लोकोक्तियाँ एवं उनका अर्थ | 160 महत्वपूर्ण लोकोक्तियों का अर्थ | हिंदी में लोकोक्तियाँ | proverbs in hindi

लोकोक्तियाँ एवं उनका अर्थ | 160 महत्वपूर्ण लोकोक्तियों का अर्थ | हिंदी में लोकोक्तियाँ | proverbs in hindi – दोस्तों वर्तमान परीक्षाओं में अगर हिंदी विषय सम्मिलित है,तो हिंदी में लोकोक्तियों का अर्थ जरूर पूछा जाता है। उत्तर प्रदेश की परीक्षाओं में,हाईस्कूल,इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षाओं में या बीटीसी, बीएड,यूपीटेट, सुपरटेट की परीक्षाओं में इस टॉपिक से जरूर प्रश्न आता है।

अतः इसकी महत्ता को देखते हुए hindiamrit.com आपके लिए लोकोक्तियाँ एवं उनका अर्थ | 160 महत्वपूर्ण लोकोक्तियों का अर्थ | हिंदी में लोकोक्तियाँ | proverbs in hindi लेकर आया है।

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लोकोक्तियाँ एवं उनका अर्थ | 160 महत्वपूर्ण लोकोक्तियों का अर्थ | हिंदी में लोकोक्तियाँ | proverbs in hindi

लोकोक्तियाँ एवं उनका अर्थ,160 महत्वपूर्ण लोकोक्तियों का अर्थ,हिंदी में लोकोक्तियाँ,proverbs in hindi जानने से पहले ये जान लेते है कि लोकोक्तियाँ किसे कहते हैं, लोकोक्तियाँ क्या हैं,लोकोक्ति की परिभाषा,हिंदी में लोकोक्तियों का अर्थ एवं वाक्य प्रयोग,लोकोक्तियाँ एवं उनका अर्थ,160 महत्वपूर्ण लोकोक्तियों का अर्थ,हिंदी में लोकोक्तियाँ,proverbs in hindi,लोकोक्तियाँ क्या हैं,लोकोक्ति की परिभाषा,हिंदी में लोकोक्तियों का अर्थ एवं वाक्य प्रयोग,लोकोक्तियाँ एवं उनका अर्थ,160 महत्वपूर्ण लोकोक्तियों का अर्थ,हिंदी में लोकोक्तियाँ,proverbs in hindi,

लोकोक्ति की परिभाषा | लोकोक्तियाँ किसे कहते हैं

कवियों और अनुभवी लोगों की कुछ ऐसी सुन्दर और प्रभावपूर्ण उक्तियाँ होती हैं कि वे जन-जन की जिह्वा पर चढ़ जाती हैं। लोग अपनी बातों को पुष्ट करने तथा समान भावनाओं को व्यक्त करने
के लिए इन उक्तियों का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार की उक्तियों को हम ‘लोकोक्ति’, ‘सूक्ति’ अथवा ‘कहावत कहते हैं।

लोकोक्ति, ‘लोक + उक्ति’ दो शब्दों से मिलकर बना है जिसका सामान्य अर्थ कहावत माना जाता है।

यहाँ कुछ लोकोक्तियाँ, उनके अर्थ तथा वाक्यों में प्रयोग दिये जा रहे हैं जो परीक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण हैं।


लोकोक्तियाँ एवं उनका अर्थ | 160 महत्वपूर्ण लोकोक्तियों का अर्थ | हिंदी में लोकोक्तियाँ | proverbs in hindi


(1) अक्ल बड़ी या भैंस (शारीरिक बल से बुद्धि बल श्रेष्ठ होता है)

गोपाल दुर्बल है, इसने बुद्धि बल से बड़े-बड़ों को नीचा दिखा दिया है, अतः ठीक ही कहा है-अक्ल बड़ी या भैंस ।

(2) अरहर की टटिया गुजराती ताला (सामान्य बस्तु की असामान्य सुरक्षा)

अरे ! झुर्गी-झोपड़ियों पर भी पहरेदार देखा, अरहर की टटिया गुजराती ताला।


(3) अपनी करनी, पार उतरनी ( अपने-अपने कर्म का फल सबको भोगना पड़ता है)

भोला गुर्जर की गिरफ्तारी पर इतने दुःखी क्यों हो रहे हो ? अरे ! अपनी करनी, पार उतरनी।


(4) अधजल गगरी छलकत जाय (थोड़ा होने पर अधिक दिखावा करना)

गोपाल कमाता तो है तीन सौ रुपये मासिक और चार सौ रुपये का सूट बनावाया जैसे बड़ा धनी हो, अधजल गगरी छलकत जाय ।


(5) अपना हाथ जगन्नाथ (अपना हाथ पवित्र होना, स्वतन्त्र व्यक्ति जिसके काम में कोई दखल न दे)

तुम स्वयं मालिक हो, कुछ भी करो-अपना हाथ जगन्नाथ।

(6) अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग (अपने-अपने मतलब की बात करना)

महेश के परिवार में किसी की कोई नहीं मानता। बस ‘अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग ।

(7) अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है (अपने यहाँ कमजोर भी सबल होने का दम भिरता है)

क्या बड़बड़ कर रहा है? मुन्ना बाहर निकल अभी मज़ा चखाता हूँ। अपनी गली में तो कुता भी शेर होता है।

(8) अब पछताए होत क्या? जब चिड़ियों चुग गई खेत (हानि होने पर पछताना व्यर्थ होता है)

गणेश फेल होकर व्यर्थ में रो रहे हो, परिश्रम करते। अब पछताए होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गई खेत।

(9) अन्त न पाना (समझ न पाना, रहस्य न जान पाना)

उसका आज़ तक कोई अन्त न पा सका, तुम किस खेत की मूली हो?

