गणित शिक्षण में मूल्यांकन : उपचारात्मक एवं निदानात्मक परीक्षण   | CTET MATH PEDAGOGY

दोस्तों अगर आप CTET परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो CTET में 50% प्रश्न तो सम्मिलित विषय के शिक्षणशास्त्र से ही पूछे जाते हैं। आज हमारी वेबसाइट hindiamrit.com आपके लिए गणित विषय के शिक्षणशास्त्र से सम्बंधित प्रमुख टॉपिक की श्रृंखला लेकर आई है। हमारा आज का टॉपिक गणित शिक्षण में मूल्यांकन : उपचारात्मक एवं निदानात्मक परीक्षण   | CTET MATH PEDAGOGY है।

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गणित शिक्षण में मूल्यांकन : उपचारात्मक एवं निदानात्मक परीक्षण   | CTET MATH PEDAGOGY

गणित शिक्षण में मूल्यांकन : उपचारात्मक एवं निदानात्मक परीक्षण   | CTET MATH PEDAGOGY
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मूल्यांकन का अर्थ

मूल्यांकन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा अधिगम की उपलब्धि का पता लगाया जाता है अर्थात् शिक्षार्थियों ने प्राप्त ज्ञान को किस सीमा तक समझा है, उनकी बुद्धि का स्तर क्या है, उनकी. अभिरुचि क्या है आदि का पता लगाया जाता है। बालक की शिक्षा में मूल्यांकन और मापन दोनों महत्वपूर्ण हैं। मूल्यांकन मापन पर निर्भर करता है।

गणित में मूल्यांकन का उद्देश्य

मूल्यांकन के उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

(1) छात्रों की उपलिब्ध का पता लगाना
(2) छात्रों के विकास को निरन्तर गति देना
(3) छात्रों के योग्यताओं, कुशलताओं, रुचियों आदि का पता लगाना
(4) छात्रों का वर्गीकरण करना
(5) छात्रों की कठिनाइयों, विफलताओं और असफलताओं का पता लगाना
(6) छात्रों के सीखने हेतु उपचारात्मक व्यवस्था प्रदान करना
(7) शिक्षकों को कुशलता एवं सफलता का पता लगाना
(8) अध्ययन-अध्यापन को प्रभावशाली बनाना

गणित में सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन

मूल्यांकन अध्यापन एवं अधिगम प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है। शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का अन्तिम सोपान मूल्यांकन ही है। सी.बी.एस.ई. ने अध्ययन-अध्यापन के मूल्यांकन हेतु सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन की अनुशंसा की है।

इस मूल्यांकन के दो भाव है – सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन।

गणित में सतत् मूल्यांकन

इस मूल्यांकन द्वारा शिक्षार्थी का सर्वांगीण विकास होता है। अधिगम एक सतत् प्रक्रिया है अर्थात् यह एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। इसलिए शिक्षार्थियों का मूल्यांकन भी निरन्तर होना चाहिए। शिक्षार्थी का सतत् मूल्यांकन तीन प्रकार से होता है
निदानात्मक मूल्यांकन
रचनात्मक मूल्यांकन
संकलनात्मक मूल्यांकन

निदानात्मक मूल्यांकन

जिन शिक्षार्थियों में अधिगम की प्रगति आशानुरूप नहीं होती है ऐसे शिक्षार्थियों में अधिगम संबंधी समस्याओं का विश्लेषण करने के लिए इस मूल्यांकन का प्रयोग किया जाता है तथा इसके उपरान्त उन्हें उपचारात्मक शिक्षण प्रदान किया जाता है।

रचनात्मक मूल्यांकन

इस मूल्यांकन के द्वारा अधिगम की प्रगति का आकलन एवं निर्धारण किया जाता है। इस मूल्यांकन से प्राप्त परिणामों के आधार पर शिक्षार्थियों को फीडबैक दिया जाता है। इस मूल्यांकन हेतु गृह कार्य, क्लास टेस्ट, दत्त कार्य, क्वीज टेस्ट आदि का प्रयोग किया जाता है। इस मूल्यांकन से शिक्षक अपने शिक्षण विधि एवं शिक्षार्थी अपने संज्ञानात्मक व्यवहार में सुधार करते हैं।

