वाक्य लेखन के गुण / वाक्य में कौन कौन गुण होते हैं

बीटीसी एवं सुपरटेट की परीक्षा में शामिल शिक्षण कौशल के विषय आरंभिक स्तर पर भाषा का पठन लेख एवं गणितीय क्षमता का विकास में सम्मिलित चैप्टर वाक्य लेखन के गुण / वाक्य में कौन कौन गुण होते हैं आज हमारी वेबसाइट hindiamrit.com का टॉपिक हैं।

वाक्य लेखन के गुण / वाक्य में कौन कौन गुण होते हैं

वाक्य लेखन के गुण / वाक्य में कौन कौन गुण होते हैं
वाक्य लेखन के गुण / वाक्य में कौन कौन गुण होते हैं


उत्कृष्ट वाक्य लेखन के गुण / वाक्य में कौन कौन गुण होते हैं

एक वाक्य लेखन में कौन-कौन से गुण होने चाहिये, इस विषय में वैयाकरण एकमत नहीं है। किन्तु अधिकतर वैयाकरण यह मानते हैं कि सार्थकता, शक्यता, पदक्रम और अन्वय वाक्य के अत्यावश्यक गुण हैं। इन गुणों को विस्तारपूर्वक निम्नलिखित प्रकार देखा जा सकता है-

1.सार्थकता

वाक्य का कुछ न कुछ अर्थ होना चाहिये। कोई वाक्य केवल शब्द-समूह नहीं होता। उसमें शब्द-क्रम होता है, संगति होती है, तारतम्य होता है। मान लीजिये कोई कहता है-‘ने लिया चूहे पकड़ को बिल्ली। तो इसका कोई अर्थ न निकलेगा और यदि यह कहे कि ‘बिल्ली ने चूहे को पकड़ लिया। तो अर्थ बिल्कुल स्पष्ट हो जायेगा। वाक्य ऐसा होना चाहिये कि पढ़ते ही पाठक को समझ में आ जाये। कुछ लोग और कुछ लेखक ऐसे वाचा लिखते हैं जो पाठक को अटपटे दिखायी देते हैं। ऐसे वाक्यों में या तो कोई व्याकरणिक गलती होती है या किसी अनुपयुक्त शब्द का प्रयोग होता है।

उदाहरण के लिये, अगर खुदा मुझसे अभी तक नाराज है, अभी तक नापाक हूँ तभी ऐसा होगा कि मेरी वजह से किसी से बेजा काम हो सके। कुछ लोग ऐसे जटिल और बोझिल वाक्य लिखते हैं जिनका अर्थ समझना कठिन होता है। उनकी अस्पष्टता या तो दुरूह शब्दों के कारण होती है या उलझी हुई संरचना के कारण। ऐसी स्थिति अधिकतर लम्बे-लम्बे वाक्यों में आती है; जैसे-“जो कुछ उन्होंने देखा और जाना है उसको प्रकाशित करने के लिये प्रतिदिन के व्यवहार की भाषा में कोई शब्द नहीं है और कम से कम क्या वे तर्क या न्याय की विचार-श्रृंखला के साधनों अथवा वाक्यांशों से अपने विचारों के पर्याप्त प्रदर्शन की आशा रखते हैं?”

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इस प्रकार के अटपटे, बोझिल और जटिल वाक्यों की विभेदक रेखाएँ बहुत क्षीण होती हैं। इससे बचने के लिये यथासाध्य छोटे-छोटे वाक्य लिखने चाहिये। वाक्य यथासाध्य द्विअर्थी भी नहीं होने चाहिये; जैसे-‘इतना सोना तो जान ले लेगा।’ अब यहाँ स्पष्ट नहीं है कि सोना धातु है या सोना निद्रा है।

2. शक्यता

यदि कोई कहे कि उसने कुत्ते को हवा में उड़ते देखा था और वह अपने मुँह में एक मरी हुई गाय को लटकाये ले जा रहा था तो कोई इस बात पर विश्वास नहीं करेगा। हालांकि यह वाक्य व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है क्योंकि इसमें उद्देश्य और विधेय दोनों विद्यमान हैं और वाक्य का मतलब भी साफ समझ में आ रहा है परन्तु हम जानते हैं कि कोई कुत्ता हवाई नहीं उड़ सकता और न वह अपने मुँह में गायक को पकड़कर लटका सकता है। इस वाक्य में शक्यता की कमी है।

