विशिष्ट ऊष्मा एवं गुप्त ऊष्मा / कैलोरीमिति का सिद्धांत

दोस्तों विज्ञान की श्रृंखला में आज हमारी वेबसाइट hindiamrit.com का टॉपिक विशिष्ट ऊष्मा एवं गुप्त ऊष्मा / कैलोरीमिति का सिद्धांत है। हम आशा करते हैं कि इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आपकी इस टॉपिक से जुड़ी सभी समस्याएं खत्म हो जाएगी ।

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विशिष्ट ऊष्मा एवं गुप्त ऊष्मा / कैलोरीमिति का सिद्धांत

विशिष्ट ऊष्मा एवं गुप्त ऊष्मा / कैलोरीमिति का सिद्धांत
विशिष्ट ऊष्मा एवं गुप्त ऊष्मा / कैलोरीमिति का सिद्धांत

कैलोरीमिति का सिद्धांत / विशिष्ट ऊष्मा एवं गुप्त ऊष्मा

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ऊष्मीय ऊर्जा Thermal Energy

ऊष्मा, ऊर्जा का एक प्रारूप है। ऊर्जा का वह कारक, जिसके कारण किसी वस्तु के ठण्डे अथवा गर्म होने का आभास होता है, ऊष्मीय ऊर्जा कहलाता है। पदार्थ के आणविक सिद्धान्त के अनुसार, प्रत्येक पदार्थ अणुओं से मिलकर बना है। ये अणु लगातार सभी सम्भव दिशाओं में सभी सम्भव वेगों से स्वैच्छिक रूप से गति करते रहते हैं। इस गति के कारण इनमें गतिज ऊर्जा होती है। अणुओं की इस अनियमित गति के कारण वस्तु की ऊर्जा को ऊष्मीय ऊर्जा कहते हैं। अतः वस्तु में अणुओं की गतिज ऊर्जा ही ऊष्मीय ऊर्जा की माप है।

ऊष्मीय ऊर्जा के मात्रक Units of Thermal Energy

ऊष्मीय ऊर्जा के मापन के लिए निम्नलिखित तीन मात्रकों का उपयोग करते हैं

1. कैलोरी Calorie

एक ग्राम जल का ताप एक डिग्री सेल्सियस बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा ही एक कैलोरी कहलाती है। यह ऊष्मीय ऊर्जा का CGS पद्धति में मात्रक है। अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति में, एक ग्राम जल का ताप 14.5°C से 15.5°C तक बढ़ाने के लिए जितनी ऊष्मा की आवश्यकता होती है, उसे 1 कैलोरी कहते हैं। इसे ‘अन्तर्राष्ट्रीय कैलोरी’ अथवा ’15°C कैलोरी’ भी कहते हैं।

2. किलो-कैलोरी Kilo-calorie

1 किलोग्राम जल का ताप 14.5°C से 15.5°C तक बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा 1 किलो-कैलोरी कहलाती है।
1 किलो-कैलोरी = 1000 कैलोरी
यह MKS पद्धति का मात्रक है।

3. जूल Joule

SI पद्धति में ऊष्मीय ऊर्जा का मात्रक जूल (Joule) होता है। इसे J द्वारा व्यक्त करते हैं। जूल तथा कैलोरी में निम्न सम्बन्ध है
1 कैलोरी = 4.18 जूल = 4.2 जूल
1 किलो-कैलोरी = 4.186×10^3 जूल = 4.2x 10^3 जूल

ऊष्मा देने पर किसी वस्तु की ताप-वृद्धि को प्रभावित करने वाले कारक

किसी वस्तु को ऊष्मा देने पर अर्थात् गर्म करने पर उसके ताप में वृद्धि होती है, ताप में हुई यह वृद्धि निम्नलिखित कारकों पर निर्भर होती है।

1. वस्तु के द्रव्यमान पर Mass of the Body

माना m द्रव्यमान की किसी वस्तु को ऊष्मा देने पर उसके ताप में ^ वृद्धि हो जाती है। वस्तु के ताप में हुई वृद्धि उसके द्रव्यमान के विलोमानुपाती होती है। अर्थात् द्रव्यमान जितना कम होगा, ताप वृद्धि उतनी ही अधिक होगी।

