कवक की खोज,लक्षण,संरचना एवं महत्व / कवक जनित रोग

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कवक की खोज,लक्षण,संरचना एवं महत्व / कवक जनित रोग

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कवक Fungi

कवक प्रायः सर्वव्यापी होते हैं। इनमें पर्णहरिम का अभाव होता है। पहले इन्हें पादपों के रूप में वर्गीकृत किया गया था परन्तु व्हिटेकर (Whittaker; 1969) के वर्गीकरण के पाँच जगतों में से कवक (Fungi ) को पोषक पदार्थों को अवशोषित (Absorb) करने वाले परपोषियों का एक अलग जगत माना गया है। वनस्पति विज्ञान की वह शाखा, जिनके अन्तर्गत कवकों का अध्ययन किया जाता है, वह कवक विज्ञान (Mycology) कहलाती है।

कवकों के सामान्य लक्षण
General Characteristics of Fungi

कवकों के सामान्य लक्षण निम्नलिखित हैं
(i) कवक वे परपोषी जीव हैं, जिनमें पर्णहरिम नहीं पाया जाता है।
(ii) कवकों का शरीर शाखित एवं तन्तुमय होता है, इन तन्तुओं को कवक तन्तु (Fungi hyphae) कहते हैं कवक तन्तुओं की सघनता और विभिन्न प्रकार की शाखाओं के कारण बनी जालनुमा संरचना कवकजाल (Mycelium) कहलाती है।
(iii) कवक तन्तु सामान्यतया पटयुक्त अथवा पटरहित (Septate or Aseptate) तथा संकोशिकीय (Coenocytic) होता है।
(iv) कवक तन्तुओं की भित्ति कवक सेलुलोस (Fungal cellulose) द्वारा बनी होती है।
(v) ये सदैव परपोषी (Heterotrophic) एवं मृतोपजीवी (Saprophytes) अर्थात् मृत जीवों से भोजन ग्रहण करने वाले या परजीवी (Parasites) अर्थात् जीवित जीवों से भोजन ग्रहण करने वाले होते हैं और कभी-कभी सहजीवी (Symbiotics) होते हैं।
(vi) इनका मुख्य संचित खाद्य पदार्थ ग्लाइकोजन (Glycogen)
होता है।
(vii) कवकों में कायिक (Vegetative), अलैंगिक (Asexual) और लैंगिक (Sexual) विभिन्न प्रकार के जनन (Reproduction) पाए जाते हैं।

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कवकों का आर्थिक महत्त्व
Economic Importance of Fungi

कवकों की लाभदायक क्रियाएँ Useful Activities of Fungi

कवकों की लाभदायक क्रियाएँ निम्नलिखित है –

(i) खाद्य पदार्थों के रूप में (As Food) कुकुरमुत्ते (Mushrooms), गुच्छी (Morchella), लाइकोपरडॉन (Lycoperdon), आदि का उपयोग खाद्य-पदार्थों के रूप में किया जाता है।

(ii) उद्योगों में (In Industry) कवकों से अनेक प्रकार के कार्बनिक अम्ल; जैसे-साइट्रिक अम्ल, ऑक्जेलिक, लैक्टिक अम्ल, एन्जाइम, एल्कोहॉल,विटामिन, आदि रासायनिक पदार्थों का निर्माण किया जाता है। यीस्ट (Yeast; Saccharomyces) का उपयोग एल्कोहॉल के उत्पादन में किया जाता है। पेनिसिलियम (Penicillium) और एस्पर्जिलस ल (Aspergillus), आदि यीस्ट के अलावा पनीर बनाने के काम आते हैं। बैकिंग (Baking) उद्योग में यीस्ट अत्यन्त उपयोगी हैं। अनेक एन्जाइम्स और विटामिन्स का औद्योगिक निर्माण यीस्ट, राइजोपस, एस्पर्जिलस, पेनिसिलियम, आदि कवकों द्वारा किया जाता है। कवक ऑइडियम लैक्टिस (Odium lactis) का उपयोग प्लास्टिक उद्योग में किया जाता है। क्लैविसेप्स (Claviceps) नामक कवक से LSD (Lysergic Acid Diethylamide); जैसे-विभ्रमक पदार्थ बनाए जाते हैं।

(iii) औषधि निर्माण में (In Medicine Formation) कवकों से विभिन्न प्रकार की जीवन उपयोगी औषधियाँ प्राप्त होती हैं; जैसे-
औषधि                                कवक
पेनिसिलियम     पेनिसिलियम नोटेटम, पेनिसिलियम क्राइसोजिनम
इरगोट                      क्लेविसेप्स परप्यूरिया
क्लेविसिन              एस्पर्जिलस क्लेवेटस

(iv) मृदा की उर्वरता बनाए रखने में (In Maintenance of Soil Fertility) कवक जीवाणुओं के समान प्राकृतिक अपमार्जक (Scavangers) का कार्य करते हैं और मृदा की उर्वरता बढ़ाते हैं।
(v) पादप हॉर्मोन के निर्माण में (In Making Plant Hormone)
फ्यूजेरियम (Fusarium) कवक से जिबरेलिन नामक पादप हॉर्मोन तैयार किया जाता है।

