परामर्श में सहयोग देने वाली संस्थाएं / विभाग

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परामर्श में सहयोग देने वाली संस्थाएं / विभाग

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परामर्श में सहयोग देने वाली संस्थाएं / विभाग


Guidance and Counselling Services at Central Level / परामर्श में सहयोग देने वाली संस्थाएं / विभाग

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परामर्श में सहयोग देने वाले विभाग/संस्थाएँ

भारत में वृत्ति परामर्श केन्द्र के तीन मुख्य स्तर हैं-(1) व्यक्तिगत वृत्ति संसाधन केन्द्र (2) केन्द्रीय स्तर पर निर्देशन सेवा केन्द्र (3) राज्य स्तर पर निर्देशन सेवाएँ। वृत्ति परामर्श केन्द्र चाहे केन्द्र या राज्य सरकार के हों या फिर निजी क्षेत्र के, सभी का सर्वप्रमुख उद्देश्य परामर्श द्वारा अभ्यर्थी को एक उत्तम वृत्ति उपलब्ध कराना होता है।

(1) व्यक्तिगत वृत्ति संसाधन केन्द्र

आज के प्रगतिवादी युग में कैरियर निर्माण के लिये शिक्षा की नितान्त आवश्यकता है और इस शिक्षा में निर्देशन एवं परामर्श का उचित मिश्रण होना चाहिये। उचित निर्देशन एवं परामर्श द्वारा कोई भी छात्र अपना कैरियर बना सकता है। अत: जीवन के निर्माण के लिये कैरियर संसाधन केन्द्रों की आवश्यकता होती है। वस्तुतः वृत्ति संसाधन केन्द्र, आधुनिक समय की माँग है। देश में बढ़ती बेरोजगारी, बुनियादी तथा तकनीकी शिक्षा का अभाव और रोजगार सेवा केन्द्रों की अनुपयोगी स्थिति के कारण वर्तमान समय में निर्देशन एवं परामर्श के लिये वृत्ति संसाधन केन्द्रों की आवश्यकता बढ़ती ही जा रही है। इनके द्वारा छात्रों या शिक्षित युवाओं का मार्गदर्शन होता है तथा वे अपने लक्ष्य पर पहुँचते हैं।

मुख्यत: वृत्ति संसाधन केन्द्र निजी प्रयासों या निजी क्षेत्र में स्वतन्त्र व्यक्तियों के प्रयासों से स्थापित किये जाते हैं। इन केन्द्रों में किसी भी व्यक्ति की वृत्ति के लिये आवश्यक सभी संसाधन (Resource) उपलब्ध रहते हैं। सरल रूप में वृत्ति संसाधन केन्द्र की व्याख्या निम्नलिखित रूप में कर सकते हैं-
(1) “सामान्यत: वृत्ति संसाधन केन्द्र का आशय एक ऐसी संस्था से है जो कि किसी अभ्यर्थी को उसकी वृत्ति दिलाने में बहु विधि एवं आयामों से सहायक होती है।”

(2) “वह संस्था जो किसी भी व्यक्ति को उसके जीविकोपार्जन के लिये आवश्यक निर्देशन एवं परामर्श देकर कार्य या रोजगार उपलब्ध कराती है, वृत्ति संसाधन केन्द्र कहलाती है।”

स्पष्ट है कि वृत्ति संसाधन केन्द्र एक ऐसा केन्द्र है जहाँ रोजगार या वृत्ति उपलब्ध कराने के सभी आवश्यक संसाधन रहते हैं। यहाँ बुद्धिमान तथा योग्य अभ्यर्थी अनुभवी निर्देशकों के मार्ग दर्शन में अपनी जीवन वृत्ति के लिये आवश्यक प्रयास करता है तथा सफलता तक पहुँचता है।
वृत्ति संसाधन केन्द्र को वृत्ति निर्देशन के सम्बन्ध में अनेक कार्य सम्पादित करने होते हैं इनमें से प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

