गिजूभाई बधेका का शिक्षा दर्शन | गिजूभाई के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधियां

बीटीसी एवं सुपरटेट की परीक्षा में शामिल शिक्षण कौशल के विषय वर्तमान भारतीय समाज एवं प्रारंभिक शिक्षा में सम्मिलित चैप्टर गिजूभाई बधेका का शिक्षा दर्शन | गिजूभाई के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधियां आज हमारी वेबसाइट hindiamrit.com का टॉपिक हैं।

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गिजूभाई बधेका का जीवन परिचय (1885-1939)

देश के अग्रणी शिक्षाविद गिजुभाई बधेका का जन्म 15 नवम्बर सन् 1885 को गाँव सौराष्ट्र में हुआ था। अपने बचपन की यातनापूर्ण शिक्षा चितल का उनके मन-मस्तिष्क पर भारी दबाव पड़ा। गिजूभाई ने अपनी उच्च शिक्षा मुम्बई में प्राप्त की। उन्होंने कानून की पढ़ायी पूरी की थी। सन् 1915 में वे श्री दक्षिणामूर्ति भवन में कानूनी सलाहकार बने और सन् 1920 में उन्होंने बाल मन्दिर की इसी भवन में स्थापना की तथा वकालत छोड़कर बाल शिक्षण के नये प्रयोगों की दिशा में सक्रिय हुए।

इन्होंने मॉण्टेसरी पद्धति के सिद्धान्तों का गहन अध्ययन किया एवं मनन किया तथा मॉण्टेसरी शिक्षा पद्धति को पूर्णतया आत्मसात् करने के बाद मॉण्टेसरी के सिद्धान्तों को भारतीय परिवेश तथा सन्दर्भ में अधिकाधिक प्रभावी बनाने का प्रयास किया। शिक्षा के क्षेत्र में इस कर्मठ कार्यकर्ता एवं नायक का 54 वर्ष की अल्पायु में 23 जून 1939 को निधन हो गया। बालकों के प्रबल सार्थक, साथी एवं जननायक के
निधन से बालकों की शिक्षा में अपूरणीय क्षति हो गयी।

गिजूभाई की बालकेन्द्रित शैक्षिक विचारधारा


गिजुभाई बालकों की स्वतन्त्रता के समर्थक थे, उनकी यह मान्यता थी कि बालक उन्मुक्त वातावरण में बिना, किसी दबाव के अधिक अच्छे ढंग के शिक्षित किया जा सकता है। आर बालक को डाँट-फटकार से भयभीत रखा जायेगा तो वह अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर सकता। बालक के साथ स्नेह एवं प्रेमपूर्वक व्यवहार ही शिक्षक को रखना चाहिये तभी वह सही दिशा-निर्देश में अपना विकास कर सकता है। बालक को बिना यातना किये। जिस शिक्षक में बालकों के प्रति प्रेम नहीं, सहानुभूति नहीं, वह शिक्षक नहीं है।

बिना प्यार-दुलार के साथ पढ़ने-लिखने के लिये गिजुभाई ने अनेक सफल प्रयोग शिक्षण कार्य को अगर कार्यन मानकर सेवा का कार्य माना जाय तो शिक्षक अपने कार्य को अधिक निष्ठा एवं लगन से कर सकता है। इस सम्बन्ध में गिजूभाई ने कहा कि “हमारे जीवन की पाठशाला में अध्ययन हेतु ऐसे प्रणाली को अपनायें ताकि उसमें सेवा की भावना, रात-दिन विकसित होती रहे।” बाल शिक्षण के लिये समर्पित गिजूभाई बालकों के सच्चे हमदर्द और मसीहा थे। आदर्श शिक्षक के होने के साथ-साथ वे एक महान शिक्षाविद्, चिन्तक विचारक और लेखक भी थे।

गिजूभाई ने मॉण्टेसरी शिक्षा पद्धति का गहन चिन्तन एवं मनन किया। मॉण्टेसरी शिक्षा पद्धति को पूर्णतया आत्मसात् करने के बाद उन्होंने उसके सिद्धान्तों को भारतीय सन्दर्भ में पूर्णतया अपनाने का प्रयास किया। आयु वर्ग के अनुसार बालकों के लिये अनेकानेक रोचक गतिविधियों का सूत्रपात करने में भी गिजूभाई को आशा पीकर अमर से अधिक सफलता प्राप्त हुई। माता-पिता और शिक्षक-शिक्षिकाओं का सही मानस बनाने के लिये उन्होंने गुजराती में एक छोटी शिक्षण पत्रिका निकाली थी। गुजराती की ही भाँति इस पत्रिका के मराठी और हिन्दी संस्करण भी निकलते रहे। इस पत्रिका में बाल सांगोपांग, बाल शिक्षण, बाल संस्कार और बाल जीवन के मर्म की शिक्षा के बारे में लिखा जाता था। उससे हजारों परिवारों में प्रकाश फैला और हजारों बालक संस्कारित हुए।