संकलनात्मक मूल्यांकन

यह मूल्यांकन संपूर्ण सत्र की समाप्ति के बाद किया जाता है। इस मूल्यांकन का उद्देश्य अधिगम प्रगति और शैक्षिक उपलब्धि का आकलन करना होता है।

गणित में व्यापक मूल्यांकन

देखिये सतत् मूल्यांकन शिक्षार्थी के व्यवहार के सिर्फ एक पक्ष संज्ञानात्मक पक्ष का मूल्यांकन करता है। परन्तु व्यापक मूल्यांकन के द्वारा शिक्षार्थियों के व्यवहार के तीनों पक्षों संज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक का मूल्यांकन होता है। इस मूल्यांकन के द्वारा शैक्षिक एवं गैर-शैक्षिक पक्षों का मूल्यांकन होता है।

सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन का महत्व

सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन के महत्व निम्नलिखित हैं:

(1) शैक्षिक एवं गैर-शैक्षिक दोनों पक्षों का मूल्यांकन होता है। (2) शिक्षार्थियों की कमजोरी को पहचान कर उसका निदान बताया जाता है।
(3) उपलब्धि स्तर को निरन्तर बनाये रखने व और ऊँचा उठाने के लिए प्रेरित करता है।
(4) उपचारात्मक शिक्षण विधि का प्रयोग कर शिक्षार्थियों की समस्याओं का समाधान किया जाता है।
(5) शिक्षार्थियों के लिए प्रेरणा का कार्य करता है तांकि अधिगम प्रक्रिया में रुचि उत्पन्न हो।
(6) शिक्षक को सही कार्य नीति बनाने में मदद करता है।
(7) नवीन परीक्षण तकनीकियों को खोजने के लिए प्रेरित करता है।
विद्यालय व्यवस्था की जाँच करता है। शिक्षार्थियों के सर्वांगीण विकास पर बल देता है।
(8) निरन्तर मूल्यांकन होते रहने से शिक्षार्थियों में परीक्षा का अनावश्यक भय नहीं होता है।

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सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन की विधियाँ/ तकनीकी

सतत् एवं व्यापक मूल्यांकन की विधियों तकनीके निम्नलिखित हैं:

(1) साक्षात्कार

इस विधि के द्वारा शिक्षार्थियों के आन्तरिक विचारों को जाना जाता है। इस विधि के द्वारा शिक्षार्थियों के विचार एवं दैनिक जीवन के प्रयोग व अधिगम किये गए ज्ञान को जाना जा सकता है।

(2) प्रश्नावली / प्रश्नोत्तर

इस विधि में शिक्षार्थियों को प्रश्नों की एक सुनियोजित सूची दी जाती हैं जिनका उन्हें उत्तर देना होता है, तत्पश्चात् मूल्यांकन किया जाता है।
इसका प्रयोग शाब्दिक व चित्रात्मक दोनों रूपों में होता है।
यह विधि शिक्षार्थियों में सीखने की जिज्ञासा उत्पन्न करती है।

(3) निरीक्षण / पर्यवेक्षण

शिक्षार्थियों के मूल्यांकन के लिए यह विधि अत्यन्त उपयोगी है।
इस विधि के द्वारा व्यक्तिगत या सामूहिक या दोनों का अध्ययन किया जाता है। इस विधि के द्वारा मूल्यांकन प्राकृतिक परिस्थिति में किया जाता है। इस विधि के द्वारा शिक्षार्थियों के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों का मूल्यांकन किया जाता है। यह विधि वस्तुनष्ठि, निश्चित, क्रमबद्ध, प्रमाणिक और विश्वसनीय है। शिक्षक बालकों को कुछ ऐसे दत्त कार्य देता है जिसके द्वारा बालकों में सृजनात्मकता, मौलिकता, संज्ञानात्मकता आदि गुणों का पता चल सके। यह विधि शिक्षार्थियों में विस्तारित अधिगम के लिए चुनौतियाँ एवं उत्तेजना उत्पन्न करती है।
यह विधि शिक्षार्थियों को सूचना, खोजने और अपने विचारों का निर्माण करने में मदद करती है।