(1) इनके अन्तर्गत अभ्यर्थी को रोजगार के सम्बन्ध में सभी महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ उपलब्ध करायी जाती हैं; जैसे-रोजगार की विज्ञप्ति, आवश्यक अर्हताएँ, रिक्त पद, अन्तिम तिथि तथा शुल्क आदि से सम्बन्धित सूचनाएँ। (2) ये केन्द्र अभ्यर्थी तथा वृत्ति के मध्य सही सामंजस्य स्थापित भी करते हैं। (3) रोजगार से होने वाली आय तथा अन्य सुविधाओं को स्पष्ट करते हैं। (4) वृत्ति की प्रकृति के विषय में अभ्यर्थी को सभी तथ्यों का ज्ञान होना आवश्यक होता है,जिसे वृत्ति संसाधन केन्द्र द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। (5) न्यूनतम शैक्षिक योग्यता के साथ-साथ कहीं-कहीं पर अन्य योग्यताएँ भी आवश्यक होती हैं। केन्द्र उन योग्यताओं तथा उनको पूर्ण करने के सभी संसाधन उपलब्ध कराते हैं।

(6) ये केन्द्र प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की शैक्षिक प्रतिभा को निखारने का भी कार्य करते हैं। (7) छात्र को आगामी परीक्षा या प्रतियोगी परीक्षा के लिये तैयार करना भो इनका प्रमुख कार्य होता है। (8) अध्ययनरत विद्यार्थी को भी ये केन्द्र समय-समय पर निर्देशित करते रहते हैं। (9) अभ्यर्थी के व्यक्तिगत रुझान तथा योग्यता के आधार पर ही केन्द्र अभ्यर्थी का रोजगार निश्चित करते हैं। (10) अभ्यर्थी की शारीरिक तथा मानसिक पहलुओं का भी यह केन्द्र अध्ययन करते हैं। (11) अभ्यर्थी के पारिवारिक आधार वृत्ति चयन के लिये अत्यन्त आवश्यक होता है। अत: वृत्ति संसाधन केन्द्र वृत्ति तथा परिवार का अध्ययन कर, अभ्यर्थी को उचित परामर्श देते हैं।

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(12) ये केन्द्र अभ्यर्थी के नैतिक मूल्य, अभिरुचियों, कार्य पद्धति या गतिविधियों का समुचित रूप से अध्ययन करते हैं। इस कारण अभ्यर्थी की प्रमुख कमजोरियों को दूर किया जाता है। (13) एक वृत्ति संसाधन केन्द्र तभी सफल माना जा सकता है जबकि वह अपने अभ्यर्थी को सुगमता के साथ वृत्ति उपलब्ध करा पाये। यही इन केन्द्रों का सर्वप्रमुख कार्य है। इन केन्द्रों का अस्तित्व इसी परिणाम पर निर्भर रहता है। (14) ये केन्द्र समय-समय पर नियोक्ता संस्थाओं के साथ सम्पर्क बनाये रखते हैं। (15) समय-समय पर यह समूह विवाद या परिचर्चा द्वारा भी अभ्यर्थियों को रोजगार उपलब्ध कराने में सहायक होते हैं। (16) सरकारी रोजगार कार्यालयों तथा अन्य रोजगार संस्थाओं के साथ सम्पर्क स्थापित करते रहते हैं।

(2) केन्द्रीय स्तर पर निर्देशन तथा परामर्श सेवाएँ

केन्द्रीय स्तर पर निर्देशन एवं परामर्श सम्बन्धी कार्य करने वाले विभाग/संस्थाओं के बारे में विवरण इस प्रकार है-

1. केन्द्रीय शिक्षा तथा व्यावसायिक निर्देशन ब्यूरो (Central education and vocational guidance bureau)

मुदालियर आयोग या माध्यमिक शिक्षा आयोग (Secondary education commission) की सिफारिशों के आधार पर सन् 1954 में भारत सरकार ने केन्द्रीय शिक्षा तथा व्यावसायिक निर्देशन ब्यूरो की स्थापना की। ब्यूरो को केन्द्रीय शिक्षा संस्थान (Central institute of education) के साथ रखा गया था। बाद में राष्ट्रीय शिक्षा अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् (N.C.E.R.T.) की शाखा मनोविज्ञान विभाग के साथ मिला दिया गया। राष्ट्रीय शिक्षा अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् के वर्तमान में निर्देशन तथा परामर्श सम्बन्धी बहुआयामी कार्य निम्नलिलिखित हैं-

