निर्देशन एवं परामर्श का महत्व / निर्देशन एवं परामर्श के लाभ एवं विधियां

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निर्देशन एवं परामर्श का महत्व / निर्देशन एवं परामर्श के लाभ एवं विधियां
निर्देशन एवं परामर्श का महत्व / निर्देशन एवं परामर्श के लाभ एवं विधियां


परामर्श एवं निर्देशन का महत्व / निर्देशन एवं परामर्श के लाभ एवं विधियां

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बाल अधिगम में निर्देशन एवं परामर्श का महत्त्व / Importance of Guidance and Counselling in Child Learning

निर्देशन बाल अधिगम में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। बालक की अधिगम प्रक्रिया में निर्देशन का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। बालक जब विद्यालय में पहुँच जाता है तो वह छात्र कहलाता है। विद्यालय को अधिगम प्रक्रिया का औपचारिक एवं महत्त्वपूर्ण केन्द्र माना जाता है। कक्षा कक्ष अधिगम में छात्रों की वे समस्त क्रियाएँ होती हैं, जो कि औपचारिक विषयों से सम्बन्धित होती हैं। अत: बाल अधिगम में निर्देशन एवं परामर्श के महत्त्व का वर्णन अग्रलिखित
रूप में किया जा सकता है-

1. अधिगम प्रक्रिया में रुचि उत्पन्न करना(Interest creating in learning process)-प्राय: छात्रों को कक्षा शिक्षण में नीरसता उत्पन्न हो जाती है। जब उनको किसी विषय का ज्ञान प्राप्त करने में कठिनाई का अनुभव होता है तो निर्देशन एवं परामर्श के द्वारा उसकी समस्या का समाधान करके अधिगम प्रक्रिया में उनकी रुचि उत्पन्न की जा सकती है।

जैसे-एक छात्र को घटाव करने से अरुचि है तथा उसको वह सीखना नहीं चाहता क्योंकि घटाव की प्रक्रिया में वह कठिनाई अनुभव करता है तो शिक्षक द्वारा एक निर्देशन प्रदान करने वाले के रूप में बताया जाता है कि यह एक सरल प्रक्रिया है। आपको दस में से चार घटाने हैं तो आप कॉपी पर 10 लाइन छोटी-छोटी खींचिये तथा उनमें से 4 को मिटा दीजिये तो आपके पास जो लाइन शेष बचेंगी वही आपका उत्तर होगा। इसके पश्चात् छात्र घटाव करता है तो उसको इसमें रुचि उत्पन्न होती है और सबसे अधिक घटाव के प्रश्न करना चाहता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अधिगम प्रक्रिया में निर्देशन एवं परामर्श द्वारा रुचि उत्पन्न की जाती है।

2.स्थायी अधिगम में सहायक (Helpful in permanent harming)- स्थायी अधिगम की दृष्टि से निर्देशन एवं परामर्श परमावश्यक है। अधिगम प्रक्रिया की जटिलता छात्रों के अधिगम को अस्थायी बनाती है। निर्देशन एवं परामर्श के द्वारा अधिगम प्रक्रिया की जटिलताओं को दूर करके उसे छात्रों के अनुकूल बनाया जाता है, जिससे छात्र स्थायी अधिगम प्राप्त करते हैं। जैसे-कक्षा में एक छात्र जोड़ने की प्रक्रिया का ज्ञान तो रखता है परन्तु वह भूल जाता है। निर्देशन एवं परामर्श के द्वारा उसको जोड़ सम्बन्धी अन्य क्रियाओं के बारे में बताया जाता है तो वह उस प्रक्रिया को स्थायी रूप से याद रखता है। अत: कक्षा का ज्ञान स्थायी रूप में छात्रों को प्राप्त होता है।

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3. अधिगम में तीव्रता (Sharpness in learning)-अधिगम का स्तर उस समय गिर जाता है, जब छात्रों को कक्षा में अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है; जैसे-छात्रों को इतिहास विषय में असुविधा होना, विज्ञान विषय में अरुचि तथा गणित विषय में नीरसता आदि। इस स्थिति में छात्रों को निर्देशन एवं परामर्श के द्वारा सहायता प्रदान करना उनके ज्ञान में वृद्धि कर देता है अर्थात् निर्देशन के द्वारा उनकी समस्याओं का समाधान सम्भव होता है तथा मार्गदर्शन प्राप्त होता है। इससे छात्र अपने अधिगम स्तर को उच्च एवं तीव्र बनाते हैं।