2. वस्तु को दी गई ऊष्मा पर Heat given to the Body

वस्तु के ताप में हुई वृद्धि, वस्तु को दी गई ऊष्मा की मात्रा के समानुपाती होती है अर्थात् अधिक ऊष्मा देने पर ताप में वृद्धि अधिक होगी व कम ऊष्मा देने पर कमी।

3. वस्तु के पदार्थ पर Material of the Body

वस्तु के ताप में हुई वृद्धि उस वस्तु के पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करती है। विभिन्न पदार्थों को समान मात्रा में ऊष्मा देने पर उसके ताप में वृद्धि भिन्न-भिन्न होती है।

विशिष्ट ऊष्मा Specific Heat

किसी वस्तु द्वारा ली गई अथवा दी गई ऊष्मा, वस्तु के द्रव्यमान तथा वस्तु के ताप में हुए परिवर्तन पर निर्भर करती है।
अर्थात   Q = ms∆t

जहाँ, Q = वस्तु को दी गई ऊष्मा की मात्रा, ∆t = वस्तु के ताप में वृद्धि तथा यहाँ s एक नियतांक है, इस नियतांक को पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा कहते हैं। यह उस वस्तु के पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है।

विशिष्ट ऊष्मा की परिभाषा Definition of Specific Heat

s = Q / m∆t
यदि m = 1 gram तथा ∆t = 1℃
तो s = Q

अर्थात् किसी पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा, संख्यात्मक रूप से ऊष्मा की वह मात्रा है जो उस पदार्थ के 1 ग्राम द्रव्यमान का तापक्रम 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ाने के लिए आवश्यक होती है।

नोट –  जिन पदार्थों की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होती है, वे देर से गर्म होते हैं तथा देर से ठण्डे होते हैं। इसी प्रकार, जिन पदार्थों की विशिष्ट ऊष्मा कम होती है, वे जल्दी गर्म होते हैं तथा जल्दी ठण्डे होते हैं।

विशिष्ट ऊष्मा के मात्रक Units of Specific Heat

(i) CGS पद्धति में विशिष्ट ऊष्मा का मात्रक कैलोरी/ग्राम °C है।
(ii) MKS पद्धति में विशिष्ट ऊष्मा का मात्रक किलो-कैलोरी/(किग्रा-°C) है।
(iii) SI पद्धति में विशिष्ट ऊष्मा के मात्रक को जूल/(किग्रा-°C)
अथवा जूल/(किग्रा-K) में व्यक्त करते हैं।

नोट – जल की विशिष्ट ऊष्मा 1 कैलोरी/ग्राम-°C = 1 किलो-कैलोरी/किग्रा-°C = 4.18 x 10^3 जूल/किग्रा-°C

जल की विशिष्ट ऊष्मा के दैनिक जीवन में उपयोग

जल की विशिष्ट ऊष्मा के दैनिक जीवन में निम्न उपयोग हैं

(i) रोगी के शरीर की सिकाई गर्म जल से भरी बोतल से करना जल की विशिष्ट ऊष्मा सबसे अधिक होती है। अतः जल से प्राप्त ऊष्मा सर्वाधिक होती है। अतः किसी रोगी की सिकाई गर्म जल से भरी बोतल से की जाती है।

(ii) वाहन के रेडिएटर को ठण्डा रखने के लिए जल का प्रयोग करना रेडिएटर की अधिक ऊष्मा लेने पर भी जल का तापक्रम कम बढ़ता है, क्योंकि जल की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होती है। इससे रेडिएटर के ताप पर नियन्त्रण रहता है।

(iii) समुद्री तटों पर जलवायु वर्ष भर समान रहना समुद्री तटों पर दिन के समय में सूर्य की ऊष्मा समुद्री जल द्वारा धीरे-धीरे अवशोषित की जाती है, जबकि पथरीले स्थानों पर पृथ्वी द्वारा ऊष्मीय ऊर्जा का अवशोषण अधिक होता है तथा तापक्रम बहुत अधिक बढ़ जाता है। रात्रि में जब सूर्यास्त हो जाता है, तो विकिरण द्वारा ऊष्मा वापस निकलती है। और मिट्टी, रेत एवं पत्थर तेजी से ठण्डे होते हैं क्योंकि उनकी विशिष्ट ऊष्मा कम होती है एवं समुद्री तट धीरे-धीरे ठण्डा होता है क्योंकि जल की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होती है।