(1) निर्देशन सेवा कार्यक्रम को मजबूत बनाना । (2) विभागीय विकासात्मक कार्यक्रमों का संचालन करना। (3) भारत में निर्देशन सेवा के लिये उचित वातावरण को तैयार करना। (4) शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्देशन के क्षेत्र में डिप्लोमा पाठ्यक्रम का क्रियान्वयन करना। (5) छात्रों में वृत्ति तथा निर्देशन की जागृति उत्पन्न करना। (6) समय-समय पर कार्यशाला, विचार गोष्ठी तथा समूह परिचर्चा आदि का आयोजन करना। (7) विद्यार्थियों के के बीच प्रमाणिक अध्ययन सामग्री को सुलभता के साथ पहुँचाना।

2. अखित भारतीय शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन संघ (All India educational and vocational guidance association)

यह एक राष्ट्रीय स्तर का निर्देशन संघ है। मुख्यत: यह संघ राष्ट्रीय स्तर पर निर्देशन कार्यक्रमों तथा विचारधाराओं को प्रसारित करता है। संघ शिक्षा, वृत्ति तथा निर्देशन से सम्बन्धित साहित्य का प्रकाशन भी करता है। इस संघ की प्रमुख रोजगार पत्रिका ‘व्यावसायिक तथा शिक्षा निर्देशन का लेखा’ (Journal of vocational and education guidance) है।

3. पुनर्वास तथा नियोजन निदेशालय (Directorate general of rehabilitation and employment)

वर्तमान समय में पुनर्वास तथा नियोजन निदेशालय के कार्यभार का उत्तरदायित्व केन्द्रीय श्रम, पुनर्वास तथा नियोजन मन्त्रालय के पास है। यह निदेशालय प्रारम्भ में पाकिस्तान से आयेशरणार्थियों को तथा बाद में बांग्लादेश से आये शरणार्थियों को पुर्न:निर्वासित करता था। वर्तमान समय में यह निदेशालय भारत के सभी रोजगार कार्यालयों के साहित्यों तथा ग्रन्थों का प्रकाशन करता है। इस समय यह लगभग 85 पुस्तकों का प्रकाशन करता है। युवा रोजगार सेवा का प्रारम्भ इसी निदेशालय द्वारा द्वितीय पंचवर्षीय योजना के समय किया गया था।

4. निदेशालय रोजगार तथा प्रशिक्षण (Directorate general employment and training)

यह केन्द्र सरकार द्वारा संचालित निदेशालय है। इसका मुख्य कार्य निर्देशन कार्य के लिये प्रवणता परीक्षणों को आयोजित करना तथा रोजगार कार्यालय में इसकी सूचनाएँ पहुँचाना है। यह निदेशालय रोजगार प्राप्त करने वाले व्यक्तियों को प्रशिक्षण देने का भी कार्य
करता है। सामान्य प्रवणता परीक्षण (GATB) देकर उन्हें निर्देशन तथा परामर्श दिया जाता है।

(3) राज्य स्तर पर निर्देशन तथा परामर्श सेवाएँ

मुदालियर आयोग अथवा माध्यमिक शिक्षा आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्यों में निर्देशन सेवा केन्द्रों की स्थापना का कार्य प्रारम्भ हुआ। इन निर्देशन ब्यूरो का कार्य राज्य में निर्देशन से सम्बन्धित साहित्य का प्रकाशन करना है। राजस्थान पत्रिका इसका एक प्रमुख उदाहरण है। केन्द्र सरकार द्वारा तृतीय पंचवर्षीय योजना में इन निर्देशन केन्द्रों को केन्द्रीय शासन द्वारा प्रायोजित (सहायता देना) करना स्वीकार कर लिया गया तथा इसके अतिरिक्त राज्यों के इन निर्देशन केन्द्रों तथा सेवाओं के उत्थान के लिये 12 ब्यूरो की स्थापना की गयी। तीसरी पंचवर्षीय योजना में ही सम्पूर्ण भारत के लगभग 3000 विद्यालयों में निर्देशन सेवा भी उपलब्ध करायी जाने लगी।