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उनके इस साहित्य में जो मौलिकता, मर्मस्पर्शता, सरलता, प्रेरणा और चिन्तन प्राप्त होता है, वह अन्य मौलिक विचारों में प्राप्त नहीं होता और इसी कारण गिजूभाई सदैव अस्मरणीय रहेंगे और आज वे अमृत बन गये। बाल शिक्षा के जगत में गिजूभाई की एक अनुपम कृति है दिवास्वप्न। इस गुजराती पुस्तक का पहला प्रकाशन सन् 1931 में हुआ। दिवास्वप्न की चर्चा करते हुए गिजूभाई के एक समकालीन साथी और सहयोगी स्वर्गीय श्री हरिभाई द्विवेदी ने लिखा है कि “दिवा स्वप्न सचमुच दिव्य है। कला के प्राथमिक शाला की समालोचना इस पुस्तक में प्राप्त होती है। साथ ही साथ भविष्य की नवीन प्राथमिक पाठशाला की मनोहर एवं स्पष्ट रूप की सुन्दर झाँकी मिलती है।”

बालकों के गाँधी गिजूभाई-विद्यार्थी भवन एवं भवन के आचार्य के रूप में 4 वर्ष तक कार्य करने के बाद सन् 1920 में गिजूभाई ने दक्षिणामूर्ति विद्यार्थी भवन में एक बालमन्दिर की स्थापना की। इस बाल मन्दिर में ढाई वर्ष की आयु से लेकर 6 वर्ष की आयु के बालकों को प्रवेश दिया जाता था। गिजूभाई इन बालकों के मध्य रहकर उन्हें शिक्षा प्रदान करते थे। गिजूभाई जीवन भर छोटे-छोटे बालकों के साथ रहकर तन्मयता के साथ उनकी सेवा करते रहे। वे बालकों को ब्रह्म स्वरूप मानते थे। उन्होंने बाल मन्दिर को एक मन्दिर माना और बालों को उस मन्दिर का देवता। गिजूभाई कहते थे बालकों को देवता मानो “बाल देवो भव” ।

गिजूभाई का नारा था बालकों की उपासना करते रहो, उनकी सेवा करते रहो, उन्हें अच्छा जीवन बिताने की कला सिखाते रहो। गिजूभाई ने बालकों में अपने इष्टदेव के दर्शन में किये। बालकों के सुख में सुखी एवं दु:ख में दुःखी होते रहे। बाल देवो भवः के मन्त्र के दृष्टा गिजूभाई ने बाल मन्दिर को उल्लासमय बना दिया। वहाँ के वातावरण में आनन्द का रस घोल दिया।

खेल खिलाना, गाना गाना, काम करना, यन्त्र बजाना, गरबा नृत्य, काल रास रचाना, कविता पाठ करना, कहानी कहना अभिनय करना, प्रश्न एवं नाटक की योजना बनाना, पढ़ना-लिखना एवं बगीचा लगाना। फूल-पौधे लगाना, क्यारी लगाना, घूमना एव प्रकृति के दर्शनकाल आदि उस बाल विद्यालय की प्रमुख क्रियाकलापों और इन सभी के ऊपर बालक सेवा, परोपकार, त्याग, सहयोग, समाजसेवा आदि गुण एवं प्रक्रियाएँ महत्वपूर्ण र्थी। इन सभी कार्यों में गिजूभाई स्वयं साथ-साथ रहते, बालकों को बताते तथा सिखाते और बालकों को प्यार से कार्य में लगाते थे। उनके इन गुणों के कारण बालक उन्हें मूंछे वाली माँ के
रूप में मनाते थे, प्यार करते थे और उन्हें आदर देते थे।

गिजूभाई के अनुसार बालकेन्द्रित पाठ्यक्रम

गिजूभाई के अनुसार पाठ्यक्रम के द्वारा बालकों में विविध अनुभव संचित होने चाहिये-

(1) पाठ्यक्रम के अन्तर्गत विद्यालय के विविध अनुभव एव शाला की बौद्धिक क्रियाओं के द्वारा विविध अनुभव आने चाहिये।

