विवेकानंद का शिक्षा दर्शन | विवेकानंद के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधियां

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विवेकानंद का शिक्षा दर्शन | विवेकानंद के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधियां

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स्वामी विवेकानंद का शिक्षा दर्शन | विवेकानंद के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधियां

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भारतीय विचारकों का शिक्षा में योगदान

शैक्षिक दर्शन की दृष्टि से विश्व में भारत का स्थान सबसे ऊपर है। सारा विश्व जानता है अट्ठारह पुराण तथा चार वेदों की रचना का स्थान भारत ही है। महर्षि वेदव्यास रचित भगवद्गीता सम्पूर्ण विश्व में अविवादित तथा सर्वमान्य ग्रन्थ है। दर्शन का मुख्य आधार गीता को ही माना गया है। गोस्वामी तुलसीदास को रामचरितमानस तथा श्रीमदभगवद्गीता शिक्षा के वास्तविक आधार हैं। यही कारण है कि भारत भूमि में शैक्षिक विचारों की एक लम्बी श्रृंखला ने जन्म लिया है, उनमें से विवेकानन्द, टैगोर, महात्मा गाँधी, ‘डॉ. राधाकृष्णन् तथा गिजूभाई बधेका का नाम उल्लेखनीय है। इनमें से प्रमुख भारतीय विचारकों के शिक्षा में योगदान को निम्नलिखित प्रकार से वर्णित किया जा सकता है-

स्वामी विवेकानन्द का जीवन परिचय (1863–1902)

सन्तों, वीरों एवं साहित्यकारों की भूमि बंगाल से दर्शन, धर्म एवं संस्कृति की पावन त्रिवेणी प्रवाहित करने वाले स्वामी विवेकानन्द का जन्म ऐसे वातावरण में हुआ कि उनमें धार्मिक भावना की उद्भावना हुई। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने अनेक शिष्यों का निर्माण किया, जिनमें प्रमुख थे-स्वामी विवेकानन्द । स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी, सन् 1863 में प्रसिद्ध वकील श्री विश्वनाथ दत्त के यहाँ हुआ था। नामकरण के समय उनका उनका नाम नरेन्द्रनाथ रखा गया।

बचपन में नरेन्द्रनाथ बहुत चंचल थे। नरेन्द्रनाथ की स्मरण शक्ति अत्यन्त प्रखर थी। नरेन्द्रनाथ ने अंग्रेजी तथा बंगला का अच्छा अध्ययन किया। विद्यार्थी जीवन में वे अपने व्यक्तित्व के कारण सबके प्रिय बन गये। नरेन्द्रनाथ जब रामकृष्ण परमहंस से मिले तो उनसे प्रभावित हुए। निरन्तर 6 वर्ष तक स्वामी राम कृष्ण परमहंस के सम्पर्क ने स्वामी विवेकानन्द में चिन्तन के नये द्वार खोले और शनैः-शनैः अपनी साधना, तपस्या, चिन्तन एवं अध्ययन से नरेन्द्रनाथ स्वामी विवेकानन्द बन गये।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस दिवंगत हो गये तो उनकी स्मृति में स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। स्वामी विवेकानन्द ने अपने व्याख्यानों एवं चिन्तन से यह सिद्ध करने का सफल प्रयास किया कि यदि वेदान्त को आधुनिक आवश्यकताओं एवं मूल्यों से जोड़ा जाये तो भारत की अनेक समस्याओं का समाधान सम्भव है। स्वामी विवेकानन्द ने देश-विदेश घूमकर भारतीय संस्कृति को उसके सही रूप में लोगों के सामने रखने का प्रयास किया गया तथा भारतीय दर्शन, धर्म एवं संस्कृति का सही स्वरूप संसार के सम्मख प्रस्तुत किया। आपका देहावसान सन् 1902 में हुआ।

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स्वामी विवेकानंद का शिक्षा दर्शन

हम स्वामी विवेकानंद के शिक्षा दर्शन के अंतर्गत समझने की कोशिश करेंगे कि विवेकानंद के अनुसार क्या शैक्षिक सिद्धांत होने चाहिए साथ ही साथ शिक्षा का पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियां,गुरु शिष्य संबंध, विद्यालय का परिवेश किस प्रकार का होना चाहिए आदि सभी बातों पर चर्चा करेंगे ।

विवेकानन्द के शैक्षिक सिद्धान्त

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार व्यक्ति के मन में पहले से विद्यमान पूर्णता का प्रकाश ही शिक्षा है। स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-

