साइबर सुरक्षा एवं साइबर अपराध / साइबर नियम से जुड़े कानून

आज का युग कम्प्यूटर का युग है। आज के जीवन मे सभी को कम्प्यूटर की बेसिक जानकारी होनी चाहिए। बहुत सी प्रतियोगी परीक्षाओं में भी कम्प्यूटर से सम्बंधित प्रश्न पूछे जाते हैं। इसीलिए हमारी साइट hindiamrit.com कम्प्यूटर से जुड़ी समस्त महत्वपूर्ण टॉपिक की श्रृंखला पेश करती है,जो आपके लिए अति महत्वपूर्ण साबित होगी,ऐसी हमारी आशा है। अतः आज का हमारा टॉपिक साइबर सुरक्षा एवं साइबर अपराध / साइबर नियम से जुड़े कानून की जानकारी प्रदान करना है।

साइबर सुरक्षा एवं साइबर अपराध / साइबर नियम से जुड़े कानून

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साइबर सुरक्षा से आशय है कि “एक ऐसी व्यवस्था जिसमें इन्टरनेट संचालन प्रक्रिया (कम्प्यूटर द्वारा) को सुरक्षित किया जाता है।”
वर्तमान में साइबर सुरक्षा की ओर सरकार ने अपना कड़ा दृष्टिकोण अपनाया है। वह नित्य नये अधिनियमों तथा कानूनों का निर्माण करती जा रही है। जिससे कि इस कुकृत्य को रोका जा सके। साइबर सुरक्षा को और विस्तार रूप में समझने के लिए इसकी जड़, साइबर अपराध को समझना अत्यन्त आवश्यक है।

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साइबर अपराध (Cyber Crimes)

सरल शब्दों में कह सकते हैं कि साइबर अपराध गैरकानूनी कृत्य हैं जिसमें कम्प्यूटर या तो एक उपकरण या लक्ष्य या दोनों है। साइबर अपराध पारम्परिक प्रकृति के होते हैं जैसे चोरी, धोखाधड़ी, जालसाजी, मानहानि और शरारत, जो भारतीय दण्ड संहिता के अधीन हैं। कम्प्यूटर के दुरुपयोग ने भी आपराधिक गतिविधियों में समाविष्ट होकर नवयुगीन अपराधों के एक स्वर को जन्म दिया है जिन्हें सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 द्वारा सम्बोधित किया जा रहा है। हम साइबर अपराधों को दो तरह वर्गीकृत कर सकते हैं-

(1) एक लक्ष्य के रूप में कम्प्यूटर-अन्य कम्प्यूटरों पर आक्रमण करने के लिए एक कम्प्यूटर का उपयोग करना। उदाहरणार्थ-हैकिंग, वायरस/वर्मस्, आक्रमण, DOS आक्रमण आदि।

(2) एक शस्त्र के रूप में कम्प्यूटर-वास्तविक विश्व अपराध करने के लिए एक कम्प्यूटर का उपयोग करना। उदाहरणार्थ-साइबर आतंकवाद, बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के उल्लंघन/आई.पी.आर. वायोलेशन्स, क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी, ईएफटी धोखाधड़ी,अश्लीलता आदि।

आप साइबर अपराध को जानने के बाद ही व्यक्ति, सरकार तथा अन्य साइबर सुरक्षा के लिए तैयार हो सकते हैं। साइबर सुरक्षा के अन्तर्गत हमें कम्प्यूटर सिस्टमों की हैकिंग को रोकने के लिए कदम उठाने होंगे। जैसे-वायरस द्वारा हैकिंग से बचने के लिए एन्टीवायरसों का प्रयोग करना।

साइबर नियम (Cyber Laws)

साइबर कानून (साइबर लॉ भी कहलाता है) एक शब्द है जिसका उपयोग संचार प्रौद्योगिकी सम्बन्धित कानूनी मुद्दों का, विशेष रूप से “साइबरस्पेस” का अर्थात् इन्टरनेट का वर्णन करने के लिए किया जाता है। यह सम्पत्ति या संविदा की तरह कानून का एक संक्षिप्त मार्ग है क्योंकि यह कई कानूनी क्षेत्रों का एक चौराहा है जिसमें बौद्धिक सम्पदा, गोपनीयता, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और अधिकारिता का समावेश है। संक्षेप में, साइबर कानून इन्टरनेट पर मानव गतिविधि द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों को कानून की भौतिक दुनिया के लिए लागू करने की न्याय प्रणाली के साथ एकीकृत करने का एक प्रयास है।