विभिन्न राज्यों में इन ब्यूरो के अतिरिक्त अन्य संगठन इन केन्द्रों को सहायता प्रदान करते हैं, इनमें से प्रमुख संस्थाओं के नाम निम्नलिखित हैं-
(1) मनोविज्ञान शाला उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद । (2) मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र। (3) जिला चिकित्सालय। (4) जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान। (5) पर्यवेक्षण एवं निरीक्षण तन्त्र। (6) समुदाय एवं विद्यालय की सहयोगी समितियाँ। (7) सरकारी एवं गैर सरकारी सगठन।

1.मनोविज्ञान शाला, उत्तर प्रदेश इलाहाबाद (Manovigyan Shala, Uttar Pradesh, Allahabad)

निर्देशन एवं परामर्श सेवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रदान करने के लिये मनोविज्ञान शाला की स्थापना सन् 1952-53 में इलाहाबाद में की गयी। इस संस्थान को मनोविज्ञान परिषद् (Bureau of Psychology) भी कहते हैं। यह संस्थान व्यावसायिक और शैक्षिक निर्देशन की सेवाएं प्रदान करता है। NCERT के सहयोग से संस्थान द्वारा निर्देशन और परामर्श के सन्दर्भ में विभिन्न शोध और अनुसन्धान किये जाते हैं और समय-समय पर निर्देशन और परामर्श सेवाओं के आयोजन किये जाते हैं। इस प्रकार यह संस्थान विभिन्न तकनीकों, विधियों और कार्यक्रम के माध्यम से देश भर में निर्देशन और परामर्श सेवाएँ प्रदान करता है।

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2. मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र (Manovigyan Shala Regional Psychology Centre)

भारतीय शिक्षा में अनेक परिवर्तन, अनुसन्धान एवं सुधारों के पश्चात् यह पाया गया कि प्रत्येक व्यक्ति एवं छात्र का मानसिक स्तर एक समान नहीं होता। विभिन्न प्रयासों एवं सुधारात्मक उपायों से मानसिक स्तर में सुधार की सम्भावनाएँ होती हैं। प्रत्येक स्तर पर छात्रों के सर्वांगीण विकास की अवधारणा को स्वीकार किया गया है। सर्वांगीण विकास का महत्त्वपूर्ण पक्ष मानसिक विकास है। अतः सरकार एवं प्रशासन के महत्त्वपूर्ण निर्णय से मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्रों की स्थापना पर विचार किया गया। सन् 1975 में मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र आगरा की स्थापना की गयी। यह केन्द्र निदेशक मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश इलाहाबाद के अधीन कार्य करता है।

3.जिला चिकित्सालय (District Hospital)

जिला चिकित्सालय लोक प्राधिकरण के अधीन है। जिला चिकित्सालय समस्त नागरिकों को चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराता है। सम्पूर्ण देश में यह चिकित्सालय प्रत्येक जनपद में जनता की चिकित्सकीय सेवा में रत हैं। आगरा क्षेत्र में वर्तमान जिला चिकित्सालय भवन को स्वतन्त्रता से पूर्व नमक के दफ्तर के नाम से जाना जाता था। जिला चिकित्सालय के अग्रलिखित कार्य होते हैं-

(1) जिला चिकित्सालय पर वर्तमान समय में गर्भवती महिलाओं के टीके लगाये जाते है तथा प्रसव के समय में आयरन की गोलियाँ प्रदान की जाती हैं। (2) ग्रामीण महिलाओं के प्रसव जिला चिकित्सालय में नि:शुल्क सम्पन्न कराये जाते हैं। प्रसव के समय दवाइयाँ भी जिला चिकित्सालय से निःशुल्क मिलती हैं। (3) जिला चिकित्सालय पर बालकों को विभिन्न प्रकार की जानलेवा बीमारियों से मुक्त रखने के लिये प्रतिरक्षण टीके लगवाये जाते हैं, जिससे बालकों का स्वास्थ्य उत्तम रहे। (4) ग्रामीण महिलाओं एवं बालकों के टीकाकरण के लिये गाँवों में ए.एन.एम. को भेजा जाता है, जिससे जिला चिकित्सालय तक चलकर न आने वाली महिलाएँ एवं बच्चे भी टीकाकरण से वंचित न रह जायें। (5) जिला चिकित्सालय पर सामान्य रोगों जैसे-मलेरिया, जुकाम, खाँसी, बुखार, पेचिश एवं सामान्य चोट लगने पर उपचार
किया जाता है।

