शिक्षक डायरी के लाभ एवं उद्देश्य / शिक्षक दैनंदिनी के लाभ एवं उद्देश्य

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शिक्षक डायरी के लाभ एवं उद्देश्य / शिक्षक दैनंदिनी के लाभ एवं उद्देश्य

शिक्षक डायरी के लाभ एवं उद्देश्य / शिक्षक दैनंदिनी के लाभ एवं उद्देश्य
शिक्षक डायरी के लाभ एवं उद्देश्य / शिक्षक दैनंदिनी के लाभ एवं उद्देश्य


Aims merits and importance of teacher’s diary in hindi / शिक्षक डायरी के लाभ एवं उद्देश्य

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शिक्षक डायरी क्या है / शिक्षक दैनंदिनी किसे कहते हैं

डायरी या दैनन्दिनी लेखन की अवधारणा प्राचीनकाल से ही समाज में रही है। इस प्रथा के परिणामस्वरूप अनेक महान् पुरुषों के विचारों एवं कार्यों का विवरण हमको प्राप्त होता है। महात्मा गाँधी ने अपने जीवन की अनेक घटनाओं का वर्णन अपनी आत्मकथाओं में किया है। इसी प्रकार दैनन्दिनी लेखन के द्वारा व्यक्ति विविध विचारों की समीक्षा कर सकता है। ये विचार स्वयं के भी हो सकते हैं तथा इसके साथ-साथ व्यक्ति दूलरों के अच्छे विचारों का भी उसमें समावेश कर सकता है। डायरी लेखन के अन्तर्गत व्यक्ति अपने स्वयं के विचारों एवं कार्यों की समीक्षा करता है। अनेक अवसरों पर व्यक्ति अनेक त्रुटिपूर्ण कार्य कर देता है जो कि उसको नहीं करने चाहिये या कुछ समय बाद उसको अपनी त्रुटियों का ज्ञान होता है।

इस प्रकार की त्रुटियों की समीक्षा डायरी में की जा सकती है। जैसे-एक शिक्षक से कक्षा में छात्र प्रश्न पूछ रहा है छात्र को प्रश्न का उत्तर न देने की स्थिति में शिक्षक छात्र को डाँटकर चुप करा देता है। इसके बाद शिक्षक को अपनी त्रुटि का अनुभव होता है। वह इसका वर्णन दैनन्दिनी में करते हुए लिखता है कि उसको छात्र को डाँटना नहीं चाहिये वरन् सत्यता को स्वीकार करना चाहिये। इस प्रकार के अनेक विचारों, स्वयं से सम्बन्धित घटनाओं एवं स्वयं के कार्य व्यवहार की समीक्षा डायरी या दैनन्दिनी में की जा सकती है।

डायरी या दैनन्दिनी लेखन को विद्वानों द्वारा अग्रलिखित रूप से परिभाषित किया गया है।

प्रो. एस. के.दुबे के शब्दों में, “दैनन्दिनी लेखन का आशय उस अभिलेख से है करता है तथा आदर्शवादी कार्य व्यवहार एवं विचारों का सृजन करता है जिससे भविष्य में जिसमें व्यक्ति अपने कार्य व्यवहार, जीवन की घटनाओं एवं स्वयं के विचारों की समीक्षा है।”

श्रीमती, आर. के. शर्मा के अनुसार, “दैनन्दिनी लेखन व्यक्ति के कार्य व्यवहार एवं विचारों का लेखा जोखा है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों, कार्य,व्यवहार एवं स्वयं से सम्बन्धित घटनाओं के सकारात्मक एव नकारात्मक पक्षों का वर्णन करता है तथा सारगर्भित उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट होता है कि दैनन्दिनी लेखन की प्रक्रिया व्यक्ति की स्वयं के कार्यों की स्वयं द्वारा समीक्षा करने की प्रक्रिया है।”

दैनन्दिनी लेखन के अन्तर्गत व्यक्ति अपने कार्यों में गुण एव दोष दोनों की विवेचना निष्पक्ष भाव से करता है तथा उसमें वह अपनी त्रुटियों का वर्णन, आत्मग्लानि का वर्णन एवं पश्चाताप का वर्णन भी नि:संकोच से करता है। इसमें व्यक्ति भाव एवं विचारों का प्रकटीकरण स्पष्ट रूप से करता है। इसलिय दैनन्दिनी को व्यक्ति का दर्पण कहा जा सकता है। एक व्यक्ति की दैनन्दिनी को घड़कर उसके सभी पक्षों को सरलता से समझा जा सकता है।