जल की विशिष्ट ऊष्मा मिट्टी व रेत से लगभग 5 गुना अधिक होती है। यही कारण है कि समुद्र से दूर वाले स्थानों में दिन और रात के तापक्रम में अन्तर अधिक होता है जबकि समुद्र तटीय स्थानों पर तापक्रम में परिवर्तन बहुत अधिक नहीं होता है। वर्ष भर समुद्र तट के समीप जलवायु एकसमान बनी रहती है।

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(iv) ग्रामीण क्षेत्रों में पौधों को पाले से बचाने के लिए किसान खेतों में पानी भर देते हैं जल को खेतों में भरने से जल का ताप बहुत धीरे-धीरे गिरता है,क्योंकि जल की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होती है। खेतों में पेड़-पौधे जल से कुछ ऊष्मा ग्रहण करके सुरक्षित रहते हैं, क्योंकि तापक्रम बहुत अधिक नहीं गिर पाता। इस कारण पाला (बर्फ) पेड़-पौधों पर नहीं जमता है। अन्यथा पौधों की टहनियों में पानी बर्फ के रूप में जम कर, उनको नष्ट कर देता है।

ऊष्माधारिता Capacity or Thermal Capacity

कुल द्रव्यमान का ताप 1°C बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की
किसी वस्तु मात्रा ही, उस वस्तु की ऊष्माधारिता कहलाती है। ऊष्माधारिता वस्तु के द्रव्यमान तथा उसके पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा के गुणनफल के बराबर होती है।
यदि किसी वस्तु का द्रव्यमान m है तथा इसके पदार्थ की ऊष्माधारिता s है, तो
वस्तु की ऊष्माधारिता = वस्तु का द्रव्यमान x विशिष्ट ऊष्मा x 1°C ताप में वृद्धि
उष्माधारिता = m x s x 1
                        =ms
इसका मात्रक कैलोरी/°C अथवा किलो-कैलोरी/°C होता है। SI पद्धति में इसका मात्रक जूल/°C अथवा जूल/K होता है।

कैलोरीमापी अथवा ऊष्मामापी Calorimeter

किसी वस्तु में ऊष्मा की मात्रा को मापने के लिए जिस उपकरण का प्रयोग किया जाता है, उसे कैलोरीमापी अथवा ऊष्मामापी कहते हैं।

संरचना  Structure

यह ताँबे का बना बेलनाकार पात्र होता है। इसकी बाहरी परत चमकदार बनायी जाती है, जिससे बाहर की ऊष्मा अन्दर और अन्दर की ऊष्मा बाहर न जा सके। इस पात्र को लकड़ी से बने डिब्बे में रखते हैं तथा खाली स्थान में ऊष्मा-अवरोधी पदार्थ; जैसे- नमदा, रूई, आदि भर देते हैं। अब इसके ऊपर लकड़ी का ढक्कन लगाकर हवा में संवहन द्वारा ऊष्मा का क्षय रोका जाता है।

इस पात्र में भरे द्रव को हिलाने के लिए ताँबे के तार का विलोडक पड़ा रहता है। इस विलोडक की सहायता से कैलोरीमापी में भरे द्रव का ताप सम्पूर्ण आयतन में समान किया जाता है। कैलोरीमापी को ताँबे का बनाने का मुख्य कारण यह है कि ताँबा ऊष्मा का अच्छा चालक होता है, अतः कैलोरीमापी शीघ्रता से द्रव के ताप पर आ जाता है। ताँबे की विशिष्ट ऊष्मा कम होती है, इस कारण यह द्रव से नगण्य ऊष्मा लेकर द्रव के ताप पर पहुँच जाता है।

कैलोरीमापी के उपयोग

कैलोरीमापी का उपयोग विशिष्ट ऊष्मा, बर्फ के गलन की गुप्त ऊष्मा, भाप के द्रवण की गुप्त ऊष्मा के मापन में किया जाता है।