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2010 का साइबर सुरक्षा अधिनियम 1 अप्रैल, 2009 को, सीनेटर जे. रॉकफेलर (डी-डब्ल्यू.वी.) ने सीनेट में “2009 का साइबरसिक्युरिटी एक्ट-एस. 773” (पूरा पाठ) पेश किया, सीनेटर एवान बेह (डी-इन), बारबरा मिकुल्स्की (डी-एमडी), बिल नेल्सन (डी-एफएल) और ओलिम्पिया स्नोवे (आर-एमई) के लिखे विधेयक को वाणिज्य, सिज्ञान और परिवहन की समिति के पास भेज दिया गया। जिसने 24 मार्च, 2010 को उस विधेयक का संशोधित संस्करण (“2010 का साइबरसिक्युरिटी एक्ट) स्वीकृत किया।

विधेयक साइबर सुरक्षा के मामलों में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग को बढ़ाना चाहता है, खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी संरचना वाली उन निजी कम्पनियों के लिए (राष्ट्रपति के राष्ट्रीय सुरक्षा व आतंकवाद विरोधी सहायक जॉन ब्रेनन के बयान का विधेयक उल्लेख करता है, “हमारे देश की सुरक्षा और आर्थिक सम्पन्नता सुरक्षा, स्थिरता और संचार व सूचना संरचना पर निर्भर करती है, जो विश्व स्तर पर मुखयतः निजी स्वामित्व में है” और “साइबर कैटरिना” का देश द्वारा सामना किये जाने की बात की गयी है।

साथ ही साइबर सुरक्षा मामले में लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाना और साइबर सुरक्षा शोध को प्रोत्साहित करना और धन प्रदान करना इस विधेयक का उद्देश्य है। विधेयक के सबसे विवादास्पद भागों में परिच्छेद 315 शामिल है, जो राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि वह “किसी भी संघीय सरकार या अमेरिका की महत्वपूर्ण संरचनात्मक सूचना प्रणाली या नेटवर्क की इन्टरनेट आवाजाही को सीमित करने या बन्द करने का आदेश दे सकता है। अमेरिका स्थित एक अन्तर्राष्ट्रीय अलाभकारी डिजीटल अधिकार पैरोकार और कानूनी संस्था इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन ने विधेयक को एक “संभावित खतरनाक रवैया” बताते हुए कहा है कि “यह संयमी प्रतिक्रिया के बजाय नाटकीयता को बढ़ावा देता है।”

अन्तर्राष्ट्रीय साइबर अपराध रिर्पोटिंग और सहयोग अधिनियम

25 मार्च, 2010 को, प्रतिनिधि वेत्ते क्लार्क (डी-एनवाई) ने प्रतिनिधि सभा में “इन्टरनेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग एण्ड को-ऑपरेशन एक्ट-एच. आर. 4962” पेश किया; सात अन्य प्रतिनिधियों (उनमें से सिर्फ एक रिपब्लिकन थे) द्वारा सह-प्रायोजित विधेयक को तीन हाउस समितियों के पास भेज दिया गया। विधेयक ने यह सुनिश्चित करना चाहा था कि सूचना के बुनियादी ढाँचे, साइबर क्राइम और विश्वव्यापी स्तर पर उपयोगकर्ता के संरक्षण के बारे में प्रशासन कांग्रेस को सूचित करता रहेगा। इसने “उन देशों को साइबर अपराध के सिलसिले में कानूनी, न्यायिक और प्रवर्तन क्षमताओं में मदद को प्राथमिकता देने के लिए राष्ट्रपति को निर्देश दिया, जिनके सूचना और संचार प्रौद्योगिकी विकास के स्तर निम्न श्रेणी के हैं या जो अपने महत्वपूर्ण बुनियादी संरचना, दूरसंचार प्रणाली और वित्तीय उद्योगों के उपयोग के मामले में पिछड़े हुए हैं।

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इसके अलावा “साइबर मामले” के देशों के लिए एक कार्यवाई योजना और एक वार्षिक अनुपालन मूल्यांकन विकसित करने का भी निर्देश दिया।

साइबरस्पेस की रक्षा के लिए 2010 का नेशनल एसेट एक्ट 19 जून, 2010 को, संयुक्त राज्य अमेरिका के सीनेटर जो. लीबरमैन ने “2010 का प्रोटेक्टिंग साइबरस्पेस ऐज ए नेशनल एसेट एक्ट-एस. 3480″ पेश किया, जिसे उन्होंने सीनेटर सुजन कोलिन्स (आर-एमई) तथा सीनेटर थॉमस कारपर (डी-डीई) के साथ मिलकर लिखा था। यह विवादास्पद विधेयक, जिसे अमेरिकी मीडिया “किल स्विच बिल” कहती है, के कानून बन जाने से राष्ट्रपति को इन्टरनेट पर आपातकालीन अधिकार मिल जाएंगे, हालाँकि, विधेयक के तीनों लेखकों ने एक बयान में दावा किया है कि इसके बजाय विधेयक से “दूरसंचार नेटवर्क पर राष्ट्रपति के मौजूदा व्यापक अधिकार कम हो जाएँगे”।

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