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शिक्षक डायरी के लाभ / शिक्षक दैनंदिनी से लाभ

दैनन्दिनी लेखन के माध्यम से छात्रों में अनेक प्रकार के गुणों को विकसित किया जा सकता है। जिनसे एक ओर उनका कार्य एवं व्यवहार उत्तम रूप में होता है वहीं दूसरी ओर उनके कार्य व्यवहार को व्यावसायिक, सामाजिक एवं राजनैतिक दृष्टि से उपयोगी बनाया जा सकता है। अत: दैनन्दिनी लेखन के प्रमुख लाभों का वर्णन निम्नलिखित रूप से किया जा सकता है-

1. समीक्षात्मक चिन्तन का विकास (Development of critical thinking)- सामान्य रूप से शिक्षकों को प्रशिक्षण अवस्था से ही दैनन्दिनी लेखन की आदत डाली जाती है तो वह अपने कार्य एवं व्यवहार के बारे में दो प्रकार से चिन्तन करते हैं। प्रथम वे अपने कार्य एवं व्यवहार के नकारात्मक पक्ष एवं त्रुटियों के बारे में विचार करते हैं। द्वितीय वे अपने कार्य एवं व्यवहार की उपयोगिता के बारे में विचार करते हैं। इस प्रकार शिक्षकों में समीक्षात्मक चिन्तन को भावना का विकास होता है जिसका लाभ उसको अपने व्यावसायिक एवं व्यावहारिक जीवन में प्राप्त होता है।

2. समस्याओं के समाधान की योग्यता का विकास (Development of abilities of problem solving)-दैनन्दिनी के माध्यम से शिक्षकों एवं छात्रों के द्वारा अपनी व्यवहारगत् एवं कार्य सम्बन्धी समस्याओं का समाधान खोज लिया जाता है; जैसे-एक छात्र का अपने साथियों के साथ प्रतिदिन झगड़ा होता है। वह इस झगड़े को अपनी दैनन्दिनी में लिखता है तो वह अपनी व्यवहारगत् कमियों को समझने लगता है तथा उनको दूर करने का प्रयास करता है। इस प्रकार वह झगड़े की अनेक विचारधाराओं से पृथक् हो जाता है। धीरे-धीरे वह अपने साथियों से मधुर सम्बन्ध स्थापित करना सीख जाता है तथा झगड़े की समस्या का समाधान सम्भव हो जाता है। 

3. त्रुटि उन्मूलन की सम्भावना (Passibility of mistakes abolition)- सामान्यतः जब व्यक्ति किसी प्रकार का त्रुटिपूर्ण कार्य करता है तो उसका उल्लेख अपनी दैनन्दिनी में अवश्य करता है। इसके साथ-साथ उसके कारणों का भी उल्लेख करता है तथा यह निश्चिय करता है कि जो त्रुटि आज उसने अपने व्यवहार में की है उसको वह भविष्य में पुन: नहीं करेगा। इस प्रकार धीरे-धीरे वह त्रुटिपूर्ण कार्यों को करना छोड़ देता है तथा उसके कार्य एवं व्यवहार से त्रुटियों का पूर्णत: उन्मूलन हो जाता है।

4. मानसिक तनाव का उन्मूलन (Abolition of mental tension)-मानसिक तनाव को दूर करने की व्यवस्था पर विचार किया जाये तो आत्म समीक्षात्मक दैनन्दिनी लेखन इसकी पूर्ण व्यवस्था करती है। जब हम किसी उत्तेजना के कारण कोई त्रुटिपूर्ण कार्य करते हैं तो हमारे मन में तनाव उत्पन्न हो जाता है। इस तनाव को दूर करने के लिये व्यक्ति जब शान्त भाव से विचार करता है तथा अपनी त्रुटियों का अवलोकन करता है तथा इसके साथ-साथ उनको पुनः न करने मानसिक तनाव दूर हो जाता है। का निश्चय करता है और इन सभी तथ्यों को जब वह लिखित रूप में प्रस्तुत करता है तो उसका