(4) पोर्टफोलियो

यह प्राथमिक स्तर पर शिक्षार्थियों का आकलन करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है।
पोर्टफोलियों में निम्नलिखित चीजें होती हैं
(1) बच्चे द्वारा बनाये गये चित्र (2) बच्चे का चित्र
(3) स्व-आकलन शीट (कार्य-पत्रक) (4) अभिभावक आकलन शीट
(5) सहपाठी आकलन शीट (6) इससे बच्चे की सम्पूर्ण वृद्धि एवं उसके विकास का आकलन होता है।

(5) क्विज प्रतियोगिता

इनके द्वारा बच्चे का ज्ञान सहयोग की भावना और प्रजातान्त्रिक गुणों का आकलन होता है।

(6) चेक लिस्ट

इस से बालक के एक विशेष विषय के विशेष सूचना का पता चलता है। इसमें उत्तर ‘हाँ’ या ‘न’ में होता है।

(7) सावधिक परीक्षा

यह अधिगम के दौरान किया जाता है। इस से तुरंत पता चल जाता है कि अधिगम सही तरीके से हो रहा है या नहीं। इस विधि का सतत् मूल्यांकन के लिए उपयोग किया जाता है।

(8) वार्षिक परीक्षा

यह सत्र समाप्ति के बाद होता है। यह व्यापक मूल्यांकन के लिए उपयोगी है।

(9) परियोजना कार्य

इनमें आंकड़े एकत्र कर उनका विश्लेषण किया जाता है। ये एकल या समूह परियोजनाएं दोनों हो सकती हैं। ये पाठ्य पुस्तक या बाहर के प्रसंगों आधारित होती हैं और जिनका संबंध बच्चे के पर्यावरण/ संस्कृति/जीवनशैली/समुदाय आधारित क्रियाकलापों से होता है। ये किसी बच्चे के स्वयं पता लगाने एवं कार्य करने का अवसर प्रदान करती है। ये सामूहिक कार्य, आदान-प्रदान और एक-दूसरे से सीखने के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति का विकास करने में सहायक होता है।

एक अच्छे परीक्षण की विशेषताएँ

शिक्षार्थी के मूल्यांकन हेतु तैयार किये गए एक अच्छे परीक्षण में निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए:

(1) वैधता

जो परीक्षण अधिगम के उद्देश्यों की पूर्ति करे यह वैध मानी जाती है। अतः जो परीक्षण के उद्देश्यों को जितना पूर्ण करेगा उसकी वैधता उतनी अधिक होगी।

(2) विश्वसनीयता

एक ही परिस्थिति परीक्षण या मूल्यांकन का परिणाम लगभग एक जैसा हो, तो परीक्षण विश्वसनीय माना जाता है।

(3) वस्तुनिष्ठता

एक अच्छे परीक्षण को विश्वसनीय बनाने के लिए उसमें वस्तुनिष्ठ प्रश्न होने चाहिए। इससे विषय-वस्तु की तथ्यता का सही आकलन होता है।

(4) व्यावहारिकता

ऐसा परीक्षण जो केवल पुस्तकीय ज्ञान का मूल्यांकन न करे अपितु व्यावहारिक ज्ञान का भी मूल्यांकन करे, व्यावहारिक माना जाता है।

