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पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत(piaget’s cognitive development theory)
जीन पियाजे स्विट्जरलैंड के मनोवैज्ञानिक थे। इन्होंने बच्चों के सीखने के तरीके पर सबसे पहले अध्ययन किया। पियाजे को विकासात्मक बाल मनोविज्ञान का जनक भी माना जाता है। जीन पियाजे ने मानव विकास के तीनों पक्षों ज्ञानात्मक, भावात्मक, क्रियात्मक में से ज्ञानात्मक पक्ष पर सर्वाधिक बल दिया। जिसके फलस्वरूप उन्होंने संज्ञानात्मक विकास वाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया।
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संज्ञान का अर्थ-
शैक्षणिक प्रक्रियाओं मैं अधिगम का मुख्य केंद्र संज्ञानात्मक क्षेत्र होता है। इस क्षेत्र में अधिगम उन मानसिक क्रियाओं से जुड़ी होती है जिनमें पर्यावरण सूचना प्राप्त की जाती है। इस प्रकार इस क्षेत्र में अनेक क्रियाएं होती जो सूचना प्राप्ति से प्रारंभ होकर विद्यार्थी के मस्तिष्क तक चलती रहती है। यह सूचनाएं दृश्य रूप में होती हैं या सुनने या देखने के रूप में होती है। संज्ञान का अर्थ समझ या ज्ञान होता है संज्ञान में मुख्यतः ज्ञान, समग्रता अनुप्रयोग, विश्लेषण तथा मूल्यांकन पक्ष सम्मिलित होते है।
पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के स्तर (Steps of coginitive development according piaget)
पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत में विकास के निम्न स्तर है-
(1) संवेगात्मक अनुकूलन काल (जन्म से 2 वर्ष)
(2) प्रतीकात्मक एवं पूर्व अधरणात्मक विचार का विकास काल (2 से 4 वर्ष)
(3) अंतर्ज्ञान के विचार का काल (4 से 8 वर्ष)
(4) मूर्त प्रयोगों का काल (8 से 12 वर्ष तक)
(5) व्यवहारिक प्रयोगों का काल (12 वर्ष से किशोर काल तक)
संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त के संप्रत्यय
पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत में निम्न संप्रत्यय है-
(1) अनुकूलन (Adaptation) – इसकी दो उपक्रियाये है- आत्म-सात्करण(Assimilation) और समायोजन(Accommodation)
(2) उदाहरण
(3) संरक्षण
(4) संज्ञानात्मक संरचना
(5) मानसिक संक्रिया
(6) स्कीम्स
(7) स्कीमा
(8) विकेंद्रीकरण

पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएं या पियाजे की मानसिक विकास की अवस्थाएं(Steps of piaget’s coginitive development )
पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत के अंतर्गत पियाजे ने अवस्थाओं को चार भागों में विभाजित किया है –
(1) संवेदिक पेशीय अवस्था (0-2)
(2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (2-7)
(3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7-11)
(4) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (11-16)
उपयोगी लिंक-
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(1) संवेदी पेशीय अवस्था / इन्द्रिय जनित गामक अवस्था / संवेदी गत्यात्मक अवस्था / संवेगीगात्मक अवस्था(Sensori-motor stage) – (0-2 वर्ष)
संवेदी पेशीय अवस्था जन्म से 2 वर्ष तक की मानी जाती है। संवेदी पेशीय अवस्था में बालक ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से किसी भी विषय का अधिगम करता है। बालक किसी भी वस्तु को देखकर, सुनकर,चखकर, सूंघकर तथा स्पर्श द्वारा अपनी ज्ञानेंद्रियों का प्रयोग करते हुए उस वस्तु का अधिगम करता है।
इस अवस्था में बालक स्वार्थी तथा वस्तु केंद्रित होता है। इस अवस्था में बालक की संवेदनाएं विकसित होती हैं। अतः इस अवस्था को संवेदी पेशीय अवस्था कहते हैं। इस अवस्था के अंत में 22 से 33 माह की अवस्था में बच्चे का खिलौना छिपाया जाता है तो वह उसे ढूंढने का प्रयत्न करता है।और इस प्रयास को वस्तु स्मेतर्य कहते हैं। संवेदी पेशीय अवस्था पियाजे के लिए सभी अवस्थाओं में से सीखने की सबसे जटिल अवस्था है।