(2) पाठ्यक्रम में स्मरण पर शक्ति पर अधिक महत्व दिया जाना चाहिये।

(3) पाठ्यक्रम के अन्तर्गत बौद्धिक शिक्षण के साथ-साथ शारीरिक शिक्षण को भी उचित स्थान मिलना चाहिये।

(4) पाठ्यक्रम में गिजूभाई आध्यात्मिकता का पुट देना चाहते थे तथा आध्यात्मिकता के माध्यम से सत्य, प्रेम के प्रति निष्ठा जैसे गुणों का विकास करना चाहते थे।

(5) गिजूभाई ने शिक्षण को बालकेन्द्रित बनाने के साथ-साथ तकनीकी के व्यवहारगत् प्रयोगों का भी अनुमोदन स्वतन्त्रता के उपरान्त पाठ्यक्रम को व्यापक अर्थ दिया जाने लगा है।

(6) विद्यालयी पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में गिजूभाई के विचारों की विशेषता यह है कि वे बालकों को अनावश्यक पुस्तकीय भार से तथा विषयों के भार से मुक्त रखना चाहते थे।

(7) उनके द्वारा प्रतिपादित विषय बाल मनोविज्ञान एवं बाल अवस्था के विकास के क्रम के अनुरूप थे। ऐसे ही सुझाव मॉण्टेसरी,  फ्रॉबेल आदि विचारकों ने भी दिये।

गिजूभाई के अनुसार बाल केन्द्रित शिक्षण

शिक्षकों के स्वभाव में समर्पण की भावना पैदा करने के लिये उन्होंने इस बात को पुस्तक में अतिशय, कोमलता और सतर्कता के साथ लिखा है कि शिक्षक को शाला में माता-पिता की भूमिका ही निभानी चाहिये। गिजूभाई का यह मानना था कि बालक के प्रति महत्वाकांक्षी होना चाहिये। गिजूभाई के बाल केन्द्रित शिक्षण की तकनीकी के व्यवहार के प्रयोगों के द्वारा अनुमोदित किये गये। गिजूभाई के अनुसार शिक्षण विधियाँ बालकों के स्तरानुसार, रुचि अनुसार होनी चाहिये। गिजूभाई ने शिक्षण की बालकेन्द्रित विधियों को व्यवहारगत् करके उसे अनुमोदित किया। इनके अनुसार विभिन्न विषयों का शिक्षण निम्नलिखित प्रकार से होना चाहिये-

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1.गिजूभाई के अनुसार मातृभाषा की शिक्षण विधि

गिजूभाई की एक और अनुपम कृति प्राथमिक शाला में भाषा शिक्षण है। इस पुस्तक में एक शिक्षक और बालक के बीच की उस प्रक्रिया की चर्चा है, जिससे बालक के भाषा शिक्षण की बुनियाद तैयार होती है। गिजूभाई के अनुसार पहले वाचन पर बल देना चाहिये इसके पश्चात् लेखन पर। अँगुलियों से कलम पकड़ने का तरीका, पेन्सिल पर काबू, इच्छानुसार मोड़ना और विभिन्न आकृतियों से अक्षर आकृति तक आना लेखन की पहली आवश्यकता है। गिजुभाई के अनुसार लेखन से गति तथा सुनकर सही लिखने की आदत विकसित होती है।

2. गिजूभाई के अनुसार कविता शिक्षण

छात्रों का लोकगीतों के माध्यम से काव्य शिक्षण आरम्भ किया जाना चाहिये। लोकगीतों या ग्राम्य गीतों में स्पष्टता और उचित विषय वस्तु होने के कारण बालक उनकी ओर शीघ्र आकृष्ट होते हैं। बालक के सामने वह कविता रखी जाय जिसकी भाषा बोधगम्य हो। उस कविता की विषय वस्तु वर्णनात्मक या रुचिपूर्ण हो। कविता का परिचय गाकर भी कराया जा सकता है, उसे रटने की आवश्यकता नहीं होती। कविता की रसानुभूति होने पर ही पूर्ण आत्मसात हो जाती है।

जिन कविताओं में क्रिया की प्रधानता होती है; जैसे- गाड़ी, घोड़े, दौड़ना तथा पशु-पक्षियों का धूम-धाम करना आदि कविताएँ बालक पसन्द करते हैं। बालक के क्रियाशील जीवन में क्रियायुक्त गान करने वाली कविताएँ बालक के विकास में विशेष रूप से सहायक होती हैं। बालक में कविता गाने की रुचि पैदा कर देने से कविता सिखाने का आधा काम हो जाता है। गिजूभाई के अनुसार कविता पाठ में आये कठिन शब्दों के अर्थ नहीं लिखवाने चाहिये और न ही अपनी ओर से अर्थ को बताना चाहिये। गाना प्रारम्भ करने से पहले कविता की विषयवस्तु का थोड़े से शब्दों में परिचय देना चाहिये। इससे बालकों को विशेष आनन्द प्रतीत होता है। कविता के भाव विभिन्न मुद्राओं में प्रकट किये जाने चाहिये।