(10) अन्त भला तो सब भला (कार्य का अन्तिम चरण महत्त्वपूर्ण होता है)

यदि अब भी भजन करो तो अच्छा है। समय ऐसे ही व्यर्थ न निकालो, समझ लो-अन्त भला तो सब भला।

(11) अन्त बिगाड़ना (अन्त समय पर बर्बाद कर देना)

बूढ़े उदय का पुत्र चोरी में पकड़ा गया। उसने तो पिता का अन्त ही बिगाड़कर रख दिया।


(12) अन्धा क्या चाहे, दो ऑँखें (उपयोगी वस्तु बिना प्रयास के मिल जाना)

दूर से आये हुए गणेश से रामू ने कहा, “भाई साहब भोजन कीजिए” इस पर गणेश ने मुस्कराते हुए कहा-“अन्धा क्या चाहे, दो आँखें।

(13) अन्धा बाँटे रेबड़ी अपने-अपने को देय (स्वार्थी केवल अपनों की ही सहायता करता है)

इस कार्यालय के मैनेजर ने सब नियुक्ति अपने भाई-भरतीजों की ही की है – ‘अन्धा बाँटे रेबड़ी, अपने-अपने को देय’ ।

(14) अन्धी पीसे, कुत्ते खाएँ (कोई कमाये, कोई भोगे)

न जाने कैसे-कैसे कमा रहे हैं, बेटे होटलों में गुलछरें उड़ा रहे हैं-‘अन्धी पीसे, कुत्ते खाएँ।

(15) अन्धे के आगे रोये, अपने नैना खोये (हृदयहीन के सामने रोना व्यर्थ है)

वे तो बड़े आदमी हैं। मेरी पुकार नहीं सुनते, उनसे प्रार्थना करना तो अन्धे के आगे रोना और अपने नैना खोना है।

(16) अन्धे के हाथ बटेर (अयोग्य व्यक्ति को अच्छी चीज मिल जाना)

श्याम को यह घोड़ा क्या मिल गया, ‘अन्धे के हाथ बटेल लग गयी। अब हर समय उसी का बखान करता है।

(17) अन्धेर नगरी चौपट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा (अच्छे-बुरे की पहचान नहीं)

यहाँ काम करने से लाभ क्या? दिनभर मेहनत करने वाले को भी 20 रु० मजदूरी और न करने वालों को भी 20 रु० । यहाँ तो ‘अन्धेर नगरी चौपट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा’ है।

(18) अन्धों में काना राजा (मूर्खो में थोड़ा- सा पढ़ा-लिखा)

हरीश ने अपने परिवार में हाईस्कूल कियाहै लेकिन उसका सभी परिवार अंगूठा टेक है, वे उसे ही विद्वान् समझते हैं। ठीक है-अन्धों में काना राजा है।

(19) अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता अकला आदमी कुछ (कोई बड़ा काम) नहीं कर सकता]

जब गाँव के लोग ही सहयोग नहीं करते, अकेले प्रधान जी ही क्या गाँव का विकास कर देंगे-‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।

(20) अँगूठा दिखाना (वक्त पर मना कर देना, ऐन मौके पर मना कर देना)

सच्चे मित्र समय पर अँगूठा नहीं दिखाते और जो अंगूठा दिखा देते हैं, वे सच्चे मित्र नहीं हैं।

(21) आ बैल मुझे मार (जान-बूझ कर छेड़ करना)

माधव की लड़ाई तो महेश के साथ थी, तुम उसे छेड़कर बेकार झगड़े में फॅसे-‘आ बैल मुझे मार’।


(22) आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास (बास्तविक कार्य छोड़कर अन्य कार्य में लग जाना)

कुश्ती प्रतियोगिता में भाग लेने बुलाकर मैदान की घास छिलवा रहे हैं। आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कंपास।

(23)  आगे नाथ न पीछे पगहा (बन्धनहीन)

रामू की ओर ध्यान मत दो, उसके तो आगे नाथ न पीछे पगहा।

(24) आटे के साथ घुन भी पिस जाता है (अपराधी के संग निरपराध भी मारा जाता है)

देख लो राम किशोर का कोई दोष नही, कलुआ चोर के साथ घूमने-फिरने के कारण पुलिस से भी कलुआ के साथ चोरी के एक मामले में लपेट लिया, उसे भी सजा हो ही जाएगी क्योकि आटे
साथ घुन भी पिस जाता है।

(25) आधा तीतर आधा बटेर (बेमेल कार्य)

किसी भी कार्य को करने से पहले भली-भाँति विचार करो, कहीं आधा तीतर आधा बटेर न हो जाये।

(26) आप भला तो जग भला (अच्छे के लिए सभी अच्छे होते हैं)

दूसरों से तुम्हें क्या, तुम अपना काम करो-आप भला तो जग भला।

(27) आम खाने या पेड़ गिनने (अपने काम से काम रखना)

तुम्हारे यहाँ कल घी पहुँच जायेगा, चाहे मैं घर से लाऊँ या बाजार से। तुम्हें ‘आम खाने हैं या पेड़ गिनने हैं’ ?

(28) आम के आम गुठलियों के दाम (दुहरा लाभ प्राप्त होना)

सोहन ने चावल तो पहले बेच लिए थे। अब उसकी भूसी को बेचकर भी पैसे बना रहा है-‘आम के आम गुठलियों के दाम।

(29) आसमान से गिरा खजूर में अटका (एक मुसीबत से बचना दूसरी में फँसना)

नीलिमा का पति दहेज के मुकदमें में बचा लेकिन नारी शोषण में उसकी सजा होने वाली है पूर्णरुपेण बरी नहीं हुआ सच है वह तो आसमान से गिरा खजूर में अटक गया।

(30) आँख के अन्धे गाँठ के पूरे (मूर्ख लेकिन धनी)

लालचन्द मुर्ख है लेकिन है धनपति। ऐसे ही लोगों को कहा जाता है-आँख के अन्धे गाँठ के पूरे।

(31) ऑँख के अन्धे, नाम नैनसुख (गुण न होने पर भी गुण का दिखावा करना)

तुम्हें सीधी रेखा तक खींचनी नहीं आती, कहलाते हो चित्रकार! ‘आँख के अन्धे, नाम नैनसुख’ ।

(32) इधर कुआँ उधर खाई (सब ओर परेशानी)

भावुक पिता बच्चों को लेकर इधर कुआँ उधर खाई की स्थिति में हैं।

(33) इस हाथ दे उस हाथ ले (दान कभी व्यर्थ नहीं जाता, नकद सौदा होना)

दान धर्म करना सुख का मूल है, लालचन्द इसी के बल पर फल फूल रहा है ठीक ही तो है-इस हाथ दे, उस हाथ ले।

(34) ईश्वर की माया कहीं धूप कही छाया (ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है)

गली में भगवानदास की बेटी मर गई और पड़ौसी के यहाँ बरात आ रही है। सही है-इश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया।

(35) उधार दो, दुश्मन बनाओ (उधार देना बला मोल लेना है)

आजकल की स्थिति यह है कि ग्राहकों को उधार दो दुश्मन बनाओ।


(36) उल्टा चोर, कोतवाल को डॉटे (अपना अपराध स्वीकार न करके पुछने वाले को दोष देना)