कैलोरीमिति का सिद्धान्त
Principle of Calorimetry

जब दो भिन्न-भिन्न ताप वाली वस्तुओं को एक-दूसरे के सम्पर्क में रखा जाता है, तो ऊष्मा उच्च ताप वाली वस्तु से निम्न ताप वाली वस्तु की ओर प्रवाहित होती है। यह ऊष्मा का आदान-प्रदान तब तक चलता है जब तक कि दोनों वस्तुओं के ताप समान नहीं हो जाते हैं। यदि इस क्रिया में बाहर से ऊष्मा का आदान-प्रदान न हो, तो एक वस्तु द्वारा दी गई ऊष्मा, दूसरी वस्तु द्वारा ली गई ऊष्मा के बराबर होगी। अतः
गर्म वस्तु द्वारा दी गई ऊष्मा = ठण्डी वस्तु द्वारा ग्रहण की गई ऊष्मा
यही कैलोरीमिति का सिद्धान्त या मिश्रण विधि कहलाती है।
इस प्रकार कैलोरीमिति का सिद्धान्त ऊष्मीय ऊर्जा के संरक्षण पर आधारित है।

अवस्था परिवर्तन Change of State

सामान्यतया पदार्थ की तीन अवस्थाएं ठोस, द्रव व गैस होती हैं। सामान्य ताप पर पदार्थ इनमें से किसी एक अवस्था में पाया जाता है। निश्चित ऊष्मा देकर या लेकर अर्थात् ताप बढ़ाकर अथवा घटाकर पदार्थ को एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तित कर सकते हैं, जैसे ठोस को द्रव में, द्रव को गैस में इत्यादि। इस प्रकार, निश्चित ताप पर किसी पदार्थ का एक भौतिक अवस्था से दूसरी भौतिक अवस्था में परिवर्तन होना ही अवस्था परिवर्तन कहलाता है। पदार्थ को ऊष्मा देने पर उसमें निम्न प्रकार के परिवर्तन होते हैं।

1. गलनांक (Melting Point)
ऊष्मा देने पर ठोस का द्रव अवस्था में परिवर्तित होना, गलन (Melting) कहलाता है। वह निश्चित ताप जिस पर यह प्रक्रिया होती है, उसे पदार्थ का गलनांक कहते हैं।

2. क्वथनांक (Boiling Point)
जब कोई द्रव्य पूर्णतः किसी निश्चित ताप पर द्रव अवस्था से गैस अवस्था में परिवर्तित होता है, तो इस परिवर्तन को क्वथन (Boiling) कहते हैं। वह निश्चित ताप जिस पर यह प्रक्रिया होती है, क्वथनांक कहलाता है।

3. वाष्पन या वाष्पीकरण (Vaporisation)
द्रव द्वारा प्रत्येक ताप पर बाहरी ऊष्मा लिये निरन्तर धीरे-धीरे वाष्प में परिवर्तित होने की घटना, वाष्पन या वाष्पीकरण कहलाती है। सामान्यतः यह प्रक्रिया द्रव की ऊपरी सतह से होती है।

4. संघनन (Condensation)
किसी गैस का ताप कम करने पर उसके द्रव में बदलने की प्रक्रिया संघनन कहलाती है।

5. ऊर्ध्वपातन (Sublimation)
कुछ ठोस पदार्थ (कपूर, नौसादर) गर्म करने पर सीधे गैसीय अवस्था में परिवर्तित हो जाते हैं, यह प्रक्रिया ऊर्ध्वपातन कहलाती है।

6. हिमांक (Freezing Point)
ताप घटाने पर द्रव से ठोस अवस्था में परिवर्तित होना हिमायन कहलाता है। यह प्रक्रिया एक नियत ताप पर सम्पन्न होती है, वह ताप उस द्रव का हिमांक कहलाता है।

अवस्था परिवर्तन पर बाह्य कारकों का प्रभाव Effect of External Factor on Change in State

1. गलनांक पर प्रभाव Effect on Melting Point
वे पदार्थ जो गलने पर सिकुड़ते हैं (जैसे-रबड़ आदि) उनका गलनांक दाब बढ़ाने पर घट जाता है। इसके विपरीत जो पदार्थ गलने पर फैलते हैं। (जैसे—मोम आदि) उनके लिए गलनांक दाब बढ़ने पर बढ़ जाता है।