गणित शिक्षण में मूल्यांकन

(1) शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति का ज्ञान कराना
(2) छात्रों की कठिनाइयों का ज्ञान कराना।
(3) अधिगम के लिए प्रेरणा देना।
(4) भावी सफलता का अनुमान लगाना।
(5) परिश्रम के लिए प्रेरणा देना।
(6) व्यक्तिगत एवं सामूहिक मार्गदर्शन देना।
(7) पाठ्यक्रम में संशोधन कराना।
(8) शिक्षण पद्धति में सुधार कराना।
(9) शिक्षक योग्यता का मानदण्ड कराना।
(10) छात्रों या विद्यालयों की तुलना कराना।

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निदानात्मक परीक्षण का अर्थ

शिक्षा क्षेत्र में निदान का अर्थ उस प्रक्रिया से है, जिससे हम शिक्षा संबंधी समस्याओं के मूल कारणों की खोज एवं निवारण का निर्णय करते हैं। गणित में विद्यार्थियों की कमजोरियों का निदान करने हेतु जो परीक्षण किए जाते हैं उन्हें निदानात्मक परीक्षण कहते हैं। इसमें यह जानने की कोशिश की जाती है कि बालक किन परिस्थितियों में गलतियाँ करता है, गलती करने का कारण क्या है, तथा गलतियाँ किस प्रकार की हैं इत्यादि । निदान का कार्य प्रारंभ से ही होना चाहिए। निदानात्मक कार्य प्रत्येक प्रकरण के पश्चात् करना चाहिए, जिससे उसका उपचार या निदान उसी समय किया जा सके। अध्यापक जो भी परीक्षण कक्षा-कक्ष में करता है, वह निदानात्मक परीक्षण ही होता है। निदानात्मक परीक्षण की सहायता से अध्यापक प्रत्येक विद्यार्थी को उनकी कमजोरियों एवं योग्यताओं के अनुसार एक क्रमबद्ध रूप से विभिन्न वर्गों में वर्गीकृत कर सकता है।

निदानात्मक परीक्षण के उद्देश्य

(1) गणित विषय में कमजोर व पिछड़े विद्यार्थियों की पहचान करना। (2) गणित पाठ्यक्रम में बदलाव लाना व इसे बाल केन्द्रित बनाना।
(3) विद्यार्थियों के विषय संबंधी विकास में रुकावट आने वाले तत्वों को जानना तथा उपचारात्मक सुझाव देना।
(4) अध्ययन पद्धतियों का दिशा-निर्देशन करना।
(5) विद्यार्थियों की कमजोरियों, गलतियों व विशेषताओं की पहचान करना।
(6) गणित की अध्ययन-अध्यापन प्रणाली के दोषों को दूर करना।।
(7) गणित को अधिगम प्रक्रिया व अधिगम अनुभव में बाधक तत्त्वों को पहचानकर उनका उपचार करना।

गणित में छात्रों द्वारा की जाने वाली गलतियाँ

(1) गुणा या भाग करते समय हासिल का गलत प्रयोग ।
(2) विद्यार्थियों द्वारा गणित में प्रयोग होने वाले चिन्हों का गलत प्रयोग।
(3) औसत प्रतिशत, L.C.M.. H.C.F. में अंतर स्पष्ट करने के अयोग्य ज्यामिति के चित्रों की गलत बनावट भिन्नों के संबंध में हर तथा अंश का गलत प्रयोग
(4) गणित के उपकरणों का गलत प्रयोग
(5) भिन्न-भिन्न गणित के तथ्यों में समानता तथा अंतर का गलत प्रयोग दो या अधिक प्रत्ययों में गलत अंतर

उपचारात्मक शिक्षण का अर्थ

यह शिक्षण एक ऐसा कार्य है, जो विद्यार्थियों की सामान्य या विशिष्ट अधिगम कमजोरियों को खत्म करने के लिए किया जाता है।