सुनील से उसकी उद्दण्डता के बारे में पूछने पर वह मुझे ही दोषी ठहराने लगा, ठीक है-उल्टा चार कोतवाल का डॉटे।

(37) उल्टे बाँस बरेली को (विपरीत कार्य वाला)

मन्त्री जी ने पहाड़ो पर ताँतपुर से पत्थर मँगाने का आदेश दिलाकर ‘उल्टे बाँस बरेली को कहावत चरितार्थ कराई।

(38) ऊँट के मुँह में जीरा (बड़ी आवश्यकता के लिए कम देना)

एक साथ 40 रसगुल्ले खाने वाले मनसुख के लिए तुम्हारा दिया हुआ यह 200 ग्राम दूध क्या करेगा ये तो उसके लिए ऊँट के मुँह में जीरा’ के समान है।

(39) ऊँची दुकान फीका पकवान (आडम्बर अधिक, वास्तविकता कम)

डाक्टर हीरा लाल के पास डिग्रियाँ तो बहुत बड़ी-बडी हैं, परन्तु उनके इलाज से लाभ किसी का हुआ नहीं- ऊँची दुकान फीका पकवान ।

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(40 ) एक हाथ से ताली नहीं बजती (एक पक्ष की ओर से झगड़़ा नहीं हो सकता)

ये कैसे हो सकता है कि तुमने उसे कुछ न कहा हो, और वह तुम्हें पीटने लगा हो–एक हाथ से ताली नहीं बजती’।

(41) एक पैली के चढ्टे-बद्ढे (एक जैसे दुर्गुणों वाले )

रामसिंह हो या ध्यानसिंह – ये जितने नेता हैं, सब ‘एक थैली के चट्टे-बट्टे’ हैं।

(42)  एक पन्थ दो काज (एक प्रयत्न से दोहरा लाभ होना)

मोहन परीक्षा देने हरिद्वार गया था। परीक्षा भी हो गयी और गंगा स्नान भी कर आया ये तो एक पन्थ दो काज’ हो गया।

(43) एक अनार सौ बीमार (एक स्थान हेतु सैकड़ों प्रत्याशी)

वह जयपुर साक्षात्कार के लिए गया, वहाँ आये हुए प्रत्याशियों की
भीड़ देखकर उसने कहा – अरे भाई-एक अनार सौ बीमार।

(44) एक म्यान में दो तलवार (एक वस्तु के स्थान पर दो रखने की चेष्टा करना)

शीघ्र बताओ, किससे प्यार करती हो? अन्यथा मैं प्राण त्याग दूंगा क्योंकि – एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती।

(45) एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है (एक के बुरा होने पर समूह को दोष लगता है)

नकल करते हुए टीपू पकड़ा गया, पूरी कक्षा के विद्यार्थियों की परीक्षा रद्द कर दी गयी, ठीक ही है-एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है।

(46) एक चुपे सौ को हराए (चुप रहना ही अति उत्तम है)

रविवार को हरीश चुप नही रहता तो कोई अनहोनी घटना घट जाती-एक चुप सौ को हराए।

(47) एक तन्दुरुस्ती हजार नियामत (अच्छा स्वास्थ्य हजारों उपहारों से बढ़कर है )

दोषपूर्ण रहन-सहन मनुष्य को बीमार बना देता है; अंत: हमें शुद्धता एवं सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योकि एक तन्दुरुस्ती हजार नियामत।

(48) ऐसी-तैसी करना (इज्जत नष्ट करना)

तुमने कल चार आदमियों के सामने पंचायत में कलुआ की ऐसी-तैसी कर दी।

(49) ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती (बड़े लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अतिलधु प्रयत्न व्यर्थ ही होता है)

पूजी एवं उत्पादन के साधनों का अभाव होते हुए मात्र पाँच हजार रुपये के बल पर साबुन की फैक्टरी डालने की बात सोच रहे हो । कभी ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती।

(50)  ओछे की प्रीत, बालू की भीत (नीच की मित्रता टिकाऊ नहीं होती)

कल तक माधव की रमेश के साथ मित्रता थी किन्तु आज बह रमेश का शत्रु बन गया है। ठीक कहा है-‘ओछे की प्रीत, बालू की भीत’।

(51) क्या काबुल में गधे नहीं होते? (अच्छे समाज में भी मूर्ख होते हैं)

पण्डित जी लड़का अपने परिवार की मर्यादा के विपरीत आचरण कर रहा था, गणेश द्वारा उसके परिवार की उचित प्रशंसा करने पर उसके मित्र ने कहा, अरे ! व्यर्थ की बात मत करो, सुनो, क्या काबुल मे गधे नही होते ?

(52)  कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली ? (आकाश पाताल का अन्तर)

तुम बार-बार सुरेश की बात करते हो ? वह राधेश्याम की बराबरी क्या करे,कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली?

(53) कहीं की ईट कहीं का रोड़ा, नानुमती ने कुनवा जोड़ा (असंगत गठबन्धन)

तुम पुस्तक लेखन में औरों के विचार इधर- उधर से इकट्ठा करके रस देते हो, इसमें मौलिकता क्या है ? यह तो कहीं का ईट कहीं का रोड़़ा, भानुमती ने कुलबा जोड़ा बाली थात हुई।

(54)  कभी घी घना, कभी मुद्ठी भर चना (परिस्थितियाँ एक-सी नही रहती)

माधव कभी पूरा-पकवान खाते भी नाक सिकोडता था अब पेट भर भोजन भी दुर्लभ है, समय-समय की बात है-‘कभी थी घना, कभी मुट्ठी भर चना’।

(55) करेला और नीम चढ़ा (दुष्ट को कुसंग मिलना)

एक तो तुम पहले से ही झूठे एवं मक्कार थे, दूसरे चोरों के आगे-पीछे घूमने लगे-करेला और नीम चढ़ा’ वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हो।

(56) कहने से धोबी गधे पर नहीं चढ़ता (हठी किसी का कहना नहीं मानता)

सुरेश अच्छा गा लेता है लेकिन मित्रों द्वारा अनेक बार कहने पर भी उसने गाना नहीं सुनाया तो उसके एक मित्र ने कहा-“ठीक है, भाई सुरेश ! कहने से धोबी गधे पर नहीं चढ़ता ।

(57) का वर्षा जब कृषी सुखाने (अवसर बीतने पर साधन प्राप्त होना व्यर्थ ही होता है)