(6) जिला चिकित्सालय के द्वारा अनेक प्रकार की स्वास्थ्य सम्बन्धी सूचनाओं को जनसामान्य तक पहुँचाया जाता है; जैसे-एड्स से बचने के उपायों की जानकारी प्रदान करने में जिला चिकित्सालय की अहम भूमिका रही है। (7) जिला चिकित्सालय द्वारा परिवार कल्याण एवं परिवार नियोजन सम्बन्धी विभिन्न योजनाओं की जानकारी जनता को प्रदान की जाती है, जिससे वे अपने परिवार को खुशहाल रख सकें। (8) जिला चिकित्सालय द्वारा सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य नागरिकों के स्वास्थ्य सम्बन्धी भ्रम एवं अन्धविश्वासों को दूर करना है, जिससे वे रूढ़िवादिता से निकलकर स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ प्राप्त कर सकें। (9) जिला चिकित्सालय द्वारा परिवार नियोजन के साधनों के बारे में महिलाओं को बताया जाता है,जिससे वे अपने परिवार को सीमित रखने में सक्षम हो जाती हैं।

(10) जिला चिकित्सालय के द्वारा ही जच्चा-बच्चा सुरक्षा योजना को पूर्णत: क्रियान्वित किया जा सकता है क्योंकि जिला चिकित्सालय का सम्बन्ध प्रत्यक्ष रूप से जनता से होता है। (11) चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा जनपद के नागरिक एवं विशेषकर असमर्थ नागरिकों को उच्च गुणवत्तायुक्त, सर्वसुलभ एवं सहज प्राप्त निरोधात्मक, स्वास्थ्य संवधर्नात्मक चिकित्सीय सेवाएँ प्रदान करना। (12) चिकित्सालय में आने वाले समस्त रोगियों को आवश्यक चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराना तथा दुर्घटनाओं आदि का कानून व्यवस्था के लिये चिकित्सकीय परीक्षण करना।

4. जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (District Institute of Education and Training – DIET)

शिक्षक का महत्त्वपूर्ण आधार प्रशिक्षण है। प्रशिक्षण शिक्षा को प्रभावी बनाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में प्राथमिक शिक्षा में नवीन्मेष के लिये दो पहलुओं पर विशेष बल दिया गया है- (1) चौदह वर्ष की आयु तक के बालक-बालिकओं का सार्वजनिक नामांकन एवं सार्वजनिक ठहराव तथा (2) शिक्षा की गुणवत्ता में ठोस सुधार।

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जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान के कार्य (Functions of DIET)-जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान के कार्य निम्नलिखित हैं-
(1) औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा के बीच की दूरी घटाकर इनमें एकात्मकता स्थापित करना। (2) शाला प्रधानों, स्वायत्ती संस्थाओं (ऐच्छिक संगठनों), ब्लॉक स्तरीय शिक्षाधिकारियों, ग्राम शिक्षा समितियों के सदस्यों एवं सामुदायिक नेताओं के अभिनवीकरण एवं प्रशिक्षण की व्यवस्था करना। (3) शिक्षण अधिगम-सामग्री का विकास करना। (4) नवीन प्रविधियों की क्षेत्र की शिक्षकों को जानकारी देना। (5) शोध प्रसार सेवाओं तथा प्रयोग-प्रशिक्षणों का आयोजन करना। (6) शिक्षकों, अनुदेशकों के लिये एक ‘संसाधन एवं अधिगम केन्द्र के रूप में कार्य करते हुए परामर्श देना। प्राथमिक एवं प्रौढ़ शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति में आने वाली बाधाओं का अध्ययन एवं क्रियानुसन्धान कार्य करना तथा प्रयोगात्मक कार्य को बढ़ावा देना।
(7) जिला शिक्षा बोर्ड (DEE), शाला सम्भागों (संकुलों) तथा संस्थागत योजना एवं प्रबन्ध के प्रति संस्था प्रधानों को प्रशिक्षण एवं शैक्षिक सहयोग और सुझाव देना ।