(2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational stage) –(2-7 वर्ष)
पूर्व संक्रियात्मक अवस्था 2 से 7 वर्ष के बीच मानी जाती है। अवस्था में बालक स्वार्थी और स्वकेंद्रित न रहकर दूसरों के संपर्क में आकर ज्ञान को अर्जित करना सीखता है। इस अवस्था में बालक का सजीव चिंतन विकसित हो जाता है।एवं बालक की भाषा का उचित विकास होता है।
इस अवस्था में बालक किसी भी समस्या को हल करने के लिए संप्रत्यय निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ कर देता है। बालक का अवस्था में तार्किक चिंतन करना प्रारंभ कर देता है। इसलिए इस अवस्था को तार्किक चिंतन की अवस्था कहते हैं। बच्चा ज्ञानेंद्रियों के अतिरिक्त भी इस अवस्था में अधिगम करना प्रारंभ कर देता है। दो वस्तुओं के बीच में अंतर पहचानना प्रारंभ कर देता है।
पूर्व संक्रियात्मक अवस्था की 2 उप अवस्थाएँ है-
(i) प्रतीकात्मक क्रिया (2 से 4 वर्ष )
(ii) अंतःप्रज्ञा विचार (4 से 7 वर्ष )
(3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था/ स्थूल संक्रियात्मक अवस्था (concrete – operational stage)-(7-11 वर्ष)
मूर्त संक्रियात्मक अवस्था 7 से 11 वर्ष के बीच मानी जाती है। इस अवस्था में बालक किसी भी वस्तु को देखकर उस पर विचार बनाना प्रारंभ कर देता है। बालक दो वस्तुओं के बीच में अंतर करना,गणना करना,तुलना करना एवं समानता और असमानता बताना सीख जाता है।
यह अवस्था में बालक तार्किक चिंतन करना प्रारंभ कर देते इसलिए इस अवस्था को तार्किक चिंतन की अवस्था भी कहते हैं। यह अवस्था में बालक केवल मूर्त/स्थूल तक ही सीमित रहता है परंतु बालक में पलट कर सोचने की योग्यता का विकास हो जाता है। बालक बड़े छोटे में अंतर बताना तथा रंगो या आकार के आधार पर वस्तुओं का वर्गीकरण करना प्रारंभ कर देता है।
(4) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था / औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था/ औपचारिक क्रियात्मक अवस्था ( Formal -operatinal stage) –(11-15 वर्ष)
अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था 11 से 16 वर्ष के बीच की मानी जाती है। यह संज्ञानात्मक विकास के अंतिम अवस्था है। इस अवस्था में बालक में संप्रत्यय निर्माण की योग्यता का पूर्ण विकास हो जाता है।
बालक तार्किक चिंतन अमूर्त रूप से भी करना प्रारंभ कर देता है। बालक की बुद्धि तर्क वितर्क करने लगती तथा किसी वस्तु को देखे बिना अपने विचार रखने लगता है। कठिन सवालों को हल करने लगता है। इस अवस्था में बालक में अमूर्त चिंतन करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है।अतः इस अवस्था को अमूर्त चिंतन की अवस्था भी कहते हैं।
पियाजे के सिद्धांत
(1) क्रिया अर्जन का सिद्धान्त
(2) निर्माण और खोज का सिद्धान्त
पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त का कक्षा शिक्षण में उपयोग-
पियाजे का संज्ञानात्मक विकास के सिद्धान्त के कक्षा शिक्षण में निम्न उपयोग हैं-
(1) इस सिद्धान्त के अनुसार शिक्षक को चाहिए की वो विद्यार्थी को खुद से ही सीखने देना चाहिए ताकि वे अपने अधिगम का स्वयं से संचालन कर सके।
(2) इस सिद्धान्त के अनुसार छात्र को जितना ज्यादा सीखने को मिलेगा उसका ज्ञान उतना ही ज्यादा ठोस और स्पष्ट होगा।
(3) इस सिद्धान्त से यह बताया गया कि कक्षा में शिक्षक खुद को विद्यार्थी की जगह रखे और उनकी समस्याओं को समझे।साक्षत्कार , प्रश्नावली , निरीक्षण विधि द्वारा यह कार्य किया जा सकता हैं।
(4) संज्ञानात्मक सिद्धान्त के अनुसार सारी सुविधाएं देकर बालक को स्वयं सीखने का अवसर देना चाहिए।
FAQS