“का वर्षा जब कृषी सुखाने। समय चूकि पूनि का पछिताने ॥”

(58) कागज की नाव नहीं चलती (दिखावटी किन्तु सारहीन वस्तु समय पर काम नहीं देती)

केवल फैशन से कुछ नहीं होगा, अपने में कुछ गुण पैदा करो-‘कागज की नाव नहीं चलती।

(59) कानी के व्याह में सौ झगड़े (एक दोष होने पर अनेक विष्न आना)

बड़ी मुश्किल से तुमने घर छोड़ा, अब अनेक बसें निकल गयीं, कोई भी वाहन नहीं मिल पा रहा है , कानी के व्याह में सौ झगड़े ।

(60) काठ की हाड़ी एक बार ही चढ़ती है (धोखा एक बार ही दिया जा सकता है)

एक बार एक हजार रुपये देकर ही मैं पछता रहा हूँ, आगे आपके बहुकावे में नहीं आ सकता, काठ की हॉड़ी एक बार ही चढ़ती है।

(61) कुत्ते को घी हजम नहीं होता (तुच्छ व्यक्ति बड़ी वस्तु प्राप्त कर शान्त नहीं बैठता)

वह भूखों मरता था। जब से उसकी पाँच हजार की लॉटरी खुली है, किसी न किसी से आये दिन झगड़ता रहता है ठीक ही है-कुत्ते को घी हजम नहीं होता।

(62) कूप मण्डूक होना (संकुचित विचारों वाला)

तुम आज भी सड़ी-गली मान्यताओं को ढो रहे हो। इतने कुप मण्डूक न बनो, प्रगति मार्ग अपनाओ।

(63)कोठी बाला रोए, छप्पर बाला सोए (धनवान दुःखी रहता है तथा निर्धन निश्चिन्त)

केन्द्रीय-करों का प्राविधान कुछ ऐसा ही है, जिसमें कोठी वाला रोए, छप्पर वाला सोए, की चरितार्थ हो रही है।

(64) कोउ नृप होय, हमें का हानी (उदासीन होना)

हमारी तरफ से लाभचन्द प्रधान बने या श्याम सिंह, हमें तो मजदूरी करनी है-कोउ नृप होय, हम का हानी ।

(65) कोयले की दलाली में हाथ काले (जैसा काम वैसा परिणाम)

में तो हुक्मसिंह के साथ गया था। कुछ भी नहीं किया लेकिन मूझे व्यर्थ में ही सजा मिल गयी- कोपती की दलाली में हाथ काले।

(66) कंगाली में आटा गीला (कमी में और नुकसान होना)

रहीम की नौकरी तो कहीं लगी नहीं थी, पिता की बीमारी का खच्चा और आ पड़ा – कंगाली में आटा गीला।

(67) खग जाने खग ही की भाषा (निकट सम्पर्क का व्यक्ति ही किसी के गुण-दोषों को ठीक में सकता है)

तुम्हें तो रामू की बहू में सारे गुण ही दिखाई देते हैं उसकी बास्तविकता तो रामू की माँ से पूर्व खग जाने खग ही की भाषा’।

(68) खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है (संगत का असर अवश्य पड़ता है)

वह बड़ा सज्जन था लेकिन जब से वह तुम्हारे संग रहने लगा है उसका तो दिमाग ही गया। ठीक है-खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है।

(69) खिसियानी बिल्ली खम्मा नोंचे (लज्जित होकर क्रोध प्रकट करना)

तुम नरेश का कुछ नहीं विगाड़ पाए, मुझे बार -बार छेड़कर लड़ना चाहते हो -खिसियाना खम्भा नोंचे।

(70) खोदा पहाड़ निकला चुाहिया (बहुत प्रयत्न करने पर भी फल कम मिलना)

महीने का परिश्रम और हजारों रुपया खर्च करके खेत में पैदा हुआ दो कुन्तल गेहूँ-खोदा पहाड़ निकली चुहिया’।

(71) खरी मजूरी चोखा काम (बिना किसी समस्या के अच्छी आय)

पने हलवाई की दूकान से पन्द्रह सौ रुपये प्रति माह एवं भोजन मिल जाता है, न कोई झगड़ा न झंझट समय-समय पर छुट्टियाँ अलग से, खरी मजूरी चोखा काम।

(72) दा गंजे को नाखून न दे (अत्याचारी को पूरी ताकत नहीं मिलनी चाहिए)

तुम बड़े अत्याचारी और क्रूर हो, यदि तुम अधिकारी बन जाते तो अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को कचल कर रख देते, अच्छा है खुदा गंजे को नाखून न दे।


(73) गरीब की जोरू सबकी भाभी (निर्बलों को सभी दबाते हैं)

मोहनदास ठाकुर साहब का चापलूसी करता है, पटवारी की बेगार करता है तथा लाला जी का सौदा लाया करता है इतना ही नहीं गाँव वासी भी उसे चैन नहीं लेने देते हैं-गरीब की जोरू सबकी भाभी।

(74) गागर में सागर भरना (संक्षेप में बड़ी से बड़ी बात कह जाना)

बिहारी ने अपने दोहों में गागर में सागर भर दिया है।

(75) गुड़ खाये गुलगुलों से परहेज (बनावटी परहेज)

प्याज से बनी पकौड़ियोँ तो बड़े चाब से खाते हो लेकिन प्याज खाने से इतना परहेज करते हो। तुम जैसों के लिए ही कहा गया है कि गुड़ सखाए गुलगुलों से परहेज।


(76) गंगा गये गंगादास, जमुना गये जमुनादास (सिद्धान्तहीन, दलबदलू)

रामदास गुप्ता प्रत्येक छः माह में मिलने पर अपने परिवर्तित मतों की चर्चा करते है, कभी वे किसी दल की सदस्यता ग्रहण करते हैं तो कभी किसी दल की, जिस दल में जाते हैं, उसी के होकर रह जाते है। उनके विषय में तो यही कहना उचित है कि गंगा गए गंगादास, जमुना गए जमुनादास।

(77) घर की मुर्गी दाल बराबर (घर की कीमती चीज का उपयोग भी सरल होता है)

बाजार से कपड़ा खरीदने के लिए तो जेब में पैसा भी. न था। ससुराल से आया कपड़ा रखा था कोट सिलवा लिया-‘घर की मुर्गी दाल बराबर’।

(78) घर में नहीं दाने अम्मा चली भुनाने (झूठा दिखावा करना)