2. क्वथनांक पर प्रभाव Effect on Bolling Point
द्रवों का क्वथनांक दाब बढ़ाने पर बढ़ जाता है। जैसे- प्रेशर कुकर में पानी 100°C ताप से अधिक ताप पर उबलता है। दाब कम करने पर क्वथनांक कम हो जाता है। जैसे-पहाड़ी क्षेत्रों में वायुदाब कम होने के कारण 100°C से कम ताप पर ही पानी उबलने लगता है। 2

3. बाह्य अपद्रव्यों का प्रभाव Effect of Impurities
यदि द्रव में बाह्य अपद्रव्य घुले हैं, तो उनके हिमांक प्रायः घट जाते हैं। जैसे-बर्फ में नमक मिलाने पर इस का हिमांक 0°C से नीचे – 22°C तक हो जाता है। ऐसे मिश्रण को हिम मिश्रण कहते हैं। श्रण का उपयोग कुल्फी आदि जमाने में किया जाता है।

गुप्त ऊष्मा Latent Heat

वह ऊष्मा, जो बिना ताप बढ़ाए पदार्थ की अवस्था को परिवर्तित कर देती है,गुप्त ऊष्मा कहलाती है। 100°C पर जल को और अधिक ऊष्मा देने पर वह वाष्प में परिवर्तित हो जाता है। ऊष्मा जल के तापक्रम में वृद्धि नहीं करती। इस प्रकार वह ऊष्मा गुप्त ऊष्मा कहलाती है।

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गुप्त ऊष्मा की माप Measurement of Latent Heat

किसी पदार्थ की गुप्त ऊष्मा उसको दी गयी (अथवा उससे ली गयी) ऊष्मा की वह मात्रा है, जो पदार्थ के एकांक द्रव्यमान की अवस्था परिवर्तन कराने में आवश्यक होती है। SI पद्धति में गुप्त ऊष्मा का मात्रक जूल/किग्रा है। यदि किसी पदार्थ का द्रव्यमान m तथा गुप्त ऊष्मा L हो, तो उस पदार्थ द्वारा नियत ताप पर अवस्था परिवर्तन में ली गई अथवा दी गई ऊष्मा Q= mL

गुप्त ऊष्मा के प्रकार Types of Latent Heat

अवस्था परिवर्तन में प्रत्येक पदार्थ दो बार गुप्त ऊष्मा लेता है, एक तो गलन के समय तथा दूसरे वाष्पन या क्वथन के समय। इसी प्रकार जब इनकी विपरीत प्रतिक्रियाएँ होती हैं तो यही पदार्थ ऊष्मा देता है। इस प्रकार गुप्त ऊष्मा दो प्रकार की होती है

1. गलन की गुप्त ऊष्मा Latent Heat of Melting or Fusion
किसी पदार्थ के गलन की गुप्त ऊष्मा, ऊष्मा की वह मात्रा है जो उस पदार्थ के एकांक द्रव्यमान को बिना ताप बदले, ठोस अवस्था से द्रव अवस्था में परिवर्तन के लिए दी जाती है (अथवा द्रव से ठोस अवस्था में परिवर्तन के लिए विस्तारित की जाती है।) गुप्त ऊष्मा को L से व्यक्त करते हैं। इसका मात्रक कैलोरी/ग्राम अथवा किलो-कैलोरी/किग्रा होता है। बर्फ के गलन की गुप्त ऊष्मा 80 किलो-कैलोरी/किग्रा या 4.186×10^3 x 80 जूल/किग्रा है। इसका तात्पर्य है कि 0°C ताप पर 1 किग्रा बर्फ को 0°C के ही एक किग्रा जल में बदलने के लिए 80 किलो कैलोरी/किग्रा ऊष्मा की आवश्यकता होगी।

2. वाष्पन की गुप्त ऊष्मा Latent Heat of Vaporisation
किसी पदार्थ की वाष्पन की गुप्त ऊष्मा, ऊष्मा की वह मात्रा है जो उस पदार्थ के एकांक द्रव्यमान को बिना ताप बदले, द्रव अवस्था से वाष्प अवस्था में परिवर्तित करने के लिए दी जाती है (अथवा वाष्प से द्रव अवस्था में परिवर्तित करने के लिए ली जाती है)। वाष्पन की गुप्त ऊष्मा को भी L से व्यक्त करते हैं। जल के वाष्पन की गुप्त ऊष्मा 536 किलो-कैलोरी प्रति किलोग्राम होती है अर्थात् जल को वाष्प में बदलने के लिए 536 किलो-कैलोरी ऊष्मा लेता है।

