लेखन में कठिनाइयाँ एवं उपाय / लेखन कौशल की कठिनाइयों का निराकरण

बीटीसी एवं सुपरटेट की परीक्षा में शामिल शिक्षण कौशल के विषय आरंभिक स्तर पर भाषा का पठन लेख एवं गणितीय क्षमता का विकास में सम्मिलित चैप्टर लेखन में कठिनाइयाँ एवं उपाय / लेखन कौशल की कठिनाइयों का निराकरण आज हमारी वेबसाइट hindiamrit.com का टॉपिक हैं।

लेखन में कठिनाइयाँ एवं उपाय / लेखन कौशल की कठिनाइयों का निराकरण

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लेखन कौशल में कठिनाइयाँ

छात्रों में लेखन कौशल विकसित करने में निम्नलिखित कठिनाइयों तथा समस्याओं का सामना करना पड़ता है –
(1) प्रथमत: छात्रों को लिखते समय कलम कैसे पकड़ी जाय, यह भी नहीं आता?

(2) लिखते समय बैठने का सही ढंग क्या है ? छात्र इसे नहीं जानते। सामान्यतः छात्र गलत ढंग से बैठते हैं, इसका दुष्प्रभाव उनकी लेखनी पर पड़ता है, वह आड़ी,तिरछी एवं टेढ़ी हो जाती है।

(3) असुन्दर लेखन का एक कारण अभ्यास का अभाव है। इसके लिये कदाचित् अध्यापक भी उत्तरदायी है।
उपरोक्त के अतिरिक्त कुछ अन्य कारण भी हैं, जो लेखन को प्रभावित करते हैं-

1.शिरोरेखा की उपेक्षा-देवनागरी लिपि में सभी वर्गों के ऊपर शिरोरेखा लगायी जाती है किन्तु छात्र को प्रमोदवश शिरोरेखा विहीन वर्ण लिखने की आदत पड़ जाती है, जो सुन्दर लेखन की दृष्टि से अनुचित है।

2.शब्दों के बीच स्थान का अभाव- वाक्यों एवं शब्दों के बीच उचित दूरी छोड़नी चाहिये। लेकिन कुछ छात्र ऐसा नहीं करते, परिणामतः लेखन असुन्दर हो जाता है।

3. अक्षरों का विकृत आकार-कुछ छात्र अक्षरों को टेढ़े-मेढ़े या छोटे-बड़े बनाते हैं और सीधी पंक्ति में नहीं लिखते। इस कारण भी लेखन विकृत हो जाता है।

4. विराम-चिह्नों से सम्बन्धित श्रुटियाँ-विराम-चिह्नों से सम्बन्धित अनेक त्रुटियाँ बालक करते हैं। इसका कारण यह है कि विराम-चिह्नों का सही-सही ज्ञान न होना, जैसे- ‘क्या तमाशा हो रहा है और क्या तमाशा हो रहा है ? ‘ एक ही वाक्य है, लेकिन विराम-चिह्न ने इनका अर्थ बदल दिया है।

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5. अनुनासिक और अनुस्वार सम्बन्धी त्रुटियाँ-बहुत बार बालक अनुनासिक और अनुस्वार को एक-दूसरे की जगह अज्ञानवश प्रयोग कर देते हैं। अत: उन्हें इन दोनों के भेद को भली प्रकार समझ लेना चाहिये।
अननासिक-अनुनासिक स्वर केवल एक है-हैं। इसकी मात्रा है। अनुनासिक स्वर ‘ऋ’ और हस्वाध अ’ को छोड़कर सभी स्वरों के साथ लग जाता है और प्राय: सभी व्यंजनों के साथ लग जाता है, इसी प्रकार से अनुनासिक व्यंजन पाँच हैं-ङ,ज,ण,न,म। प्रत्येक वर्ग का अन्तिम व्यंजन एक अनुनासिक व्यंजन है, जो साधारणत: शेष चारों के साथ प्रयुक्त होता है। अ नासिक व्यंजन को (.) बिन्दी के रूप में भी लिखा जाता है।