पैसे तो नहीं साइकिल खरीदने के लिए, इरादा करते हो स्कूटर खरीदने का-घर में नहीं दाने अम्मा चली भुनाने ।

(79)  घर खीर तो बाहर खीर (जो हमारे पास है, वही दूसरों से भी मिलता है)

आज हमने हलवा बनाया तो पड़ोसी के यहाँ से भी आ गया-घर खीर तो बाहर सीर ।

(80) घर का भेदी लंका ढावे (आपस की फूट बिनाश कर देती है)

जयचन्द ने गौरी को बुलावा न भेजा होता तो देश हुजारों साल की गुलामी से बच जाता-घर का भेदी लंका ढावे’।

(81) घर आए नाग न पूजिए, बॉबो पूजन जाय (प्राप्त वस्तु के स्थान पर अप्राप्त के लिए प्रयत्न करना)

अमेरिका से लौटे, योग्य चिकित्सक को तुमने अपने को नही दिखलाया, झिझकते रहे। तुम्हारे विषय में कहा जायेगा-घर आए नाग न पूजिए बाँबी पूजन जाय।

(82) घर का जोगी जोगना आन गाव का सिद्ध (घर के गुणी व्यक्ति का आदर न होना)

दूसरों के लिए मैं योग्य चिकित्सक हूँ लेकिन मुझे अपने गाँव में अभी भी लल्लू समझते हैं । ठीक ही है-घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध।


(83) घाट-घाट का पानी पीना (चालाक व्यक्ति, सांसारिक अनुभव सम्पन्न)

तुम शिवनारायण की बातें मत करो, उसने तो घाट-घाट का पानी पिया है।

(84) चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए (अत्यधिक कंजूस होना)

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दिवाकर दूसरों को क्या देगा? उसका तो स्वयं ही ये हाल है कि-चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए।


(85) चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात ( सांसारिक सुख क्षणिक है)

दुनिया की यह धन-दोलत कितन दिने का ? जिस पर इतना घमंड करते हो ,याद रखना –  चार दिन चांदनी फिर अँधेरी रात।


(86) चिराग तले अँधेरा (अपना दोष स्वयं को दिखाई न देना)

दिल्ली देश की राजधानी है, यहाँ सभी व्यवस्थाएँ हैं फिर भी राजधानी में लूट एवं हत्याएं होती ही रहती है  वाह, चिराग तले अँधेरा।

(87) चाँद पर थूको, मुँह पर ही गिरेगा (भले आदमी की निन्दा से अपना ही नुकसान होता है)

महात्माजी का यश सर्वत्र फैला हुआ है। जुगल ने उनके विषय में अफवाह फैला दी कि ये  रंगा स्यार है शराब पीता है तथा कंचन कामिनी में लिप्त रहता है। महात्मा जी के भवतों के सुनकर जुगल की मरम्मत कर दी ठीक ही है –  चाँद पर थूको तो मुँह पर ही गिरेगा।

(88) चोर का साथी गिरहकट (अपने जैसा साथी ढूँढना)

कुण्डू दुराचारी तो था ही, टिल्लू नामक गुण्डे के साथ रहते हुए माना हुआ गुण्डा बन गया। ठीक ही कहा गया है-चोर का साथी गिरहकट।

(89) चोर के पैर नहीं होते (पापी की ठोस बाते नही होतीं, अपराधी में शक्ति नहीं होती, स्थिरता की होती)

पुलिस के पूछताछ करने पर उसने पूरा मामला ही उगल दिया-चोर के पैर ही नहीं होते।

(90) चोर की दाढ़ी में तिनका (दोषी सशंकित रहता है)

दीनदयाल की पुस्तक खोने पर अध्यापक ने छात्रों से तलाशी देने के लिए कहा तो रामू ने सकपकाकर बस्ता ही खिड़की से बाहर फैंक दिया, इससे स्पष्ट हो गया-चोर की दाढ़ी में तिनका।

(91) चोली दामन का साथ (गहरा सम्बन्ध)

खेती से पानी को कैसे अलग किया जा सकता है, इन दोनों में तो ‘चोली दामन का साथ हैं।

(92) छछूँदर के सिर में चमेली का तेल (अपात्र को ऐसी वस्तु मिलना, जिसका वह पात्र न हो)

नीलम जैसी रूपयौवन सम्पन्ना कन्या का विवाह मद्यप अनिल के साथ! यह तो ठीक वैसा ही हुआ, जैसे छछूँदर के सिर में चमेली का तेल।

(93) छठी का दूध याद कराना (कठिन मेहनत पड़ना)

गिरिराज पहलवान ने अखाड़े में लड़ते हुए नवल को छठी का दूध याद करा दिया।

(94) छाती/कलेजे पर साँप लोटना (इर्ष्या होना)

गुरुदयाल की पदोन्नति का समाचार सुनकर कार्यालय के बाबुओं की छाती पर साँप लोटने लगा।

(95) जल में रुहकर मगरमच्छ से बैर (निकटस्थ बलवान् से बैर)

तुम्हें सुरेश की बात मान लेनी चाहिए, तुम्हारा मकान मालिक है, धनवान् है। भाई, जल में रहकर मगरमच्छ से बैर ठीक नहीं है।

(96) ज़ब तक सांस तब तक आस (जीवन के अन्त तक आशा बनी रहती है)

तुम हिम्मत क्यों हारते हो? टी०बी० है तो डॉक्टर को दिखलाओ जब तक साँस तब तक आस ।

(97) जहाँ न पहुँचे रवि तहाँ पहुँचे कवि (कवि-कल्पना का अन्त नही होता)

सूरदास वात्सल्य वर्णन का कोना-कोना झाँक आए हैं, उनके वर्णन को पढ़कर यह कहना है कि-जहाँ न पहुँचे रवि तहाँ पहुँचे कवि।

(98) जाको राखै साइया, मारि न सकिहै कोय (जिसका ईश्वर रक्षक है, उसका कोई कुछ नही कर सकता है)

जाको राखै साइयाँ, मारि न सकिहै कोय।।
बाल न बाँका करि सकै, जो जग बैरी होय॥

(99) जिस हॉडी में खाना, उसी में छेद करना (विश्वासघात करना, कृतघ्न होना)

किशोरी लाल एक साल तक हमारे घर रहा, हमारे यहाँ खाना खाया और आज मिथ्या हमारी ही बुराई कर रहा है- उसने तो जिस हांडी मे खाया, उसी में छेद किया।

(100) जिसकी लाठी उसकी भैंस (शक्तिशाली ही विजयी होता है)