5. संश्लेषण एवं विश्लेषण की योग्यता का विकास (Development of ability of synthesis and analysis)-दैनन्दिनी लेखन की प्रक्रिया में छात्रों द्वारा अनेक तथ्यों को जोड़ा जाता है तथा किसी नियम या सिद्धान्त का विश्लेषण भी किया जाता है; जैसे-सभी छात्र उस शिक्षक की प्रशंसा करते हैं जो कि छात्रों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है तथा उनकी बातों को समझने का प्रयास करता है। इन सभी तथ्यों को जोड़कर वह समझ पाता है कि छात्रों एवं शिक्षक के मध्य उचित सम्प्रेषण होना चाहिये। इसी प्रकार जब वह सम्प्रेषण को स्पष्ट करता है तो उसका विश्लेषण करके उसके अन्तर्गत होने वाली क्रियाओं का वर्णन करता है। इस प्रकार छात्रों में दैनन्दिनी लेखन से संश्लेषण एवं विश्लेषण की योग्यता का विकास सम्भव होता है।

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6. सत्य को स्वीकार करने की क्षमता का विकास (Development of acceptance capacity of truth)-सामान्य रूप से यह देखा जाता है कि व्यक्ति प्रदर्शन एवं भ्रम का जीवन व्यतीत करता है। समाज के समक्ष वह इस प्रकार का प्रदर्शन करता है कि वह बहुत दानी एवं विद्वान् है, जबकि वह ऐसा नहीं होता। झूठे प्रदर्शन के कारण ही व्यक्ति भ्रष्टाचार एवं गलत आदतों को सीखता है। जबकि आत्म समीक्षात्मक दैनन्दिनी लेखन में वह सत्यता को स्वीकार करता है, अपनी वास्तविकता एवं कमियों को लिखता है तथा उनमें सुधार करने का निश्चय करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि दैनन्दिनी लेखन के द्वारा व्यक्ति सत्यता को स्वीकार करने का साहस विकसित कर पाता है।

7.आदर्श व्यवार का विकास (Development of idealistic behaviour)-आत्म समीक्षात्मक दैनन्दिनी लेखन के माध्यम से व्यक्ति में आदर्श व्यवहार का विकास होता है क्योंकि इसमें अपने कार्य एवं व्यवहार की प्रतिदिन समीक्षा की जाती है। इससे व्यवहार के दोष दिन प्रतिदिन कम होने लगते हैं। व्यवहार में दोर्षों का अभाव हो जाता है तथा व्यवहार समाजोपयोगी सूचनाओं एवं …- 129 स्वय कद्वारा स्वयं के लिये होता है। एवं सर्वोत्तम रूप में विकसित होता जाता है क्योंकि इसमें व्यावहारिक सुधारों का प्रस्तुतीकरण

8. उपयोगी विचार का सृजन (Creation of useful views)-आत्म समीक्षात्मक दैनन्दिनी लेखन से उपयोगी विचारों के सृजन की सम्भावना होती है जैसे-एक शिक्षक को क्रोध बहुत आता है जब वह अपने क्रोधको कम करना चाहता है तो उसके लिये अनेक प्रकार के साहित्य का अध्ययन करता है तथा सर्वगी पर नियन्त्रण करने का प्रयास करता है। जब वह अपने क्रोध पर नियन्त्रण कर लेता है तो वह उन सभी विचारों एवं साधनों को सांसारिक रूप में प्रस्तुत करता है, जिनसे उसे क्रोध से छुटकारा मिला था। इस प्रकार दैनन्दिनी लेखन से उपयोगी

9.स्वयं की समालोचना की योग्यता का विकास (Development of abilities of selfcritism)-व्यक्ति अपनी आलोचना को सहन नहीं कर पाता परन्तु जब व्यक्ति स्वयं की समालोचना को सहन कर लेता है तो उसका व्यवहार परिमार्जित एवं आदर्श रूप में विकसित विचारों का सृजन सम्भव होता है। होता है। आत्म समीक्षात्मक दैनन्दिनी लेखन में व्यक्ति अपने दोषों का वर्णन स्वयं करता है तथा उनमें सुधार करने का निश्चय करता है। धीरे-धीरे उसमें स्वयं को समालोचना की आदत के साथ-साथ किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा उसके व्यवहार में कमी बताये जाने को भी सहन करने की आदत विकसित हो जाती है।

10. विचारों का समन्वयन (Co-ordination of views)- आत्म समीक्षात्मक दैनन्दिनी लेखन में व्यक्ति समन्वित विचारों का प्रस्तुतीकरण करता है। दूसरे शब्दों में व्यक्ति अपनी विचारधाराओं एवं व्यवहार का दूसरों की विचारधाराओं एवं व्यवहार से समन्वयन स्थापित करने का प्रयास करता है क्योंकि समाज में उस स्थिति में ही टकराव होता है जब समन्वयन के अभाव की स्थिति होती है। दैनन्दिनी लेखन में व्यक्ति अपने व्यवहार एवं विचारों को दूसरे के व्यवहार एवं विचारों से मिला देता है।