आणविक मॉडल के आधार पर गुप्त ऊष्मा की व्याख्या

पदार्थ के आणविक मॉडल के अनुसार, प्रत्येक पदार्थ की संरचना अणुओं से मिलकर हुई है। यह अणु निरन्तर अनियमित गति करते हैं। इस गति के कारण अणुओं में गतिज ऊर्जा होती है। अणु एक-दूसरे पर बल भी आरोपित करते हैं; इसके कारण अणुओं में स्थितिज ऊर्जा होती है। ठोस अवस्था में अणुओं की स्थिति निश्चित होती है। अतः उनकी गतिज ऊर्जा न्यूनतम होती है। जबकि द्रव अवस्था में अणुओं की स्थिति अनिश्चित होने के कारण उनकी गतिज ऊर्जा अधिक होती है।

जब किसी ठोस को ऊष्मा दी जाती है, तो उसके अणुओं की गतिज ऊर्जा बढ़ती जाती है और अन्त में ऐसी स्थिति आती है कि अणु अपना-अपना स्थान छोड़कर मुक्त रूप से घूमने लगते हैं अर्थात् ठोस, द्रव में परिवर्तित हो जाती है। अवस्था परिवर्तन के लिए ली गई ऊष्मा की मात्रा ही गलन की गुप्त ऊष्मा कहलाती है। अब यदि और ऊष्मा दी जाए तो अणुओं की ऊर्जा बहुत अधिक बढ़ती है और वे पदार्थ की परिसीमा को छोड़कर जाने लगते हैं अर्थात् पदार्थ द्रव अवस्था से गैस अवस्था में परिवर्तित हो जाता है। अवस्था परिवर्तन के लिए ली गई ऊष्मा की मात्रा वाष्पन की गुप्त ऊष्मा कहलाती है।

वाष्पन की गुप्त ऊष्मा सदैव गलन की गुप्त ऊष्मा से अधिक होती है, क्योंकि द्रव को वाष्प अवस्था में बदलने के लिए द्रव के अणुओं को आकर्षण बल के विरुद्ध कार्य करने के साथ-साथ उन्हें अत्यधिक दूर करना पड़ता है, जिसके लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है जबकि ठोस को द्रव अवस्था में बदलने के लिए अणुओं को इतना अधिक दूर नहीं करना पड़ता। केवल अणुओं के आकर्षण बल को पार करना होता है, इसलिए वाष्पन की गुप्त ऊष्मा सदैव गलन की गुप्त ऊष्मा से अधिक होती है।

गुप्त ऊष्मा के प्रभाव impacts of Latent Heat

(i) गुप्त ऊष्मा के अधिक होने के कारण ही ठण्डे प्रदेशों में झील व अन्य जलाशय धीरे-धीरे जमते हैं। इस प्रक्रिया में जलाशय की सतह पर 4°C का जल मौजूद रहता है, जिसमें जल के जीव-जन्तु जीवित रहते हैं।
(ii) दाँतों को बर्फ के जल की अपेक्षा आइसक्रीम अधिक ठण्डी लगती है। क्योंकि आइसक्रीम पिघलने पर दाँतों से गुप्त ऊष्मा ग्रहण करती है।
(iii) ओलों की वर्षा के पश्चात् वायुमण्डल का ताप बहुत गिर जाता है
क्योंकि जब ओले गलते हैं, तो वायुमण्डल से बहुत ऊष्मा लेते हैं अत: वायुमण्डल का ताप गिर जाता है।

(iv) शर्बत को ठण्डा करने के लिए 0°C के जल की अपेक्षा 0°C की बर्फ का उपयोग करते हैं क्योंकि 0°C की बर्फ अवस्था परिवर्तन के लिए गलते समय शर्बत से गुप्त ऊष्मा के रूप में ऊष्मा लेती है।
(v) पहाड़ों पर बर्फ बहुत धीरे-धीरे गलती है क्योंकि बर्फ की गुप्त ऊष्मा अधिक होती है। गुप्त ऊष्मा अधिक होने के कारण ही थोड़ी-सी बर्फ से काफी जल ठण्डा हो जाता है।
(vi) उबलते जल की अपेक्षा भाप से जलने पर अधिक कष्ट होता है। भाप की गुप्त ऊष्मा 536 कैलोरी होती है, जो जल की गुप्त ऊष्मा से बहुत अधिक है। इस कारण 100°C के पानी की अपेक्षा भाप से जलने पर अधिक कष्ट होता है।