वाक्य में शक्यता की कमी नहीं होनी चाहिये, शक्ति की कमी के कारण वाक्य व्याकरण की दृष्टि से सही होते हुए भी अपना अर्थ खोने लगता है; जैसे-
(1) ‘तुम पाँच मिनट इन्तजार करो, मैं दो मिनट में आया।’
कोई किसी को बुलाये और यह कहे-
(2) एक घण्टे से कह रहा हूँ कि 1 मिनट में आ रहा हूँ।’
इन सब वाक्यों में मुख्यार्थ तो एक ही रहता है किन्तु सब में पदों का एक-सा जोर नहीं रहता। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि हम किसी वाक्य में मनमाने परिवर्तन करते चले जायें उससे अर्थ नहीं बदलेगा। कई बार ऐसे परिवर्तन से अर्थ का अनर्थ हो जाता है, कई बार अर्थ बदल जाता है और कई बार अर्थ निकलता ही नहीं, जैसे-‘गौ बहुत अच्छी मैंने ली।’

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3. अन्वय

अन्वय का अर्थ है मेल।’ वाक्य में उद्देश्य और क्रिया का मेल होना चाहिये, क्रिया और कर्म का मेल होना चाहिये। यदि कोई औरत जा रही है तो हम उससे पूछेगे, “क्या आप जा रही हैं?” और यदि जाने वाला पुरुष है तो हम पूछेगे,”क्या आप जा रहे हैं?” और यदि हम अपने से छोटे व्यक्ति अथवा घनिष्ठ मित्र से बता रहे हैं तो कहेंगे, “क्या तुम जा रहे हो?” इन सभी वाक्यों में अन्वय का गुण है। यदि हम यह कहें, “क्या आप जा रहे हो?” या “क्या तुम जा रहे हैं?” तो वाक्य व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध हैं इनमें अन्वय का अभाव है।

अन्वय वाक्य का अपेक्षित गुण है। एक वाक्य में उपर्युक्त गुण अपेक्षित हैं, इनमें से किसी एक गुण के अभाव में हम उसे वाक्य नहीं कह सकते और यदि इसको कह भी सकें तो वह सरल और बोधगम्य नहीं होगा इतना तय है। अत: वाक्य बोलते एवं लिखते समय इन सभी गुणों का ध्यान रखना चाहिये। यह भाषा सम्प्रेषण के लिये प्रभावी तथा सार्थक रहेगा।

4. पूर्णता

यदि हम कहें कि रमेश उदयपुर चला गया’ तो स्पष्ट है कि वक्ता को इस विषय में जो कुछ कहना था उसने कह दिया। सामान्य स्थिति में श्रोता को कोई आकांक्षा नहीं रह जाती कि पाठ इसके अतिरिक्त और क्या कहना चाहता है। अत: वाक्य स्वयं पूर्ण है। अब कोई मित्र हमसे आकर यह कहे कि ‘चलो’ और यदि पहले से कार्यक्रम निश्चित नहीं है तो श्रोता को यह जानने की इच्छा होगी कि कहाँ चलें और क्यों चलें?’ परन्तु इसको यूँ कहा जाये कि ‘चलो कॉलेज चलें’ तो हमें कोई आकांक्षा सामान्यत: और नहीं रह जाती। यह है वाक्य की पूर्णता। पूर्णता’ वाक्य का एक अपेक्षित गुण है।

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अब उपयुक्त वाक्य में कोई यह प्रश्न भी कर सकता है- कॉलेज किस रास्ते से चलना है? वहाँ कितनी देर ठहरना है? आदि-आदि। स्पष्ट है इस दृष्टि से पूर्णता’ की ठीक-ठीक परिभाषा नहीं दी जा सकती। यह कहना कठिन है कि विचार कहाँ पर पूर्ण हुआ अथवा दूसरा विचार कहाँ आरम्भ हुआ? व्यावहारिक दृष्टिकोण यह होगा किसी समय कोई लेखक या वक्ता जो कुछ कहना चाहता है। यदि वह पूरा का पूरा उसके कथन में समाहित हो जाये तो वाक्य पूर्ण समझा जाय अन्यथा नहीं।

5. पदक्रम

श्री कामताप्रसाद गुरु ने अपने ‘हिन्दी व्याकरण( के नियम 657 में लिखा है-“वाक्य के पहले कर्त्ता या उद्देश्य,फिर कर्म या पूर्ति और अन्त में क्रिया रखते हैं।” उदाहरण के लिये, मोहन चला गया। उसने एक दिन के लिये भिश्ती को राजा बना दिया। हिन्दी में वाक्यों के पदों का क्रम बिल्कुल निश्चित नहीं होगा। उनमें थोड़ा-बहुत परिवर्तन हो।सकता है। उपरोक्त दूसरे वाक्य को हम इन रूपों में भी लिख सकते हैं-
(1) उसने भिश्ती को एक दिन के लिये राजा बना दिया। (2) उसने भिश्ती को राजा बना दिया एक दिन के लिये। (3) एक दिन के लिये उसने भिश्ती को राजा बना दिया। (4) उसने एक दिन लिये राजा बना दिया भिश्ती को।

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