(1) विद्यार्थी को व्यावहारिक प्रशिक्षण देना चाहिये। (2) जहाँ तक हो सके विद्यार्थी काल में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये।(3)व्यक्ति को स्वयं पर अनुशासन रखना आवश्यक है। (4) व्यक्ति के विचार एवं आचरण में समन्वय होना चाहिये। (5) छात्र सर्वांगीण विकास कर सकें, ऐसी शिक्षा होनी चाहिये। (6) इस बात का स्मरण रखना चाहिये कि छात्र को कोई सिखा नहीं सकता, वह स्वयं सीखता है। (7) ज्ञान तो व्यक्ति में पहले से ही है। उपयुक्त वातावरण की आवश्यकता होती है। (8) छात्रों के साथ-साथ छात्राओं की शिक्षा पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाना चाहिये। (9) शिक्षक एवं शिष्य के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध होना चाहये तथा शिक्षक को शिष्य के साथ स्नेह एवं सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिये। (10) छात्र के आध्यात्मिक विकास के साथ ही भौतिक विकास पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है।

विवेकानन्द के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार शिक्षा के निम्नांकित उद्देश्य हैं-
(1) पूर्णता की ओर अग्रसर होने तथा उसे प्राप्त करने का उद्देश्य। (2) छात्र के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का उद्देश्य। (3) चारित्रिक विकास का उद्देश्य । (4) नैतिक विकास का उद्देश्य । (5) आध्यात्मिक विकास का उद्देश्य । (6) त्याग की भावना का विकास का उद्देश्य। (7) राष्ट्रीय एकता की भावना के विकास का उद्देश्य । (8) धर्म के प्रति सही दृष्टिकोण विकसित करने का उद्देश्य । (9) विविधता में एकता की भावना के विकास का उद्देश्य । (10) श्रद्धा की भावना उत्पन्न करने का उद्देश्य। (11) इच्छा शक्ति को सबल बनाने का उद्देश्य।

इस प्रकार स्वामी विवेकानन्द के अनुसार शिक्षा ऐसी होनी चाहिये, जो व्यक्ति को पूर्णता की ओर ले जाय। उसके अन्दर जो शक्तियाँ हैं, उन्हें वह पहचान सके। शिक्षा ऐसा होनी चाहिये, जो छात्र के शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक, संवेगात्मक, नैतिक एवं आर्थिक विकास में सहयोग दे तथा छात्र को अपने सन्तुलित विकास के लिये अनुकूल वातावरण प्रदान करे, जो शिक्षा व्यक्ति का नैतिक तथा चारित्रिक विकास नहीं करती, वह शिक्षा निरर्थक है। व्यक्ति का चरित्र, राष्ट्र का चरित्र बनता है। व्यक्ति का नैतिक आचरण सामाजिक उत्थान में योग देता है।

अत: शिक्षा को इस ओर ध्यान देना चाहिये। धर्म हमारी संस्कृति का मुख्य तत्व है। शिक्षा को चाहिये कि छात्रों में धर्म के प्रति सही दृष्टिकोण विकसित करे तथा भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का आचरण में ला सके और ऐसी क्षमता का विकास करे। हमारा देश अनेकताओं का देश है, धर्म, जाति, भाषा, संस्कृति एवं भूगोल सभी दृष्टि से देश में विविधताएँ हैं। शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यह है कि वह इन विविधताओं में एकता की भावना खोजने का प्रयास करे। कुल मिलाकर हमारी शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य मानव का निर्माण करना होना चाहिये।

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विवेकानन्द के अनुसार पाठ्यक्रम

शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति में पाठ्यक्रम की अहम् भूमिका होती है। यदि आध्यात्मिक विकास जीवन का लक्ष्य है और इसे प्राप्त करने में शिक्षा को महत्वपूर्ण योग देना है तो निश्चित रूप से इसे प्रकार की शिक्षा देने को धर्म ग्रन्थों, पुराण, उपनिषद, दर्शन आदि ग्रन्थों को पाठ्यक्रम में स्थान देने की आवश्यकता स्वामीजी अनुभव करते थे साथ ही स्वामीजी का यह भी कहना था कि केवल आध्यात्मिक ही नहीं, भौतिक विकास भी होना चाहिये।

इसके लिये इतिहास, भूगोल, गणित, विज्ञान, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण आदि विषयों को भी पाठ्यक्रम में उचित स्थान देने के वे समर्थक थे। स्वामीजी छात्रों को शारीरिक दृष्टि से सुदृढ़ देखना चाहते थे। अत: पाठ्यक्रम में शारीरिक शिक्षा को स्थान देने के पक्षधर थे। स्वामीजी विदेशी भाषा की शिक्षा के समर्थक थे, पर मातृभाषा को प्रधानता देने की आवश्यकता सदैव अनुभव करते थे।

स्वामीजी का पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में विचार था कि छात्रों को पाठ्यक्रम के माध्यम से अतीत के प्रति आदर, वर्तमान की चुनौतियों एवं संघर्ष के लिये सक्षम तथा भावी जीवन को सुखद एवं सुन्दर बनाने में समर्थ बनाना चाहिये। पाठ्यक्रम सैद्धान्तिक ही नहीं, व्यावहारिक भी होना चाहिये तथा वह व्यक्ति को पूर्णता की ओर अग्रसर करने में सहायक होना चाहिये।