आर्द्रतायें ( humidity)

वायु में आर्द्रता Humidity in Air

वायुमण्डल में उपस्थित जलवाष्प की उपस्थिति आर्द्रता कहलाती है तथा वायु में जलवाष्प की मात्रा व दाब के प्रभावों के अध्ययन व मापन को आर्द्रतामिति कहते हैं। उदाहरण- बरसात के दिनों में नमक का गीला होना, बर्फ से भरे गिलास के बाहर जल की बूदों का इकट्ठा होना इत्यादि।

संतृप्त आर्द्रता Saturated Humidity

जब वायु की आर्द्रता अधिकतम होती है, उसे संतृप्त आर्द्रता कहते हैं। ताप बदलने से संतृप्त आर्द्रता का मान बदल जाता है।
नोट – संतृप्त आर्द्रता की स्थिति में वायुमण्डल जलवाष्प ग्रहण नहीं करता।

परम या निरपेक्ष आर्द्रता Absolute Humidity

किसी भी ताप पर वायुमण्डल के एक घन मीटर आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं।

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ओसांक Dew Point

वह ताप जिस पर वायु के किसी आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा उसी आयतन की वायु को संतृप्त करने के लिए पर्याप्त हो, ओसांक कहलाता है।

आपेक्षिक आर्द्रता Relative Humiditya

किसी स्थिर ताप पर वायु के किसी आयतन में उपस्थित जल वाष्प के द्रव्यमान तथा उसी ताप पर वायु के उसी आयतन को संतृप्त करने के लिए आवश्यक जल वाष्प के द्रव्यमान के अनुपात को आपेक्षिक आर्द्रता कहते हैं। इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है। आपेक्षिक आर्द्रता मात्रक विहीन राशि है।

दैनिक जीवन में आपेक्षिक आर्द्रता के प्रभाव
Effects of Relative Humidity in Daily Life

दैनिक जीवन में आपेक्षिक आर्द्रता के प्रभाव निम्नलिखित हैं

(i) गर्मियों में वर्षा होने से पहले हमें व्याकुलता होने लगती है ताप बढ़ने से संतृप्त आर्द्रता बढ़ जाती है, अत: गर्मी के दिनों में आपेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है, इसलिए गर्मी के दिनों में सर्दी की अपेक्षा अधिक वाष्पन होता है, अत: गर्मियों में पसीना व कपड़े जल्दी सूख जाते हैं। परन्तु वर्षा होने से पहले वायु नम हो जाती है अर्थात् आपेक्षिक आर्द्रता बढ़ जाती है जिससे वाष्पन की दर अत्यन्त कम हो जाती है। अतः पसीना नहीं सूखता तथा शरीर में चिपचिपाहट हो जाती है। तब हम शरीर की अतिरिक्त ऊष्मा के कारण व्याकुलता का अनुभव करते हैं।

नोट –  मनुष्य अपने आपको तब सुखद महसूस करता है, जब ताप 23°C हो तथा आपेक्षिक आर्द्रता 60% से 65% हो।
बरसात में जाड़े की अपेक्षा वायुमण्डल का ताप अधिक होता है परन्तु फिर भी गीले कपड़े देर से सूखते हैं बरसात में जाड़े की अपेक्षा आपेक्षिक आर्द्रता अधिक होती है, जिससे कि वाष्पन की दर बहुत कम रहती है तथा कपड़े देर से सूखते हैं।

आर्द्रता से सम्बन्धित कुछ घटनाएँ
Some Phenomena Related to Humidity

(i) कोहरा (Fog)

वायुमण्डल में उपस्थित धूल मिट्टी व धुएँ के कणों पर जलवाष्प छोटी-छोटी बूँदों के रूप में द्रवित हो जाती है। जिससे समीप की वस्तुएँ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देतीं, यही कोहरा कहलाता है।

(ii) ओला (Hail)