आज कैसा समय है? दुर्बलों का कोई ठिकाना नही रहा. जिसकी लाठी उसकी भैंस है, ऐसा सभी जानते हैं।

(101) जैसी करनी वैसी भरनी (कर्मानुसार फल)

मोहन ने ठीक से पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया और अनूत्तीर्ण हो गया। सच ही कहा है-जैसी करनी वैसी भरनी।

(102) जितने मुँह उतनी बात (जितने व्यक्ति उतना ही मतभेद)

विधवा लड़की के विवाह के विषय में किस-किस से पूछोगे जो तुम्हारे जी में आए सो करो क्योंकि जितने मुँह उतनी बात।

(103) डूबते हुए को तिनके का सहारा (घोर संकट में जरा-सी सहायता ही काफी है)

उसका लड़का अस्पताल में मौत से जुझ रहा है। इस अबसर पर उसकी सहायता करना अति आवश्यक है क्योंकि डूबते हुए को तिनके का सहारा ही काफी होता है।

(104) तीन लोक से मथुरा न्यारी (सबसे अलग ब्यवहार)

अपने दाऊदयाल की तो तीन लोक से मथुरा न्यारी रहती है

(105) तबेले की बला बन्दर के सिर (किसी के दोष की सजा दूसरे के सिर मढ़ना)

अस्पताल का शीशा गुण्डों ने तोड़ा और रिपोर्ट हुई प्रधान जी के नाम की, हुई न-तबेले की बला बन्दर के सिर।

(106) तू डाल-डाल में पात पात ( तुम होशियार तो मैं महा होशियार)

बाबूदीन ने अपने नौकर से कहा-मुझे लकड़ियों की चोरी के विषय में बताओ, मैं किसी प्रकार तुम्हारा पीछा नहीं छोडूँगा। अभी सोच ले तू डाल-डाल में पात-पात।


(107) तुरत दान, महा कल्याण ( शुभकार्य में देर ठीक नहीं होती)

प्रधानमन्त्री रोजगार योजना में भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोर अधिकारी एवं कर्मचारी तुरन्त दान, महा कल्याण नहीं होने देते।

(108) तेते पॉव पसारिए, जेती लम्बी सौर (सामथ्थ्यांनुसार खर्च करना)

जो व्यक्ति अपनी सामर्थ्यानुसार खर्च नहीं करते, उन्हें दुःख उठाना पड़ता है। ठीक ही कहा गया तेते पाँव पसारिए, जेती लम्बी सौर ।

(109) थोथा चना बाजे घना (ओछा आदमी ज्यादा डींग हॉकता है)

राधे दो पैसे से अधिक दान नहीं कर सका और अपनी दानवीरता की डींग हाँकता फिरता है-थोथा चना बाजे घना’।

(110) दाल-भात में मूसरचन्द (बिना मतलब टॉग अड़ाना)

हम दोनों अपना झगड़ा स्वयं निपटा लेंगे तुम क्यों बेकार में दाल-भात में मुसरचन्द बनते हो।

(111) दान की बछिया के दाँत नहीं देखे जाते (मुफ्त की वस्तुओं में दोष नहीं देखते)

भात में 50 साड़ियाँ लाए मगर विल्कुल सस्ती थी किसी ने कुछ नहीं कहा क्योकि दान, की बछिया के दाँत नहीं देखे जाते।

(112) दूध का जला छाछ भी फूँक कर पीता है (जो एक बार धोखा खा जाता है फिर जल्दी से विश्वास नहीं करता)

गोपाल को तब तो तुमने फंसा लिया था, अब बह तुम्हारी सच्ची बात पर भी बिना स्वयं देखे विश्वास न करूंगा -दूध का जला छाछ भी फूक कर पीता है।

(113) दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम ( दो कार्य करने पर किसी में सफलता न मिलना)

विवेक ने परचून की दूकान खोल ली, जिससे बह अपनी बी०ए० की परीक्षा हेतु तैयारी नहीं कर पाया गजीर असफल हो गया दूसरी ओर दूकान भी चौपट हो गयी दुविधा में दोनो गए माया मिली न राम।

(114) दूध का दूध, पानी का पानी (उचित न्याय, विवेकपूर्ण न्याय)

आज भी भारतीय न्याय प्रसिद्ध है। न्यायाधीश दूध का दूध, पानी का पानी करते है।

(115) दूर के ढोल सुहावने (दूर की वस्तु अच्छी लगती है)

तुम्हारे पास किस चीज की कमी है जो धर्मेन्द्र की प्रशंसा कर रहे हो । तुम्हें पता नहीं है-दूर के ढोल सुहावने लगते है।

(116) बेखें ऊँट किस करवट बैठता है (देखते है परिणाम कैसा निकलता है)

चुनाव परिणाम निकलने वाला है, देखते हैं ऊँट किस करवट बैठता है।

(117) धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का (अस्थिर व्यक्ति प्रभावहीन होता है)

जब से मुकेश ने नौकरी छोड़ी है, तबसे उसे घर में भी ताड़ना मिल रही है, गाँव बाले भी उस पर विश्वास नहीं करते। सच कहा गया है-धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का।

(118) न ऊधौ का लेन न माधौ का दबेन (निश्चिन्त रहना, अपने स्वार्थ में मग्न रहना)

महेश का परिवार बस गया, नौकरी लग गयी। सुबह जाता है और शाम को आता है। वह न ऊधौ के लेन में है न माधौ के देन में। उससे समाज की बातें करना व्यर्थ है।

(119) न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी (झगड़े को समूल नष्ट करना)

आर्थिक असमानता न रहने पर गरीबी स्वतः ही मिट, जायेगी-न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।

(120) न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी ( कार्य न करने हेतु असम्भव शर्ते रखना, कार्य करने से इन्कार करना)

उसने अपने लड़के को अमेरिका भेजने की शर्त रखते हुए कहा कि मैं आपकी लड़की से तभी शादी करूँगा, अगर आप पढ़ने अमेरिका भेज सकें तो मैं तैयार हूँ। इसका तो यही अर्थ है-न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी।


(121) नक्कारखाने में तूती की आवाज (मुरखो के बीच में गुणवानों की बात)

उन मुखों को महात्मा ने हजार बार समझाया कि शराब पीना बन्द करो, पर वे तो और अधिक पीने लगे-नक्कारखाने में तूती की आबाज़’ कौन सुनता है?