4. अधिगम-कौशलों का विकास (Development of learning skills)-निर्देशन एवं परामर्श के माध्यम से छात्रों में अधिगम कौशलों का विकास किया जाता है, जिससे छात्रों के अधिगम स्तर में वृद्धि होती है; जैसे-एक छात्र किसी तथ्य को ध्यानपूर्वक सुनना चाहता है परन्तु उसका ध्यान भंग हो जाता है। जब निर्देशन के द्वारा श्रवण के बारे में छात्र को सहायता प्रदान की जाती है तथा उसकी बाधाओं को दूर किया जाता है तो छात्र प्रत्येक तथ्य को ध्यानपूर्वक श्रवण करता है। इस प्रकार उसमें श्रवण कौशल का विकास सम्भव होता है। अन्य अधिगम कौशलों का विकास भी इसी प्रकार किया जाता है।

5. सही प्रतिचारों के चुनाव में सहायता (Help in selection of proper laws)- अधिगम प्रक्रिया में छात्रों द्वारा गलत नियमों को धारण करने पर अधिगम प्रक्रिया मन्द पड़ जाती है। निर्देशन एवं परामर्श द्वारा छात्रों को उचित नियमों के चुनाव में सहायता प्रदान की जाती है,जिससे छात्र कम समय में अधिक अधिगम करते हैं। कक्षा में पुनरावृत्ति प्रश्नों का प्रचलन छात्रों को अभ्यास के नियम के बारे में बताता है कि अभ्यास न करने की स्थिति में अधिगम का स्तर निम्न होगा तथा अभ्यास करने की स्थिति में अधिगम तीव्र गति से होगा।

6. अधिगम-प्रक्रिया में अन्तर का ज्ञान (Knowledge of difference in learning process)-अधिगम प्रक्रिया कक्षा कक्ष शिक्षण में एक समान नहीं होती। प्रत्येक अवस्था में कुछ न कुछ अन्तर अवश्य पाया जाता है। छात्र में निर्देशन एवं परामर्श के माध्यम से यह दक्षता विकसित की जाती है कि वह अधिगम प्रक्रिया में विभेद उत्पन्न कर सके तथा उपयुक्त अधिगम प्रक्रिया का अनुसरण करके अधिकतम अधिगम स्तर को बनाये रखे।

7.उचित शिक्षण अधिगम-विधियों का प्रयोग (Use of proper teaching learning methods)-निर्देशन एवं परामर्श की प्रक्रिया छात्र एवं शिक्षक दोनों के लिये ही आवश्यक है। शिक्षण विधियों का प्रयोग शिक्षक द्वारा किया जाता है। शिक्षक अपनी विधियों का मूल्यांकन छात्रों के अधिगम स्तर के द्वारा करता है। यदि शिक्षक द्वारा प्रयुक्त विधि उपयुक्त नहीं है तो निर्देशन एवम परामर्श के माध्यम से वह विधियों में आवश्यक सुधार करके अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी रूप प्रदान कर सकता है।

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8. अधिगम-प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाना (Making effectiveness of learning process)-निर्देशन एवं परामर्श द्वारा छात्र एवं शिक्षक की अनेक शिक्षण अधिगम सम्बन्धी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। निर्देशन के द्वारा अधिगम प्रक्रिया की बाधाओं को दूर किया जाता है। इस सन्दर्भ में शिक्षक एवं छात्रों को उचित परामर्श प्रदान किया जाता है। इस प्रकार निर्देशन के माध्यम से कक्षा-कक्ष अधिगम प्रक्रिया प्रभावशाली बन जाती है।

9. अधिगम-सिद्धान्तों का उचित प्रयोग (Proper use of learning theories)- कक्षा-कक्ष अधिगम प्रक्रिया में अधिगम सिद्धान्तों का उचित प्रयोग निर्देशन एवं परामर्श द्वारा सम्भव होता है। अधिगम सिद्धान्तों के प्रयोग में अनेक समस्याओं के उत्पन्न होने से अधिगम प्रक्रिया में निर्देशन एवं परामर्श की आवश्यकता होती है; जैसे-थॉर्नडाइक के सिद्धान्त का प्रयोग करने पर छात्रों के अधिगम स्तर में वृद्धि नहीं होती है तो किस सिद्धान्त का प्रयोग किया जाय? जिससे कि छात्रों में अधिगम स्तर में वृद्धि हो ?

10. अधिगम-सामग्री का उचित प्रयोग (Proper use of learning materials)- अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिये शिक्षक एवं छात्रों द्वारा विभिन्न सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। किस सामग्री का प्रयोग किस स्थान पर करना है ? इसका उत्तर निर्देशन द्वारा सम्भव होता है क्योंकि निर्देशन द्वारा अधिगम सामग्री के उचित प्रयोग का मार्ग प्रशस्त किया जाता है। उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि बाल अधिगम प्रक्रिया में निर्देशन एवं परामर्श का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