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11. लिखित अभिव्यक्ति कौशल का विकास (Development of written ex- pression skill)-अनेक व्यक्ति मौखिक रूप से अपने विचारों को अभिव्यक्त करने में सक्षम होते हैं परन्तु लिखित रूप में विचारों को प्रस्तुत नहीं कर पाते। आत्म समीक्षात्मक दैनन्दिनी लेखन में व्यक्ति शान्त स्वभाव से लेखन कार्य करता है। उसको लेखन कार्य करने का अभ्यास हो जाता है। धीरे-धीरे वह विचारों को सरल एवं बोधगम्य रूप में प्रस्तुत करने लगता है। अत: आत्म समीक्षात्मक दैनन्दिनी लेखन से व्यक्ति में लिखित अभिव्यक्ति कौशल का विकास शीघ्रता से होता है।

12. स्थायी सुधार की सम्भावना (Possibility of permanent refom)- आत्म समीक्षात्मक दैनन्दिनी के माध्यम से व्यक्ति को स्वयं अनुभव होता है कि उसके कार्य एवं व्यवहार में अनेक कमियाँ हैं। जिनके कारण वह अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाता। इन त्रुटियों को समाप्त करने का प्रयास भी वह स्वयं करता है इसलिये दूसरों के द्वारा बतायी गयी कमियों की अपेक्षा जब व्यक्ति स्वयं अपनी कमियाँ खोजता है तथा उनको दूर करने का प्रयास करता है तो यह माना जाता है कि उसमें होने वाला प्रत्येक सुधार स्थायी रूप में होगा क्योंकि उसे सुधार में उसके आत्मसमर्पण, आत्मसमीक्षा एवं आत्मबोध का समावेश होता है।

13.तर्क कौशल का विकास (Development of logicskill)-कोई भी व्यक्ति अपने व्यवहार एवं कार्य में त्रुटियों को सरलता से स्वीकार नहीं कर लेता वरन् अपने कार्य एवं व्यवहार के पक्ष में अनेक प्रकार के कुतर्क करता है परन्तु आत्म समीक्षात्मक दैनन्दिनी लेखन में व्यक्ति को किसी दूसरे के समक्ष अपने विचार प्रस्तुत नहीं करने हैं वरन् अपने विचारों से स्वयं सन्तुष्ट होना है। इसके परिणामस्वरूप वह तर्क करता है तथा कुतों से दूर रहता है। इस प्रकार बालक में दैनन्दिनी लेखन से तर्क कौशल का विकास किया जा सकता है।

14. निष्पक्षता की भावना का विकास (Development of spirit of imparia- lity)-वर्तमान समय में समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अव्यवस्था का प्रमुख कारण पक्षपात की भावना है। यह पक्षपात समाज में जाति-धर्म, क्षेत्र एवं सम्प्रदाय के आधार पर देखा जाता है। आत्म समीक्षात्मक दैनन्दिनी लेखन का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति को स्वयं को सुधारना है। जब व्यक्ति स्वयं अपनी समीक्षा करता है तो उस पर कोई भय या दबाव नहीं होता वरन् पूर्ण निष्पक्षता से वह अपनी समीक्षा लिखित रूप से प्रस्तुत करता है।

इस प्रकार व्यक्ति में निष्पक्षता के गुण का विकास होता है। निष्पक्ष रूप से कार्य करने वाला व्यक्ति समाज के लिये उपयोगी सिद्ध होता है। उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट होता है कि आत्म समीक्षात्मक दैनन्दिनी लेखन की प्रक्रिया वर्तमान समय में छात्र एवं शिक्षक दोनों के लिये ही लाभप्रद है। इसको प्रभावी एवं अनिवार्य रूप में सभी विद्यालयों में लागू करना चाहिये क्योंकि जब तक छात्र अपनी समीक्षा करने के योग्य नहीं होगा तब तक वह दूसरों की समीक्षा नहीं कर सकता। इसलिये आत्म समीक्षात्मक दैनन्दिनी लेखन एक महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य व्यवस्था है जो छात्रों के सर्वांगीण विकास का साधन बन सकती है।

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