(122) नहले पर दहला (एक से बढ़कर एक)

पंचायत में नथमल मकान अपना बता रहा था उसके भाई ने मकान के रजिस्ट्री के कागज दिखाकर नहले पर दहला मार दिया तथा सभी का मुँह बन्द कर दिया।

(123) नाच न जाने आँगन टेढ़ा (खुद न जाने तथा बहाने बनाये)

गाना नहीं गाना जानते हो परन्तु साज-बाज की बुराई करते हो, यह सब बया है? नाच न जाने आँगन टेढ़ा।

(124) नो नकद न तेरह उधार (उधार की अपेक्षा थोड़ा नकद अच्छा)

श्यामू ने अपने मित्र से कहा अब लोगे तो अस्सी रुपए दूँगा और दीपावली के बाद लोगे तो सौ रुपए,इस पर उसके मित्र ने कहा नहीं भाई ! नौ नकद न तेरह उधार; अतः मुझे अभी दे दो।

(125) निर्बल के बलराम (असहाय की भगवान सहायता करता है)

परमानन्द के पास लड़की की शादी करने को एक पैसा न था। कल उसे लाटरी में 10 हजार रुपये मिल गये-निर्बल के बलराम ।

(126 ) नौ दिन चले अढ़ाई कोस (अति मन्द गति से कार्य करना)

जरा-सी पर्दे की सिलाई का कार्य, इसमें सात दिन लगा दिए। ठीक है-मौ दिन चले अढ़ाई कोस ।

(127) नीम न मीठा होय, भले सींचो घी गुड़ से (स्वभाव अपरिवर्तनीय होता है)

गिरधर तो कपटी है, झूठ बोलने वाला है, उसे कितने ही उपेदश दीजिए उसके स्वभाव में परिवर्तन नहीं आ सकता है क्योंकि-नीम न मीठा होय, भले सीचों घी गुड़ से।

(128) पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं (पराधीनता में कभी सुस, नहीं होता)

लाला की नौकरी में कभी समय नहीं मिलता, एक मिनट को भी चैन नही है, खान-पान का भी काई ठिकाना नहीं सोने बैठने के लिए ही था कहा जाए ठीक ही है-पराधीन सपनेहूँ सुख ब्यहीं , कर विचार देखहुँ मन माही॥

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(129) पगड़ी उछालना ( अपसान करना)

गाँव के एक छोटे-से किसतान ने भरी सभा में जमींदार की पगड़ी उछाल दी।

(130) पैसा पैसे को कमाता है (पैसों से ही कमाई के साधन बनते हैं)

धनीराम का अच्छा खासा व्यापार चल रहा है, उसने महिने भर पहले वस खरीदी थी और आज ही देकर खरीद लिया। कमाई के स्रोत खुल गए, ठीक ही है -पैसा पैसे को कमाता है।

(131)  पर उपदेश कुशल बहुतेरे (दूसरों को उपदेश देने वाले बहुत हैं, पर स्वयं उन सिद्धान्तों का पालन करने वाले विरले होते है)

महात्मा जी! तुम हमें तो उपदेश देते हो कि नशीली चीजों का सेवन न करो और स्वयं भाँग और चरस का सेवन करते हो, ठीक है-पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ ।

(132) पाँचों अँगुली बराबर नहीं होतीं (सब लोग एक समान नहीं हो सकते)

इस गाँव में सभी चोर हों, ऐसी बात नहीं। कुछ तो भले आदमी अवश्य होंगे-पाँचों अँगुलियाँ बराबर नहीं होती।

(133) बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी (नाश अवश्यम्भावी होना)

वह डाकू कितने दिन बचेगा, एक न एक दिन पुलिस उसे अवश्य पकड़ लेगी क्योंकि यह कथन उचित ही है-बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी।

(134) बगल में छोरा नगर में ढिंढोरा (जिसे खोज रहे हैं वह प्रिय बस्तु पास होना लेकिन सर्वत्र खोजबीन करना)

श्यामलाल व्याकरण की पूस्तक सिरहाने रखकर सो गया, एक दो दिन अन्य पुस्तकें पढ़ता रहा, तीसरे दिन घर-भर में उसे खोजता रहा, न मिलने पर भारी हंगामा मचा दिया तभी उसकी बहन ने बिस्तर झाड़ा, पुस्तक तकिए के नीचे थी-बगल में छोरा नगर में ढिंढोरा।

(135) बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद (किसी चीज के गुणों को न जानने वाला उसके महत्त्व को नहीं समझ सकता)

तुम्हारे बाप-दादों ने संस्कृत पढ़ी नहीं, तुम क्या जानो संस्कृत साहित्य में क्या आनन्द मिलता है! बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद ।

(136) बहती गंगा में हाथ, धोना (अवसर का लाभ उठाना)

कल स्वामी सर्वदानन्द जी का गीता पर प्रवचन होगा, चाहो तो तुम भी बहुती गंगा में हाथ धो लो।

(137) बाप न मारी मेंढकी, बेटा तीरन्दाज (ब्यर्थ अभिमान की बातें करना)

तुम अपना व्यर्थ में बखान कर रहे हो, कुछ न होकर इतना अभिमान करते हो कि कहना ही पड़ेगा कि बाप न मारी मेंढकी, बेटा तीरन्दाज।

(138) बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया (धन को सर्वाधिक महत्त्व देना)

तुम धन के आगे किसी को कुछ नहीं समझते, सबका अपमान करने लगते हो। तुम्हें तो बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया का ही भूत चढ़ा है।

(139) बिन माँगे मोती मिले, मॉँगे मिले न भीख ( मॉँगने से कुछ न मिलना तथा बिन माँगे इच्छापूर्ति होना)

कैलाश ने कितने दिन से नौकरी के प्रयास किये लेकिन नौकरी नहीं मिली। आज उसके द्वारे चलकर नौकरी आई है। स्वयं मिल मालिक उसे लेने आये हैं-‘बिन माँगे मोती मिले माँगे मिले न भीख’ उचित ही है।

(140) बिल्ली के भाग से छींका टूटा (अचानक इच्छानुसार वस्तु मिल जाना)

रमेश की कई दिनों से खीर खाने की इच्छा हो रही थी। आज अचानक ही उसकी मौसी के यहाँ से दूध आ गया-‘बिल्ली के भाग से छींका टूटा’।

(141) बीता ताहि बिसारि दे आगे की सुध लेय (विगत बातें छोड़ भविष्य के विषय में सोचना)