अनुस्वार-सामान्यतः स्वर का उच्चारण स्वतन्त्र रूप से होता है और व्यंजन किसी स्वर के सहारे बोलता है। इसीलिये व्यंजन स्वर के पहले आता है। नागरी-लिपि के समस्त व्यंजन क, ‘ख’, ‘ग’ स्वरयुक्त हैं। वास्तव में-क = कु+अ। किन्तु स्वर की स्थिति निराली है। इसमें स्वतन्त्र गति नहीं है। अत: यह स्वर नहीं है और यह सदैव स्वर के बाद आता है।
अतएव व्यंजन भी नहीं है। इस प्रकार यह स्वर और व्यंजन के बीच का तत्त्व है। ‘अंग’ का विश्लेषण इस प्रकार होगा-अ+ + ग अर्थात् स्वर – अनुस्वार + व्यंजन। अनुस्वार’का अर्थ ही है ‘स्वर के पीछे आने वाला’। यह सामान्यतः अन्तस्थ और ऊष्म व्यंजनों में अनुनासिकता लाने के लिये प्रयुक्त होता है; जैसे-वंश, हंस। यहाँ बिंदी के बदले न का प्रयोग गलत होगा।

2.स्वभावगत कारण –वर्तनी एवं लेखन में भी अशुद्धियाँ स्वभावगत कारणों से भी होती है। कुछ व्यक्तियों,जिसमे  में अध्यापक एवं विद्यार्थी भी सम्मिलित है, का स्वभाव भाषा के प्रति उदासीन और उपेक्षा का हो जाता है। उनको बार-बार अशुद्धियों का ध्यान दिलाया जाता है तो भी उनको गम्भीरता से नहीं लेते। वशुद्धलेखन के महत्त्व को नहीं समझते।

3.स्थानीय भाषा या बोली का प्रभाव-बोली के प्रभाव के कारण भी वर्तनी लेखन में अशुद्धि होती है। स्थानीय भाषा या बोली का प्रभाव मानक भाषा के उच्चारण पर पड़ता है। उच्चारण का यह प्रभाव लेखन पर भी बहुत प्रभाव डालता है। हिन्दी के सम्बन्ध में तो यह बात और भी सार्थक होती है क्योंकि देवनागरी लिपि की यह विशेषता है कि उसमें जो बोला जाता है, वही लिखा जाता है; जैसे-राजस्थान के जिन भागों में स-श-ष की ध्वनि का अभेद है, वहाँ विद्यार्थी ‘शंकर’ को ‘संकर’ लिख देते हैं।

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4. लिपिगत कारण-लिपि की जटिलता वर्तनी की अशुद्धि का महत्त्वपूर्ण कारण है। हिन्दी भाषा की देवनागरी लिपि की कुछ जटिलताएँ हैं, जिनके कारण विद्यार्थी लेखन में त्रुटियाँ करते हैं, जैसे-ब-च, प-ष, फ-क्, भ-म तथा घ-ध आदि ऐसे वर्ण हैं, जिनके सूक्ष्म भेदों को समझने में कठिनाई होती है। इसी प्रकार से पंचम् अक्षर के विकल्प में (‘) का अनुस्वार लिखा जाता है, उस पंचम् वर्ण को भी पहचानने में कठिनाई होती है। ‘रु’ तथा ‘रू’ में भी बालकों को परेशानी आती है। इसी प्रकार से अनुस्वार (‘) तथा अनुनासिक (*) में भी बालक भेद नहीं कर पाते। इसी प्रकार का सूक्ष्म भेद ड-ड-ड़ तथा ढ-ढ़ में है। ये कतिपय लिपिगत जटिलताएँ हैं, जिनके कारण बालक लेखन में त्रुटियाँ करते हैं।

5. व्याकरणिक कारण-व्याकरणिक कारणों की वजह से भी वर्तनी एवं लेखन की अशुद्धियाँ होती हैं। व्याकरण के अधूरे ज्ञान के कारण सन्धि, वचन, लिंग तथा कारक आदि से सम्बन्धित अनेक अशुद्धियाँ होती हैं; जैसे-नदिया को नदीया, हिन्दुओं को हिन्दूओं तथा रुपये को रूपये लिखना आदि।