कवकों की हानिकारक क्रियाएँ Harmful Activities of Fungi

इनकी हानिकारक क्रियाएँ निम्न हैं
(i) पादपों में रोग (Disease in Plants) गेहूँ का काला किट्ट रोग पक्सीनिया (Puccinia), आलू का अंगमारी रोग अल्टरनेरिया (Alternaria), क्रूसीफेरी का श्वेत फफोला रोग एल्ब्यूगो (Albugo) नामक कवक से होते हैं।

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कवकजनित रोग / कवक से होने वाले रोग Fungal Diseases

कवक मनुष्यों में दाद (Ringworm), खाज (Eczema), एथलीट फुट (Athlete foot), अस्थमा (Asthma), मुख एवं गले में छाले (Oral candidiasis), आदि रोगों के कारक होते हैं।  इन रोगों में दाद एवं एथलीट फूट मनुष्यों में होने वाले सबसे ज्यादा दिखने वाले रोग हैं।

दाद Ringworm

दाद एक कवकजनित संक्रामक रोग है। मुख्यतया त्वचा में होने वाला दाद रोग ट्राइकोफाइटॉन (Trichophyton) और माइक्रोस्पोरम (Microsporum) प्रजाति के कवकों द्वारा होता है।

लक्षण Symptoms

कवकों के बीजाणु (Spores) नम और क्षतिग्रस्त त्वचा में प्रवेश कर नीचे अंकुरित होकर तन्तुओं का जाल-सा बना लेते हैं, जिसके कारण त्वचा पर लाल रंग के गोल चकते बन जाते हैं। इनमें असहनीय खुजली होती है। लगातार खुजाने पर इसमें जलन होने लगती है।

रोकथाम Prevention
शरीर को स्वच्छ रखना चाहिए। संक्रमित व्यक्तियों और उनके द्वारा उपयोग में लाई गई वस्तुओं के सम्पर्क से बचना चाहिए।

उपचार Treatment

चिकित्सक की सलाह से एण्टीबायोटिक औषधि लेनी चाहिए। संक्रमित स्थान पर कवकनाशी मरहम लगाना चाहिए।

(ii) मनुष्य में रोग (Disease in Man) मनुष्य में दाद (Ringworm) ट्राइकोफाइटॉन (Trychophyton) और माइक्रोस्पोरम कैनिस (Microsporum canis) नामक कवक द्वारा होता है। माइकोसिस (Mycosis), एस्पर्जिलोसिस (Aspergillosis), आदि त्वचा के रोग कवकों द्वारा होते हैं।

(iii) पशुओं में रोग (Disease in Animals) विभिन्न पशुओं में त्वचा एवं श्लैष्मिका, आदि से सम्बन्धित रोग कवकों द्वारा होते हैं।

(iv) विभिन्न महत्त्वपूर्ण पदार्थों को नष्ट करने में (In Destruction of Various Important Materials) अनेक मृतोपजीवी कवक जीवन के लिए आवश्यक एवं आर्थिक महत्त्व की वस्तुओं को नष्ट कर देते हैं। इनके कुछ प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं –

खाद्य-पदार्थों का विनाश यीस्ट, म्यूकर, राइजोपस, एस्पर्जिलस, पेनिसिलियम, आदि की विभिन्न जातियाँ खाद्य-पदार्थों में उगकर उन्हें खाने के अयोग्य बना देती हैं। आचार, मुरब्बा, माँस, रोटी, फल, दही, सब्जियाँ, आदि विभिन्न कवकों द्वारा सड़ा दिए जाते हैं।

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दैनिक उपयोग की वस्तुओं का विनाश म्यूकर (Mucor), ट्राइकोडर्मा (Trichoderma), अल्टरनेरिया (Alternaria), आदि की जातियाँ कपड़ा और उनसे निर्मित वस्तुओं को नष्ट करती हैं। टोरूला (Torula), फ्यूजैरियम (Fusarium), एस्पर्जिलस (Aspergillus), आदि की जातियाँ कागज और उससे निर्मित वस्तुओं को नष्ट कर देती हैं, जबकि पेनिसिलियम और एस्पर्जिलस की कुछ अन्य जातियाँ चमड़े और रबड़ से निर्मित वस्तुओं को नष्ट कर देती हैं। टिम्बर एवं अन्य लकड़ी का विनाश पॉलीपोरस (Polyporus),आर्मिलेरिया (Armillaria), लैण्टिनस, आदि कवक, लकड़ी और उनसे निर्मित वस्तुओं पर उगकर उनका अपक्षय कर देती हैं।

(v) विषाक्त कवक (Poisonous Fungi) कुकुरमुत्तों की कुछ जातियाँ; जैसे- एमैनिटा फैलोइड्स (Amanita phalloides) विषैली होती हैं, जिन्हें खाने से व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। इसी प्रकार राई में परजीवी के रूप में क्लैविसेप्स परप्यूरिया (Claviceps purpurea) पाया जाता है, जो खाने पर पेट की पेशियों में ऐंठन पैदा करता है।

नोट –  पी एन्टोनियो मिचेली (P Antonio Micheli) को ‘कवक विज्ञान का जनक (Father of Mycology)’ कहा जाता है। ईजे बटलर (EJ Butler; 1920) को ‘भारतीय कवक विज्ञान एवं पादप रोग विज्ञान का जनक (Father of Indian Mycology and Plant Pathology) कहा जाता है।


                             ◆◆◆ निवेदन ◆◆◆

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