मिश्र ! जो करो। कहा भी है-बीती ताहि विसारि दे, आगे की सुध लेय।

(142) भरी जवानी में माँझा ढीला (पूर्ण यौवन में कमजोरी)


तुम अभी पच्चीस वर्ष के नहीं हुए। स्वास्थ्य सम्हालो, अधिक तुम्हें क्या कहें? तुम्हारा तो भरी जवानी में माँझा ढीला हो गया।

(143) भागते भूत की लँगोटी ही सही (कुछ न मिलने पर जो भी मिला बही अच्छा)

घनश्याम अपना उधार पटाने के लिए अपने साले के यहाँ गया, उसने इधर -उधर की अनेक वादे किये लेकिन एक भी पैसा नहीं लौटाया, विदा तक नहीं दी अन्त में कहा लो 10 किलो आलू ले जाओ पर काम आ जाएँगे। घनश्याम ने मन में सोचा ठीक है-भागते भूत की लंगोटी ही सही और उठाकर चल पड़ा।


(144) भूखे भजन न होय गोपाला (भूखा मनुष्य कुछ काम नहीं कर सकता फिर भजन क्या करेगा ?)

तीन दिन से कुछ खाने को नहीं मिला और आप कथा सुनने के लिए कह रहे हैं। अरे भाई ! भूखे भजन न होय गोपाला।

(145) भैंस के आगे बीन बजाना (मुर्ख के सामने ज्ञान की बातें करना)

उस मूर्ख को दर्शन की बातें बताना ‘भैंस के आगे बीन बजाना’ है।


(146) मन चंगा तो कठौती में गंगा (मन की पवित्रता ही सच्ची तीर्थयात्रा है)

क्या रखा है काशी और रामेश्वरम् में! अपने मन को पवित्र करो- मनन चंगा तो कठौती में गंगा।

(147) मान न मान मैं तेरा मेहमान (व्यर्थ में गले पड़ना)

कुछ लोगों की ऐसी आदत होती है कि वे मान न मान में तेरा मेहमान बनकर आ धमकते हैं।

(148) मुख में राम बगल में छुरी (ऊपर से भला बन कर धोखा देना)

यहाँ तुम रोज मुझसे मीठी बातें करते थे और कल कचहरी में झूठी गवाही दी मेरे विपक्षी की। यह ठीक रही-मुख में राम बगल में छुरी।


(149) शौकीन बुढ़िया चटाई का लहँगा (बेढंगा शौक लेकिन हैसियत ठीक नहीं )

रामू की बीबी पार्टी में स्कर्ट पहनकर पहुँची तो उसके सहेलियाँ एकदम बोल उठीं–वाह रे! शौक़ीन बुढ़िया चटाई का लहंगा’ ।

(150) सॉप भी मरे और लाठी भी न टूटे (बिना हानि के काम सिद्ध हो जाये)

जाकर उसे बड़े प्रेम से अपनी बात समझाओ ताकि तुम्हारे पैसे भी वसूल हो जायें और झगड़ा भी न हो-साँप भी मरे और लाठी न टूटे’ ।

(151) सो सुनार की एक लुहार की (सामान्य मनुष्य बहुत प्रयत्न से जो लाभ पाता है बुद्धिमान थोडे है प्रयत्न से बह लाभ पा लेता है)

करोड़ी सुम्मन से छोटे-छोटे सामान में रोजाना एक-दो रुपया कमा लेता था। सुम्मन ने 20 बरी गह के सौदे में करोड़ी से एक ही दिन में 100 रुपये कमा लिए- ‘सौ सुनार की एक लुहार की ।

(152) सावन हरे न भादों सूखे (अपरिवर्तित रहना)

मोहन को देख उसके बहुत दिनों बाद आये मित्र ने कहा,”अरे तुम तो साक्न हरे न भादों सूखे है।

(153) सावन के अन्धे को सब जगह हरियाली दिखना (सर्वदा समान स्थिति देखना, परिवर्तन का अभाव)

तुम सभी सुख-सुविधाओं से सम्पन्न हो इसलिए लोगों से कहते हो कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए काजू बादाम आदि मेवे खाने चाहिए। सच ही कहा है कि सावन के अन्धे को सब जगह हरियाली दिखाई देती है।

(154) हंसा थे सो उड़ गये कागा भये दीवान (गुणवानीं के चले जाने पर गुणहीन को उच्च पद मिलना)

जयप्रकाश नारायण जैसे व्यक्ति का मिलना अति कठिन है क्योंकि अब तो हंसा थे सो उड़़ गये, कागा भये दीवान् वाली बात शेष है।

(155) हथेली पर सरसों नहीं जमती (थोड़े समय में कोई काम नहीं होता समय लगता है)

यह कार्य पाँच बर्ष में पूरा होगा, तुम इसे एक साल में पूरा करना चाहते हो-कहीं हथेली पर सरसों नहीं जमती।

(156) हर्रा (हींग) लगे न फिटकरी रंग चोखा आवे (बिना पैसा लगाए लाभ कमाना)

हरीशा ने एक मकान खरीदा और दूसरे ही साल दुगने में बेच दिया। गित्र होने के नाते मुझे मी पाँच हजार रुपये देने पड़े। ठीक ही है-हरा (हींग) लगे न फिटकरी रंग चोखा।

(157) हाथ कंगन को आरसी क्या? (प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती)

हाथ कंगन को आरसी क्या? पढ़े लिखे को फारसी क्या? जगन ने कार खरीद ली उसका मित्र आश्चर्य से सच-सच कर रहा था तो रामू ने कहा अरे हाथ कंगन को आरसी क्या उसके धर जा और पता कर ले।

(158) हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और (कपटपूर्ण व्यवहार)

राधेलाल छोटा कर्मचारी है और बड़ा आदमी बनना चाहता है। उसके व्यवहार में एकरूपता एवं मधुरता नहीं है-हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और ।

(159) हाथी के पाँव में सबका पाँव (बड़े आदमी की हाँ में हाँ होना)

यदि सरपंच जी ने आपको वोट देने का वायदा कर दिया तो समझ लो पूरा गाँव आपको ही अपना मत देगा-हाथी के पाँव में सबका पाँव है।


(160) होनहार विरवान के होत चीकने पात (होनहार बचपन से ही दिखलाई देने लगता है)

पण्डित जवाहरलाल नेहरू को देखकर एक आकृति विज्ञानी ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक आगेचल कर देश का कर्णधार बनेगा, इसके लक्षण विलक्षण हैं क्योंकि होनहार विरवान के होत चीकने पात।






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