वैज्ञानिक संबोधों की प्रक्रियाएं एवं महत्व | CTET SCIENCE PEDAGOGY

दोस्तों अगर आप CTET परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो CTET में 50% प्रश्न तो सम्मिलित विषय के शिक्षणशास्त्र से ही पूछे जाते हैं। आज हमारी वेबसाइट hindiamrit.com आपके लिए विज्ञान विषय के शिक्षणशास्त्र से सम्बंधित प्रमुख टॉपिक की श्रृंखला लेकर आई है। हमारा आज का टॉपिक वैज्ञानिक संबोधों की प्रक्रियाएं एवं महत्व | CTET SCIENCE PEDAGOGY है।

वैज्ञानिक संबोधों की प्रक्रियाएं एवं महत्व | CTET SCIENCE PEDAGOGY

वैज्ञानिक संबोधों की प्रक्रियाएं एवं महत्व | CTET SCIENCE PEDAGOGY
वैज्ञानिक संबोधों की प्रक्रियाएं एवं महत्व | CTET SCIENCE PEDAGOGY

CTET SCIENCE PEDAGOGY | वैज्ञानिक संबोधों की प्रक्रियाएं एवं महत्व

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प्रत्येक बालक का विकास एवं उसके ज्ञान प्राप्त करने का तरीका दूसरे बालक से भिन्न होता है। प्रत्येक विद्यार्थी के सोचने का ढंग, अभिवृत्ति, व्यक्तित्व आदि अन्य- विद्यार्थियों से भिन्न होता है । विज्ञान का ज्ञान, ज्ञान का भण्डार है। इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए विशेष प्रकार की विधि एवं ढंग होना आवश्यक है। विज्ञान के ज्ञान के लिए वैज्ञानिक प्रक्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण है । विज्ञान की प्रक्रियाओं के द्वारा ही विद्यार्थियों में सोचने का ढंग, दृष्टिकोण, विकसित हृदय एवं किसी समस्या के समाधान का तरीका उत्पन्न होता है।

विज्ञान द्वारा मनुष्य के आर्थिक, सामाजिक, संस्कृति एवं राजनैतिक पहलू प्रभावित हुए हैं। वर्तमान युग विज्ञान का युग है। वैज्ञानिक युग में समायोजन के लिए विज्ञान का होना अति आवश्यक है। प्रत्येक विद्यार्थी को विश्व में होने वाली घटनाओं, वातावरण में उत्पन्न होने वाली समस्याओं में उनका निराकरण हेतु विज्ञान की जानकारी होना आवश्यक है। विज्ञान की प्रकृति समझने हेतु निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है-

1. मापन का ज्ञान – प्रकृति में प्रतिदिन अनेकों घटनाएँ होती हैं। इन घटनाओं की जानकारी होना अत्यन्त आवश्यक है । विज्ञान के क्षेत्र में यह जानकारी गणित के ज्ञान के बिना असम्भव है। गणित का ज्ञान होने पर ही उसका उपयोग विज्ञान में किया जा सकता है ।

2. प्रकृति पर नियन्त्रण – मनुष्य आदिकाल से ही प्रकृति पर विजय प्राप्त करने के प्रयास करता चला आ रहा है। उसके लिए वह विभिन्न उपाय सोचता है, उसके लिए साधन जुटाता है और उसको अपने पक्ष में करने के लिए उपाय करता है।

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3. ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्रकृति का निरीक्षण – प्रकृति का सही निरीक्षण करने के लिए सही ज्ञान का होना आवश्यक है । इसको हम ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त कर सकते हैं । ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान विश्वसनीय होता है। किसी भी प्राकृतिक घटना के प्रभाव का निरीक्षण हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा कर सकते हैं।

4. सिद्धान्तों एवं नियमों की स्थापना-प्रकृति में होने वाली घटनाओं का अपना एक विशेष महत्त्व होता है। कुछ घटनाओं में समानता भी होती है। प्रकृति में होने वाली सभी घटनाओं के पीछे कोई न कोई नियम एवं सिद्धान्त अवश्य होते हैं जिनके आधार पर ये घटनाएँ होती हैं।