जब पानी की बूँदें वायुमण्डल के अति ठण्डे भाग से गुजरती हैं, तो ताप 0°C से कम होने के कारण जल की बूँदे बर्फ में परिवर्तित हो जाती हैं। यही बर्फ के छोटे टुकड़े पृथ्वी की सतह पर गिर जाते हैं, जो ओले कहलाते हैं।

(iii) ओस (Dew)

सर्दियों के दिनों में पेड़-पौधों की पत्तियों पर जल की छोटी-छोटी बूँदें जमा हो जाती हैं, यही ओस कहलाती है। यह भी आर्द्रता का ही प्रभाव होता है। ओस बनने के लिए यह आवश्यक है कि आकाश स्वच्छ हो तथा तेज हवा न चल रही हो, क्योंकि तेज हवा से वाष्पीकरण की दर बढ़ जाती है तथा हवा की कोई पत ठण्डी वस्तुओं के सम्पर्क में कम समय तक रह पाती है।

(iv) पाला (Hoar Frost)

सर्दियों के दिनों में बहुत-ठण्ड पड़ने से जलवाष्प बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में पत्तियों पर खेतों में जम जाती है, यही पाला कहलाता है। पाले के प्रभाव को कम करने के लिए किसान खेतों में पानी भर देते हैं।

(v) बादल तथा वर्षा (Cloud and Rain)

सूर्य से पृथ्वी की सतह पर आने वाले विकिरणों के कारण समुद्र व अन्य जलाशयों का जल वाष्प के रूप में परिवर्तित हो जाता है। यह वाष्प हल्की होने के कारण ऊपर उठ जाती है। ऊपर जाने पर ताप व दाब दोनों ही कम होते हैं। अतः यह वायु ठण्डी होकर जल की बूँदों में परिवर्तित हो जाती है। यही बूँदें बादलों का निर्माण करती हैं। जब जलवाष्प का संघनन बढ़ जाता है, तो यही नन्हीं नन्हीं बूँदें बड़ी बूँदों में परिवर्तित होकर पृथ्वी की सतह पर गिर जाती हैं, इसी को वर्षा कहते हैं।

आपेक्षिक आर्द्रता नापने के लाभ
Merits of Measuring Relative Humidity

आपेक्षिक आर्द्रता नापने के निम्न लाभ हैं
(i) स्वास्थ्य विभाग आर्द्रता का मापन करके ही, नम वायु में कीटाणुओं के उत्पन्न होने की भविष्यवाणी करता है।
(ii) मौसम विभाग प्रतिदिन की आपेक्षिक आर्द्रता का मापन करके मौसम का अनुमान लगाता है। यदि आर्द्रता अधिक होती है, तो वर्षा होने की सम्भावना की जाती है।
(iii) सूत के कारखानों में अधिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है, क्योंकि वायु में नमी अधिक होने से सूत का धागा नहीं टूटता
(iv) शीत घरों में गोश्त, फल इत्यादि रखकर खराब होने से बचाए जाते हैं। यहाँ भी वायु की नमी पर नियन्त्रण रखा जाता है, क्योंकि नमी अधिक होने पर ये वस्तुएँ खराब हो जाती हैं।

ऊष्मा तथा कार्य की तुल्यता
Equivalence of Work and Heat

ऊष्मा तथा कार्य एक ही भौतिक राशि (ऊर्जा) के दो प्रारूप हैं। जिनको एक प्रारूप से दूसरे प्रारूप में परिवर्तित किया जा सकता है, जैसे किसी कैलोरीमापी में भरे पानी को निरन्तर विलोडक द्वारा हिलाकर ताप में वृद्धि की जा सकती है।

उदाहरण-
(i) जब हम अपने हाथों को आपस में रगड़ते हैं, तो हाथ गर्म हो
जाते हैं।
(ii) प्रारम्भ में रेलगाड़ियों में भाप के इंजन इसी सिद्धान्त पर कार्य करते थे। कोयले को जलाकर ऊष्मीय ऊर्जा को गाड़ी की गतिज ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।
(iii) कील को हथौड़े से पीटने पर कील का ताप बढ़ जाता है।
(iv) जब रायफल से छोड़ी गयी गोली एक लक्ष्य से टकराती है, तो गोली गर्म हो जाती है। इस प्रक्रिया में यान्त्रिक ऊर्जा ऊष्मा में बदलती है।

                      ◆◆◆ निवेदन ◆◆◆

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