उत्तर – जीन पियाजे एक प्रसिद्ध स्विस मनोवैज्ञानिक थे, जिन्होंने संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) का सिद्धांत प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि बच्चे कैसे सोचते, सीखते और समझते हैं।
उत्तर – यह सिद्धांत बताता है कि बच्चों का मानसिक विकास चार चरणों में होता है, जिसमें वे धीरे-धीरे जटिल सोचने की क्षमताएँ विकसित करते हैं।
उत्तर – पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को चार चरणों में विभाजित किया:a. संवेदी-गति (Sensorimotor) चरण (0-2 वर्ष)b. पूर्व-संक्रियात्मक (Preoperational) चरण (2-7 वर्ष)c. ठोस संक्रियात्मक (Concrete Operational) चरण (7-11 वर्ष)d. औपचारिक संक्रियात्मक (Formal Operational) चरण (11 वर्ष और उससे अधिक)
उत्तर – इस चरण में शिशु अपनी इंद्रियों (जैसे देखना, सुनना, छूना) और शारीरिक गतिविधियों के माध्यम से दुनिया को समझते हैं।
उत्तर – इस चरण में बच्चे प्रतीकात्मक सोच (Symbolic Thinking) विकसित करते हैं, लेकिन वे अभी भी तर्कसंगत सोचने में असमर्थ होते हैं।
उत्तर – इस चरण में बच्चे तर्कसंगत सोच विकसित करते हैं, लेकिन वे अभी भी अमूर्त (Abstract) विचारों को पूरी तरह समझ नहीं पाते।
उत्तर – इस चरण में बच्चे अमूर्त सोच (Abstract Thinking) और तार्किक तर्क (Logical Reasoning) विकसित करते हैं, जि
उत्तर – स्कीमा मानसिक ढाँचे (Mental Frameworks) होते हैं, जो व्यक्ति को जानकारी को व्यवस्थित करने और समझने में मदद करते हैं।
उत्तर – आत्मसात (Assimilation) – जब हम नई जानकारी को पुराने स्कीमा में फिट करते हैं।समायोजन (Accommodation) – जब हम अपने स्कीमा को नई जानकारी के अनुसार बदलते हैं।
उत्तर – शिक्षा में यह सिद्धांत छात्रों की सीखने की क्षमताओं को समझने और उनके लिए उपयुक्त शिक्षण विधियाँ अपनाने में मदद करता है।
उत्तर – संरक्षण का अर्थ है यह समझना कि किसी वस्तु की मात्रा (जैसे पानी या मिट्टी) उसके आकार या रूप के बदलने से नहीं बदलती।
उत्तर – संग्रथन का अर्थ है कि छोटे बच्चे एक ही पहलू पर ध्यान केंद्रित करते हैं और अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं की अनदेखी करते हैं।
उत्तर – नहीं, बच्चे अलग-अलग गति से विकसित होते हैं, और उनके अनुभव और पर्यावरण भी उनके संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित कर सकते हैं।
उत्तर – पियाजे का सिद्धांत आंतरिक मानसिक प्रक्रियाओं (Cognitive Processes) पर केंद्रित है, जबकि व्यवहारवाद केवल बाहरी व्यवहार (Observable Behavior) पर ध्यान देता है।
उत्तर – हालाँकि यह सिद्धांत सभी बच्चों के लिए लागू होता है, लेकिन कुछ संस्कृतियों और व्यक्तियों में विकास की प्रक्रिया में भिन्नताएँ हो सकती हैं।
उत्तर – यह सिद्धांत शिक्षकों को यह समझने में मदद करता है कि किस उम्र में बच्चे कौन-कौन सी अवधारणाएँ समझ सकते हैं और उन्हें सीखने के सर्वोत्तम तरीके कौन से हैं।
उत्तर – यह सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों को पर्याप्त रूप से नहीं समझाता।यह चरणबद्ध विकास को अधिक कठोर मानता है, जबकि वास्तविकता में बच्चों का विकास अधिक लचीला होता है।
उत्तर – व्योत्स्की का सिद्धांत सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों के प्रभाव को अधिक महत्व देता है, जबकि पियाजे का सिद्धांत व्यक्तिगत अनुभवों और अन्वेषण पर अधिक केंद्रित है।
उत्तर – हाँ, यह सिद्धांत अब भी बाल मनोविज्ञान और शिक्षा में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, हालाँकि आधुनिक शोधों ने इसमें कुछ संशोधन किए हैं।
उत्तर – भविष्य में यह सिद्धांत शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), और न्यूरोसाइंस में उपयोग किया जा सकता है ताकि संज्ञानात्मक विकास को और बेहतर तरीके से समझा जा सके।
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