5. सजीव एवं निर्जीव का अध्ययन-प्रकृति में बहुत से सजीव एवं निर्जीव, जीव-जन्तु एवं पेड़-पौधो पाये जाते हैं। इन सभी का सम्बन्ध मानव जीवन से है। इनके अध्ययन के लिए विज्ञान के अन्तर्गत वर्गीकरण किया गया है। इस वर्गीकरण के आधार पर अध्ययन करने में सरलता होती है। वस्तुओं की स्थिति को आसानी से समझा जा सकता है।

6. विज्ञान की पद्धतियाँ एवं उपागम – विज्ञान शिक्षण के लिए विभिन्न विधियों एवं प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है। विज्ञान पाठन के लिए प्रयुक्त पद्धतियाँ एवं उपागम अन्य विषयों से भिन्न होते हैं। इनके द्वारा वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करने में सहायता मिलती है। अतः प्रारम्भ से ही इनका ज्ञान होना आवश्यक है।

7. वैज्ञानिक अनुसन्धान में परिकल्पना–वैज्ञानिक अनुसन्धान किसी न किसी उद्देश्य को लेकर किये जाते हैं। अनुसन्धान प्रारम्भ करने से पहले हम कुछ परिकल्पनाएँ करते हैं। ये परिकल्पनाएँ ही हमें अनुसन्धान का रास्ता बताती है जिसके सहारे हम अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं। परिकल्पनाएँ दिशा-निर्देशन का कार्य करती हैं।

वैज्ञानिक सम्बन्धों का महत्त्व

आधुनिक शिक्षा में विज्ञान शिक्षण का अत्यधिक महत्त्व है । पुरानी मान्यताएँ धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं। विज्ञान के महत्त्व को समझने वाले राष्ट्रों की गिनती आज विकसित देशों में होने लगी है। विज्ञान की शिक्षा की आज अत्यावश्यकता है।

1. आर्थिक विकास – किसी भी राष्ट्र की आर्थिक स्थिति उसके विकास का आधार होता है। अन्य देशों की आर्थिक स्थिति की तुलना में अभी अपना देश काफी पीछे है। अनेकों पंचवर्षीय योजनाओं एवं अन्य योजनाओं के लागू होने के पश्चात् भी प्रति व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में अधिक परिवर्तन नहीं हो पाये हैं। इसका एक मात्र कारण हमारी वैज्ञानिक शिक्षा है। विज्ञान का आर्थिक स्थिति पर प्रभाव के बारे में अध्ययन करना अनिवार्य हो गया है। आर्थिक स्तर पर सुधार हेतु विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में विज्ञान शिक्षा का समावेश होना चाहिए।

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2. व्यक्तियों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण – आज के विज्ञान के युग में विज्ञान ने पुरानी परम्पराओं एवं मान्यताओं को बदल दिया है। रूढ़िवादिता धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। हमारा परिवेश धीरे-धीरे बदल रहा है। पुरानी विचारधाराएँ, अन्धविश्वास,गरीबी, भुखमरी, प्राकृतिक आपदाओं से बचाव हेतु व्यक्ति का दृष्टिकोण बदलना होगा। यह तभी सम्भव है जबकि व्यक्ति का दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो तथा विद्यालयी पाठ्यक्रमों में विज्ञान शिक्षण का समावेश हो । किसी घटना के होने के कारणों के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त करना ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।

