कि बीज का अंकुरण किस प्रकार होता है इसके लिए वह छात्रों को प्रयोगात्मक विधि से इसका प्रदर्शन करके बतायें। इससे छात्रों की जिज्ञासा शान्त हो जाएगी तथा
उनकी रुचि विज्ञान विषय में बढ़ेगी।

5. कंकड़– कंकड़ों के प्रयोग द्वारा प्राथमिक स्तर पर छात्रों को गिनती एवं पहाड़े सिखाने में किया जा सकता है। इसके छात्र जोड़, घटना सीख सकते हैं। शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में छात्र इसके द्वारा गिनती-पहाड़े, जोड़, घटाना आदि सुगमता से सीख जाते हैं।

6.सीकें– विभिन्न प्रकार की सीकों का प्रयोग भी छात्रों की शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को तीव्र करता है। माचिस की सीकों अथवा अन्य प्रकार की सीकों के द्वारा छात्र रेखा, त्रिभुज, आयत, चतुर्भुज तथा वर्ग आदि की संकल्पना कर अपने ज्ञान में वृद्धि कर सकता है। शिक्षण अधिगम का यह एक मनोरंजक साधन है, इसके द्वारा छात्र विभिन्न प्रकार की आकृति बनाना सीख जाते हैं।

7. मिट्टी- अधिगम की इस प्रक्रिया के अर्न्तगत छात्रों को विभिन्न प्रकार की मिट्टी के बारे में जानकारी दी जा सकती है। छात्रों के सम्मुख विभिन्न प्रकार की मिट्टी जैसे- दोमट मिट्टी, काली मिट्टी, रेता मिट्टी, लाल मिट्टी आदि के बारे में बताया जा सकता है तथा इन मिट्टियों से पैदा होने वाले खाद्यान्न के बारे में भी ज्ञान दिया जा सकता है। छात्रों के समक्ष विभिन्न प्रकार की मिट्टियों के नमूने देकर उनके रूप-रंग तथा गुण के बारे में बताया जा सकता है। इसके अधिगम प्रक्रिया रुचिकर हो जाएगी।

8. पत्थर- पुरातत्व विज्ञान तथा भूगोल विषय की अधिगम प्रक्रिया के अर्न्तगत पत्थरों का ज्ञान अति आवश्यक है। विभिन्न प्रकार की चट्टानों के टुकड़े तथा उनका वर्गीकरण कराकर छात्रों के ज्ञान में वृद्धि की जा सकती है। इसके द्वारा शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को सुबोध व सरल बनाया जा सकता है।



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