6. शैक्षिक कारण-उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त लेखन की त्रुटियों के शैक्षिक कारण भी हैं। लिपि का अधूरा ज्ञान होना, अभ्यास की कमी होना, लेखन सामग्री का उत्तम न होना, लेखन सिखाने को दोषपूर्ण विधि एवं अध्यापकों की त्रुटियों के प्रति उदासीनता आदि शैक्षिक कारण हैं, जिन पर यदि ध्यान दिया जाये तो लेखन सम्बन्धी त्रुटियों को पर्याप्त कम किया जा सकता है।

7. त्रुटिपूर्ण उच्चारण-हिन्दी भाषा में जैसा बोलते हैं, वैसा ही लिखते हैं। अधिकांशत: बालक त्रुटिपूर्ण उच्चारण करते हैं इसीलिये त्रिटिपूर्ण लिखते भी हैं।

8. अनुलिपि, प्रतिलिपि एवं श्रुतलेख के अभ्यास का अभाव-आजकल कक्षाओं में अनुलिपि, प्रतिलिपि तथा श्रुतलेख का अभ्यास नहीं कराया जाता, न तो छान स्वयं अभ्यास करते हैं और न इस ओर अध्यापक ध्यान देते हैं। इस कारण छात्रों को सुन्दर लेखन की आदत नहीं बन पाती। इससे उनके लेखन की गति भी प्रभावित होती है।

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लेखन कौशल की कठिनाइयों का निराकरण

लेखन कौशल को विकसित करने में अनुभूत समस्याओं का निम्नलिखित प्रकार से निराकरण किया जा सकता है-
(1) छात्रों को उचित ढंग से बैठना और सही ढंग से कलम पकड़ना सिखाया जाय।

(2) छात्रों को सुलेख का अभ्यास कराया जाय। उन्हें अक्षरों और शब्दों के बीच उचित दूरी छोड़ते हुए सुन्दर एवं सुडौल अक्षर बनाने का अभ्यास कराया जाय।

(3) छात्रों को लिपि, स्वर तथा मात्रा आदि का समुचित ज्ञान कराया जाय। विशेषतः अत्यधिक ध्वनि साम्य वाले वर्णों (स, श, ष, ज, झ, द्य एवं घ आदि) पर अधिक ध्यान दिया जाय।

(4) छात्रों को मात्रा का उचित प्रयोग नहीं आता। इसलिये वे मात्रा को मिलाने में गलती करते हैं; जैसे-वे गुरु का गुरू और रूप को रुप लिखते हैं। अत: छात्रों को ऐसी मात्राओं के सही प्रयोग का अभ्यास कराया जाय।

(5) छात्रों को ध्वनियों के शुद्धोच्चारण का समुचित ज्ञान कराया जाय तथा उनके लिखने का अभ्यास कराया जाय। विशेष रूप से संयुक्ताक्षरों (ग्रह, गृह तथा कार्य आदि) का ज्ञान कराया जाय।

(6) छात्र अनुस्वर, अनुनासिक तथा विसर्ग के प्रयोग में त्रुटि करते हैं। अत: छात्रों को इनके प्रयोग का समुचित ज्ञान कराया जाय।

(7) प्रतिलिपि और श्रुतिलेख का अधिक से अधिक अभ्यास कराया जाय तथा छात्रों के समक्ष ही उनकी जाँच एवं संशोधन किया जाय। छात्रों द्वारा की गयी स्वर, मात्रा, लिपि, विराम चिह्न एवं संयुक्ताक्षर सम्बन्धी त्रुटियों का तत्काल निराकरण किया जाय तथा संशोधन के लिये गृह-कार्य दिया जाय।

छात्रों को विराम-चिह्नों से परिचित कराया जाय ताकि उनके परिचित प्रयोग का अभ्यास कराया जाय । उपरोक्त क्रियाओं का अनुपालन कर भाषा-शिक्षण में लेखन कौशल को विकसित करने में आने वाली समस्याओं का निराकरण किया जा सकता है।

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