इस सन्दर्भ में प्रो. श्रीकृष्ण दुबे लिखते हैं कि “निर्देशन एवं परामर्श एक ऐसी सारगर्भित एवं अनिवार्य प्रक्रिया है, जो कि कक्षा-कक्ष अधिगम प्रक्रिया को सरल एवं बोधगम्य बनाते हुए अधिगम स्तर को उच्च बनाती है तथा छात्रों को स्थायी अधिगम प्रदान करती है। इसके अभाव में अधिगम प्रक्रिया के सार्थक होने की सम्भावना नगण्य मानी जाती है।” इस प्रक्रिया के माध्यम से ही छात्र एवं शिक्षक दोनों ही अपने-अपने कर्तव्य का पालन ठीक प्रकार से कर पाते हैं।

बाल अधिगम में निर्देशन एवं परामर्श के लाभ


बाल अधिगम में निर्देशन तथा परामर्श के अग्रलिखित लाभ होते हैं-

(1) निर्देशन तथा परामर्श के द्वारा शिक्षक बालक/बालिकाओं की अनुशासनहीनता को भली प्रकार से नियन्त्रित कर सकता है। (2) इसके द्वारा शिक्षकों को बालकों की क्षमताओं और रुचियों की जानकारी निरन्तर मिलती रहती है। (3) इससे अध्यापक आवश्यकता और समायानुरूप अपनी अध्ययन विधियों में परिवर्तन करता है। (4) शिक्षक को बालकों की समस्याओं का प्रत्यक्ष रूप से अध्ययन करने का अवसर मिलता है। (5) शिक्षक को बालकों की व्यक्तिगत समस्याओं की पूरी जानकारी होती है। (6) बालक को अध्यापक के निकट सम्पर्क में आने का अवसर मिलता है।

बाल अधिगम के लिये निर्देशन तथा परामर्श की विधियाँ

अधिगम के सन्दर्भ में बालकों को निर्देशन एवं परामर्श प्रदान करने के लिये प्रायः निम्नलिखित विधियाँ प्रयोग की जाती हैं-
1. अनुस्थापन वार्तालाप-परामर्शदाता बालकों से विभिन्न प्रकार के वार्तालाप करता है। वार्तालाप के मध्य छात्रों की रुचियों, योग्यताओं, क्षमताओं तथा आवश्यकताओं का ज्ञान प्राप्त कर तथ्यों का संकलन करता है। इसके साथ-साथ वह उनको निर्देशन तथा परामर्श की आवश्यकता तथा महत्त्व के विषय में भी बताता है जिससे वे परामर्श लेने के लिये उत्साहित हो सकें।

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2. साक्षात्कार-साक्षात्कार द्वारा बालकों की योग्यताओं, रुचियों तथा समस्याओं का ज्ञान प्राप्त किया जाता है और उसके आधार पर निर्देशन तथा परामर्श दिया जाता है।

3. मनोवैज्ञानिक परीक्षण-परामर्शदाता मानसिक योग्यताओं और पाठ्य विषयों में उपलब्धियों का मूल्यांकन करने के लिये बुद्धि एवं रुचि सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक परीक्षण करता है।

4. प्रश्नावली-विभिन्न तथ्यों की जानकारी प्राप्त करने के लिये परामर्शदाता उनसे सम्बन्धित अनेक प्रश्नावलियाँ तैयार करता है। किये गये प्रश्नों के उत्तरों के आधार पर वह बालकों की विचारधाराओं तथा आवश्यकताओं से परिचित होता है।

5. विद्यालय से तथ्यों का संकलन-बालकों की रुचियों, आदतों तथा व्यक्तित्व से सम्बन्धित विशेषताओं की जानकारी करने के लिये परामर्शदाता विद्यालय में संग्रहीत संचित अभिलेखों का अध्ययन करता है।

6. पारिवारिक स्थितियों का अध्ययन-माता-पिता अपने बालकों की रुचियों, रुझानों तथा आवश्यकताओं के विषय में पर्याप्त जानकारी रखते हैं। अत: परामर्शदाता उनसे विभिन्न जानकारी प्राप्त कर तथ्यों का संकलन करता है। इसके अतिरिक्त वह परिवारों की आर्थिक और सामाजिक दशाओं के विषय में भी जानकारी प्राप्त करता है।

7. पार्श्व चित्र-विभिन्न स्रोतों द्वारा बालकों के सम्बन्ध में जो सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं उन्हें एक पार्श्वचित्र में व्यक्त किया जाता है। पार्श्व चित्र को देखकर एक साथ ही बालक के विषय में महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ ज्ञात कर ली जाती हैं। इन सूचनाओं के आधार पर बालक को सरलता से शैक्षिक या व्यावसायिक निर्देशन दिया जा सकता है।

8. अनुवर्ती कार्यक्रम-निर्देशन तथा परामर्श प्रदान करने के पश्चात् भी यह देखना आवश्यक हो जाता है कि बालकों को जिस क्षेत्र में निर्देशन प्रदान किये हैं उनमें उन्होंने सन्तोषजनक प्रगति की है या नहीं। यदि प्रगति की है तो पुन: उपयुक्त विधियों का प्रयोग करके संशोधित निर्देशन देना आवश्यक हो जाता है।


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