3. कृषि में विज्ञान का समावेश – कृषि के क्षेत्र में आने वाले विभिन्न प्रकरणों का ज्ञान प्रदान करने हेतु वैज्ञानिक तकनीकी का ज्ञान का उपयोग किया जाता है । जैसे—जुताई, बुवाई, कटाई, भूमि की नमी, आर्द्रता, निराई, कीटनाशक छिड़काव मशीन आदि विज्ञान तकनीकी ज्ञान की देन है। कृषि का आधार अब परम्परागत न होकर विज्ञान पर आधारित है। आज कृषि में उपकरणों का प्रयोग, वैज्ञानिक खाद, बीज आदि के प्रयोग से कृषि की उन्नति सम्भव हुई है। अतः विज्ञान का शिक्षा में समावेश होना आवश्यक है।

4. समाज, व्यक्ति और विज्ञान – समाज और व्यक्ति एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। समाज का निर्माण व्यक्तियों से ही होता है। दोनों ही शिक्षा के पहलू हैं। जिस प्रकार समाज के दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर वैज्ञानिक शिक्षा की व्यवस्था की जाती है उसी प्रकार व्यक्ति के दृष्टिकोण को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी बुद्धि, रुचि, योग्यता, अभिव्यक्ति भिन्न होती है। साथ ही विज्ञान की भिन्न-भिन शाखाएँ भी व्यक्ति के विकास में विभिन्न तरीकों से सहायक होती हैं । अतः संसार में सफलतापूर्वक जीवन व्यतीत करने के लिए विज्ञान का सही रूप में ज्ञान होना आवश्यक है।

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5. विज्ञान की देन (विज्ञान शिक्षण एक व्यापक सन्दर्भ में) – विज्ञान चिन्तन की एक प्रविधि है, नवीन ज्ञान अर्जित करने का एक साधन है तथा प्राकृतिक संसार के बोध का एक माध्यम है। व्यक्ति एवं समाज का प्रत्येक पक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से प्रभावित है इसलिए वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी साक्षरता अनिवार्य है । जेम्स रदरफोर्ड ने प्रोजेक्ट में विज्ञान शिक्षण में सुधार की दीर्घकालीन योजना का सुझाव प्रस्तुत किया है। इस सुधार योजना को नेशनल साइन्स एजूकेशन स्टेण्डर्स (1996) द्वारा पुनर्बलन मिला है। इसलिए विज्ञान शिक्षण को एक व्यापक सन्दर्भ में समझना चाहिए।

नई-नई खोजों के आधार पर विज्ञान दिन प्रतिदिन प्रकृति पर नियन्त्रण करता चला आ रहा है। विज्ञान के ज्ञान का भण्डार असीमित है। विज्ञान के विकास के साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति के ज्ञान में वृद्धि हुई है। नवीन पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं का विकास हुआ है। अतः आवश्यक है कि विद्यार्थियों को विज्ञान की नवीन खोजों से समय-समय पर विद्यार्थियों को भी अवगत कराया जाए। विद्यार्थियों की आयु, बुद्धि, रुचि तथा उनके स्तर के अनुसार उनके पाठ्यक्रम में विज्ञान शिक्षा को आवश्यक रूप से स्थान दिया जाए जिससे वे समाज में प्रवेश कर समाज का एवं अपना स्वयं का विकास कर सके ।


बहुविकल्पीय प्रश्न

1. विज्ञान की प्रकृति प्रकृति को समझने हेतु आवश्यक है-
(अ) मापन का ज्ञान
(ब) सिद्धान्तों एवं नियमों की स्थापना
(स) विज्ञान की पद्धतियाँ एवं उपागम
(द) ये सभी ।

2. विज्ञान की देन है
(अ) चिन्तन की एक प्रविधि
(ब) नवीन ज्ञान अर्जित करने का साधन
(स) प्राकृतिक बोध का एक माध्यम
(द) ये सभी ।

3. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ है—
(अ) केवल पुरानी परम्पराओं को बदलना
(ब) केवल पुरानी मान्यताओं को बदलना
(स) पुरानी परम्पराओं एवं मान्यताओं को बदलना
(द) इनमें से कोई नहीं।

उत्तर-1. (द), 2. (द), 3. (स)।

                             ◆◆◆ निवेदन ◆◆◆

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