3. गिजूभाई के अनुसार व्याकरण शिक्षण

व्याकरण शिक्षण अकेले या पृथक् । से किये जाने वाला अंश नहीं है। अधिकतर शिक्षक कक्षा शिक्षण में करते हैं। गिजूभाई के अनुसार अनेक शालाओं में व्याकरण शिक्षण का कालांश अलग होता है। ऐसा नहीं होना चाहिये क्योंकि व्याकरण भाषा शिक्षण का ही एक भाग है। पाठ में संज्ञा, क्रिया, सर्वनाम तथा विश्लेषण आदि की पहचान बालक को खेल-खेल में ही करानी चाहिये।

4.गिजूभाई के अनुसार इतिहास और भूगोल शिक्षण

बालकों के लिये कहानी के माध्यम से इतिहास विषय को पढ़ाने से विषय रोचक बन जाता है। कहानी के माध्यम से इतिहास विषय को पढ़ाते समय, शिक्षक को यह ध्यान रखना चाहिये कि मूल घटना के आसपास कल्पित घटनाओं को इस प्रकार सजाकर पढ़ाना चाहिये कि उन्हें वास्तविकता का ध्यान कहानी के माध्यम से ही हो जाये। भूगोल पढ़ाने में ग्लोब तथा मानचित्रों की सहायता लेकर तथ्यों को स्पष्ट करना चाहिये।

5. गिजूभाई के अनुसार चित्रकला शिक्षण

चित्रकला में बालकों को वस्तुओं के नाम या वह वस्तु देकर उनकी आकृति बनाने हेतु कहना चाहिये। प्रारम्भ में उनके चित्र सुन्दर न बन सके परन्तु अभ्यास से वे ठीक चित्र बनान लगेंगे। बाद में उनके पेंसिल से जैसा भी सम्भव हो चित्र बनवाने चाहिये। अच्छे चित्रों को प्रदर्शन हेतु रखवाना चाहिये। इससे बालकों को प्रोत्साहन मिलता है।

6. गिजूभाई के अनुसार धार्मिक शिक्षा

गिजूभाई के अनुसार बालकों की पाठ्य-पुस्तक में महान पुरुषों एवं ईश्वर के चित्र तथा उनके जीवन के प्रसंगों पर कथाएँ होनी चाहिये। धर्म से सम्बन्धित गूढ़ बातों को बालक नहीं समझ पाते। अत: उन्हें कुरान, उपनिषद् की कहानियाँ एवं कथाएँ कही जानी चाहिये। कर्मकाण्ड, श्लोक पाठ, धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन आदि को हम भविष्य के लिये छोड़ सकते हैं।

7.गिजूभाई के अनुसार खेलकूद

गिजूभाई के अनुसार नियत समय पर खेलने-कूदने हेतु बालकों को मुक्त किया जाना चाहिये। खेलने-कूदने का अर्थ खेलना, कूदना तथा मौज- भरना है। इसमें हारने-जीतने का कोई महत्व नहीं होना चाहिये। जीतने वालों को पुरस्कार आदि के वितरण से बालकों में हीन भावनाएँ जागृत हो जाती है।

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गिजूभाई के अनुसार शिक्षण विधियां

शिक्षण विधियों के सम्बन्ध में गिजूभाई के प्रमुख विचार निम्नलिखित प्रकार हैं-

(1) पूर्व विद्यालयी शिक्षण के क्षेत्र में प्रचलित परम्परागत विधियाँ, भाषण एवं पाठ्य- पुस्तक विधि का अन्त होना चाहिये। (2) इस क्षेत्र में परिवर्तन एवं प्रयोग नितान्त आवश्यक हैं। (3) पूर्व विद्यालयी शिक्षण में परिवर्तन की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र शिक्षण विधियों में परिवर्तन है। (4) पूर्व विद्यालयी शिक्षण क्षेत्र में औपचारिक विधियों का कोई स्थान नहीं होना चाहिये। इस क्षेत्र की विधियाँ अनौपचारिक, सहज करके सीखने के सिद्धान्त पर आधारित होनी चाहिये। (5) गिजूभाई ने पूर्व विद्यालयी शिक्षण में मॉण्टेसरी पद्धति को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना है तथा इसे बालक के सम्पूर्ण विकास के लिये उपयुक्त समझा है। (6) पूर्व विद्यालयी शिक्षण के जिन विधियों पर गिजूभाई ने बल दिया है वे विधियाँ-नाटक पद्धति, कहानी पद्धति, भ्रमण पद्धति, अवलोकन पद्धति तथा मॉण्टेसरी पद्धति हैं।