विवेकानन्द के अनुसार शिक्षण विधियाँ

स्वामी विवेकानन्द ऐसी शिक्षा प्रणाली को इस देश के लिये उपयुक्त समझते थे, जो व्यक्ति को जीवन में आने वाले संघर्ष के लिये तैयार करे, उसे इस योग्य बनाये कि वह चुनौतियों का डटकर मुकाबला कर सके। सच्ची शिक्षा वह है, जो व्यक्ति के चरित्र को उच्च बनाती है एवं राष्ट्रीय एकता और समाज सेवा की भावना का विकास करती है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिये कि जो व्यक्ति को स्वावलम्बी बनाये, उसमें आत्म-विश्वास की भावना का विकास करे। स्वामीजी के अनुसार मात्र पुस्तकें पढ़कर परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाना शिक्षा नहीं है।

स्वामीजी का कहना था कि दूसरे देशों में भी यदि विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रों में ज्ञान मिलता हो तो उसे अवश्य अर्जित करना चाहिये। देश के औद्योगिक विकास हेतु शिक्षा की व्यवस्था के लिये प्रशिक्षण भी प्राप्त करना चाहिये, जिससे शिक्षा राष्ट्रीय विकास एवं सामाजिक उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सके। स्वामीजी का मत था कि छात्र को ऐसा वातावरण देना चाहिये कि वह स्वयं सीख सके क्योंकि सीखता तो वह स्वयं ही है। कोई उसे ज्ञान दूंस-ठूस कर सिखा नहीं सकता। ऐसा कोई माली नहीं होता जो पौधे का पेड़ बना दे। हाँ, वह इतना अवश्य कर सकता है कि इस बात का ध्यान रखे कि पौधे को कोई क्षति नहीं पहुँचे। इसी प्रकार शिक्षक को चाहिये कि छात्र के सीखने की स्वतन्त्रता का सम्मान कर तथा छात्र को स्वतः शिक्षित होने दे।

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विवेकानन्द के अनुसार गुरु-शिष्य सम्बन्ध

स्वामीजी के अनुसार शिक्षा देने में गुरु का बड़ा महत्वपूर्ण योग होता है। बिना गुरु के विद्यार्थी का सही मार्ग-दर्शन सम्भव नहीं। गुरु में तीन बातें अवश्य होनी चाहिये। पहला, तो वह अपने विषय का विद्वान् हो जिस विषय की वह शिक्षा देता हो, उसके सम्बन्ध में उसे पूरी जानकारी हो तथा शिष्य के मन में उठने वाली किसी भी शंका का पूर्ण समाधान करने में वह समर्थ हो। इतना ही नहीं गुरु को शिष्य की आत्मा में प्रवेश कर उसमें ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करना चाहिये। गुरु की विद्वता शिष्य के लिये वरदान बनती है। दूसरा, वह चरित्रवान होना चाहिये।

इसका सीधा अर्थ यह है कि उसका आचरण ऐसा आदर्श होना चाहिये, जिसका अनुकरण कर शिष्य अपने जीवन को भी उत्कृष्टता की ओर ले जा सके। गुरु स्वयं उच्च आदर्शों का उत्कृष्ट उदाहरण होना चाहिये। उसके ज्ञान, इच्छा एवं क्रिया में कोई भिन्नता नहीं होनी चाहिये। जो वह कहे, वह स्वयं वैसा ही आचरण करे तभी शिष्य के सम्मान का पात्र बन सकेगा। तीसरा, उसका प्रत्येक शिष्य के साथ पितृवत व्यवहार होना चाहिये। प्रत्येक शिष्य के प्रति स्वाभाविक प्रेम तथा उसे आगे बढ़ाने की भावना शिष्यों को उसमें दिखायी देनी चाहिये। उसे स्वार्थवश ज्ञान बेचने का व्यवसाय नहीं करना चाहिये तथा अपने सम्पूर्ण जीवन को निष्पाप बनाने का प्रयास करना चाहिये। स्वामीजी का मत था कि गुरु के प्रति शिष्य की अटूट श्रद्धा होनी चाहिये, पर वह श्रद्धा अन्ध-भक्ति नहीं हो, बल्कि समझ के साथ उत्पन्न होनी चाहिये।

विवेकानन्द के अनुसार जीवन के शाश्वत सिद्धान्त

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार जीवन के शाश्वत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-

(1) आत्मा की अमरता, (2) कृतज्ञता एवं विनम्रता का आचरण करना, (3) माता-पिता एवं गुरु का सदैव ऋणी रहना, (4) प्राणीमात्र में परमात्मा के दर्शन कर, सबके प्रति मैत्रीभाव रखना, (5) जीवन में कर्तव्य या कर्म करना (कष्ट उठाकर भी), (6) परमात्मा की सत्ता पर अटूट श्रद्धा ।


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