उपचारात्मक शिक्षण के उद्देश्य

(i) छात्रों को दूषित मनोवृत्तियों एवं आदतों को समाप्त करना।
(ii) छात्रों में गणित शिक्षण के प्रति रुचि पैदा करना।
(iii) छात्रों में प्रगतिशील आदतों का विकास करना।
(iv) छात्रों के चरित्र एवं मनोबल को विकसित करना।
(v) छात्रों के समक्ष सीखते समय आने वाली कठिनाइयों को दूर करना।
(vi) छात्रों में आत्म-विश्वास पैदा करना। छात्रों की मानसिक उलझनों को सुलझाना
(vii) छात्रों में सच्चे ज्ञान की पूर्ति करना ।

उपचारात्मक शिक्षण की विधियाँ

(1) सामूहिक विधि

(1) सभी छात्रों का एक साथ उपचार करना।
(2) छात्रों द्वारा की गई सामान्य अशुद्धियों को अलग कर लेना चाहिए। चॉक बोर्ड के माध्यम से उन अशुद्धियों को सुधारना चाहिए।

(2) व्यक्तिगत विधि

(1) व्यक्तिगत उपचार में विद्यार्थियों की व्यक्तिगत विभिन्नता का ध्यान रखना चाहिए।
(2) व्यक्तिगत अध्ययन करना चाहिए तथा उपचार गृह-पद्धति का सहारा लेना चाहिए।
(3) उपचार करते समय परिस्थिति, मजबूरियों एवं वातावरण का ध्यान रखना चाहिए।
(4) प्रेम एवं सहानुभूति के साथ व्यक्तिगत उपचार करना चाहिए। कक्षा के छात्र अलग-अलग ढंग से गलतियाँ करते हैं, इसलिए उपचार भी अलग-अलग ढंग से किया जाना चाहिए।

उपलब्धि परीक्षण का अर्थ

किसी विद्यार्थी की किसी विशेष क्षेत्र में प्राप्त की गई उपलब्धियों व सफलताओं को मापने या जांचने हेतु जो परीक्षा आयोजित की जाती है, उसे उपलब्धि परीक्षण कहते हैं। उपलब्धि परीक्षण से हम पता लगा सकते हैं कि विद्यार्थी ने शिक्षण में कितनी प्रगति और सफलता प्राप्त की है।

उपलब्धि परीक्षण के उद्देश्य

(1) विद्यार्थियों में कुछ नया सीखने की भावना को विकसित करना। (2) विभिन्न विषयों एवं क्रियाओं में विद्यार्थियों की वास्तविक स्थिति का आकलन करना।
(3) ये पता लगाना कि विद्यार्थियों ने शिक्षण के उद्देश्यों को प्राप्त किया है या नहीं।
(4) विद्यार्थियों के अध्ययन में आने वाली समस्याओं एवं बाधाओं का पता लगाना।
(5) विद्यार्थियों को शिक्षण में दिए गए ज्ञान के प्रशिक्षण का मूल्यांकन करना।
(6) विद्यार्थियों के अधिगम को निर्देशित करना ।
(7) विद्यार्थियों के भविष्य में रोजगार दिलाने में सहायता करना।

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उपलब्धि परीक्षण की विशेषताएँ

(1) इन परीक्षणों की पाठ्य सामग्री व्यापक होती है।
(2) इन परीक्षणों की विषय-वस्तु विद्यार्थियों की आयु योग्यता, क्षमता एवं रुचि के अनुसार होती है।
(3) इन परीक्षाओं के उद्देश्य पूर्व निर्धारित होते हैं।
(4) इन परीक्षणों में विश्वसनीयता एवं वैधता पर ध्यान दिया जाता है।
(5) इन परीक्षणों का निर्माण, प्रशासन, अंकन, मापन, समय-सीमा इत्यादि पूर्व निश्चित होते हैं। उपलब्धि परीक्षा व्यावहारिक रूप से उपयोगी होती है।
(6) ये परीक्षाएं भिन्न-भिन्न कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए भिन्न-भिन्न बनाई जाती हैं। इन परीक्षाओं में अधिकतर प्रश्न वस्तुनिष्ठ होते हैं।