गिजूभाई बधेका के अनुसार अनुशासन

इनके द्वारा अनुशासन निम्नलिखित प्रकार का होना चाहिये-

(1) बालकों के अनुशासन के विषय में गिजूभाई इस प्रकार सोचते थे, वस्तुत: हम हमारी मान्यताओं को बालक पर लादने के लिये इनाम एवं सजा देने के लिये दमनात्मक साधनों का प्रयोग करते हैं। बालों के मन में यह स्थिति जेल की प्रथम सजा जैसी है। (2) दण्ड के भय से तभी तक अनुशासन रहता है, जब तक दण्ड का भय स्थिर रहता है जैसे ही दण्ड का भय चला जाता है। अनुशासन भी समाप्त हो जाता है। दण्ड का भय स्थिर नहीं रह सकता। अतः अनुशासन बालकों पर बहुत समय पर लागू नहीं रह सकता। (3) माँ-बाप तथा शिक्षक इस बात को समझ लें कि मारने या ललचाने से बालकों में उच्छृखलता आती है। भय और लालच से बालक ढीठ-हीन बन जाते हैं।

गिजूभाई का बाल साहित्य

बाल साहित्य में गिजूभाई की देन महत्वपूर्ण है। उनके पूर्व गुजराती में श्री दलपतराम ने गीत लिखे थे। सन् 1915 में हिम्मतलाल गणेशजी ने एक काव्य संग्रह प्रकाशित किया था। स्वतन्त्रता आन्दोलन आरम्भ होने पर गुजराती में गाँधीवादी विचारधारा बल पकड़ने लगी। इस काल में बाल साहित्य लेखन में नयी प्रवृत्ति आयी और इस प्रवृत्ति ने गुजराती बाल साहित्य में क्रान्ति ला दी। इस क्रान्ति के जनक गिजूभाई थे। यदि यह कहा जाय कि गिजूभाई ने एक नये युग का सूत्रपात किया तो अतिशयोक्ति नहीं है। गिजूभाई ने अपनी रचनाओं में बालकों की रुचि एवं क्षमता का ध्यान रखा। उनकी आयु एवं उनके विकास के
अनुरूप साहित्य की रचना गिजूभाई ने की। पहले बाल साहित्य में पुरानी शैली का बोः बाला था। कहानियाँ एवं कविताओं के माध्यम से उपदेश दिये जाते थे।

गिजूभाई ने इस शैली काबपूर्णतया परित्याग कर दिया था। उनका मत था कि बालक को इस योग्य होना चाहिये कि वे स्वयं कुछ निर्णय ले सके और कविता एवं कहानी में इतनी शक्ति होनी चाहिये कि वह बाल न पर प्रभाव डाल दें। गिजूभाई ने इस दृष्टि से बालकों की रुचि और प्रकृति के अनुसार बाल साहित्य की रचना की। गिजूभाई की अनेक कहानियों का हिन्दी में अनुवाद हुआ। मूर्ख ब्राह्मण, भूत का भाई जैसी अनुवादित कहानियाँ हिन्दी भाषी क्षेत्र में बड़े चाव से पढ़ी जाती हैं। गिजूभाई को बाल साहित्य का सम्राट कहा जाना चाहिये।

गिजूभाई की एक महत्वपूर्ण कृति दिवास्वप्न है। दिवास्वप्न में गिजूभाई ने प्राथमिक पाठशाला की आलोचना प्रस्तुतनकरते हुए पाठशाला के भावी स्वरूप की रूपरेखा प्रस्तुत की है। गिजूभाई की बाल केन्द्रित शिक्षा नीति अपने आप में अनोखी एवं महत्वपूर्ण थी। गिजूभाई ने तो बालकों को हँसते-खेलते उनकी आयु, रुचि आवश्यकता एवं आकांक्षा के अनुरूप शिक्षा देने के संकल्प का बीड़ा उठाया था। वे कुछ सीमा तक अपने कार्य में सफल भी हुए परन्तु 54 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने इस नश्वर शरीर को त्याग दिया तथा अपने अधूरे स्वप्न को पूरा करने हेतु शिक्षा जगत् के लिये छोड़ दिया।

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