5. पर्यवेक्षक एवं निरीक्षण तन्त्र (Inspection and Supervision System)

समावेशी बच्चों को मुख्य धारा से सम्बद्ध करने और उनके सर्वांगीण विकास में पर्यवेक्षण एवं निरीक्षण की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अतः विद्यालयों में शैक्षिक समावेशन के अन्तर्गत निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण तन्त्र की व्यापक रूप में व्यवस्था की जानी चाहिये। वर्तमान विचारधारा के अनुसार निरीक्षक को निरीक्षण से हटकर एक पर्यवेक्षणकर्ता सलाहकार और सहयोगी होना चाहिये। उसे केवल कमियों को ही नहीं देखना है, वरन् अच्छे पहलुओं को
प्रोत्साहन भी देना है। वर्तमान समय में निरीक्षण बहुत सीमा तक टेक्नीकल होता जा रहा है। वर्तमान निरीक्षण एक सुनियोजित शैक्षिक गुणात्मक विकास की प्रक्रिया है, जिससे विद्यार्थी और शिक्षकों का क्रमश: उत्तरोत्तर विकास होता है। सीखने के लिये जो भी मानवीय एव भौतिक साधन हैं, उनको सहयोगपूर्ण एवं सामंजस्यपूर्ण ढंग से जुटाना भी इसमें सम्मिलित है।

आज निरीक्षण शिक्षकों एवं शाला प्रधान के परस्पर सहयोग से होता है।पहले जिस कार्य के लिये निरीक्षण’ शब्द का प्रयोग होता था, उसके लिये अब ‘पर्यवेक्षण’ शब्द का प्रयोग होता है। पर्यवेक्षण एवं निरीक्षण को कुछ शिक्षाविद् भिन्न समझते हुए यह मानते हैं कि ये दोनों एक-दूसरे से अलग हैं परन्तु ये दोनों एक-दूसरे से घनिष्ठता से सम्बन्धित हैं। पहले निरीक्षक द्वारा हाकिम बनकर अध्यापकों के कार्यों का निरीक्षण किया जाता था, अब उसके स्थान पर पर्यवेक्षण सम्प्रत्यय आने से कार्य-पद्धति तथा उसकी भावना में अन्तर आ गया है। अत: शिक्षाशास्त्रियों ने निरीक्षण सम्बन्धी नवीन धारणा को अभिव्यक्त करने के लिये एक नवीन शब्द का प्रयोग किया है जो पर्यवेक्षण (Supervision) के नाम से जाना जाता है। यह केवल शब्दों का हेर-फेर नहीं है, वरन् उनमें उद्देश्य, क्षेत्र, विधि एवं दृष्टिकोण का भी बड़ा अन्तर है।

6.समुदाय एवं विद्यालय सहयोगी समितियाँ (Community and School Cooperative Committies)

राष्ट्रीय विकास के लिये निर्देशन एवं परामर्श की प्रक्रिया में समुदाय एवं विद्यालय के परस्पर सहयोग की आवश्यकता होती है। इसमें अध्यापक, विद्यालय, समाज तथा उसकी सहयोगी समितियों का परस्पर सम्बन्ध समाजगत समस्याओं को लेकर होता है। अत: शिक्षकों का पूर्ण दायित्व है कि-(1) समुदाय के व्यक्ति जो विद्यालय में आयें उनकी समस्याओं को सहानुभूतिपूर्वक सुनकर उनकी सहायता करें। (2) पाठ्यक्रम एवं विधियों दोनों में सामुदायिक संसाधनों का प्रयोग करें। (3) नागरिक मूल्यों के प्रति पूर्ण आस्था रखें तथा उन्हें व्यवहार तथा आचरण में उतारें। (4) विद्यालय सहयोगी समितियाँ छात्र की उन समस्याओं का निराकरण करें जो छात्र तथा समाज के बीच हैं।

7. सरकारी एवं गैर सरकारी संगठन (Government and Non-Government Organization)

वर्तमान समय में लगभग सभी भारतीय राज्यों में विभिन्न निर्देशन सेवाएँ कार्यरत हैं।

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