उपलब्धि परीक्षण के प्रकार

उपलब्धि परीक्षण दो प्रकार के होते हैं- मानकीकृत और अध्यापक कृत उपलब्धि परीक्षण।

मानकीकृत परीक्षण: इन परीक्षणों की सामग्री, व्यवस्था, व्याख्या विशेष वर्ग तथा विशिष्ट स्तर के लिए निश्चित होती है। मानकीकृत उपलब्धि परीक्षण का प्रयोग विद्यार्थी की उपलब्धियों को मापने के लिए किया जाता है।

अध्यापक-कृत उपलब्धि परीक्षण: अध्यापक-कृत परीक्षण स्वयं अध्यापकों द्वारा अनौपचारिक रूप से किए जाते हैं ये परीक्षण लिखित, मौखिक एवं प्रयोगात्मक रूप में भी हो सकते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न (खुद को जांचिए) –

1. निम्नलिखित में से कौन-सा खुले अन्त वाला प्रश्न है ?

(a) आप 15 को 3 से गुणा किस प्रकार करेंगे ?
(b) कोई दो संख्याएँ लिखिए जिनका गुणनफल 45 हो ?
(c) संख्या रेखा का प्रयोग करते हुए ‘3 बार 15’ का मान ज्ञात कीजिए
(d) 15 × 3 का मान ज्ञात कीजिए

2. प्राथमिक अवस्था में गणित में रचनात्मक मूल्यांकन में अन्तर्निहित है:

(a) विद्यार्थियों के ग्रेड (श्रेणी) और रैंक (स्थिति)
(b) अधिगम में असंगति को और शिक्षण में कमियों को पहचानना
(c) सामान्य त्रुटियों को पहचानना
(d) क्रियाप्रणाली के ज्ञान और विश्लेषणात्मक प्रतिभाओं की परीक्षा

3. निम्नलिखित में से कौन-सा गणित में निदानात्मक परीक्षण का उद्देश्य नहीं है ?

(a) बच्चों में अधिगम के दौरान कमियों व कमजोरियों को ज्ञात करना
(b) बच्चों की प्रगति रिपोर्ट भरना
(c) अभिभावकों को प्रतिपुष्टि देना
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

4. मूल्यांकन किया जाता है

(a) उपलब्धि की जाँच करने के लिए
(b) अस्पष्ट अवधारणाओं का पता लगाने के लिए
(c) कक्षा में प्रोन्नति के लिए
(d) प्रतियोगिता की भावना जागृत करने के लिए

5. गणित-मूल्यांकन में कौन-सा पद शामिल होता है ?

(a) उद्देश्य
(b) अधिगम अनुभव
(c) मूल्यांकन
(d) ये सभी

6.कक्षा में बच्चों के मूल्यांकन का मुख्य उद्देश्य है:

(a) बच्चों का आत्मविश्वास बढ़े
(b) बच्चों के तुलनात्मक प्राविण्यता की जानकारी शिक्षक को प्राप्त
(c) बच्चों के विषय ज्ञान में समझ बढ़े
(d) बच्चे कक्षा में नियमित रहें

7. भिन्नों का योग पढ़ाते समय शिक्षक को नीचे दी हुई एक त्रुटि ज्ञात हुई इस स्थिति में उपचारात्मक कार्य के रूप में क्या करना चाहिए?

(a) लघुत्तम समापवर्त्य की अवधारणा को समझने में बच्चों की सहायता करें
(b) बच्चों से कहें कि वे अधिक-से-अधिक अभ्यास करें
(c) इसमें अधिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए क्योंकि बच्चे जैसे बड़े होंगे समझ जाएँगे
(d) प्रत्येक भिन्न के परिमाण को समझने में बच्चों की सहायता करें।

उत्तरमाला – 1. (a)    2. (b)      3. (b)      4. (a)
5. (d)    6. (b)      7. (a)


                         ◆◆◆ निवेदन ◆◆◆

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